बुधवार, 8 अगस्त 2012

दास्तान-ए-मुहब्बत





एक दिन अचानक
क्षितिज के उस पार
तेरा कांत रूप दिखा था मुझे।
मैं दौड़ा था तुम्हें रोकने के लिये
अपना अवलम्ब बचाने के लिये।
पर काल के वायु-वृत ने
अपने आगोश में भर लिया था
और फेंक दिया था
क्षितिज के दूसरे किनारे पर।
फिर भी हिम्मत नहीं हारा था
चलता चला था तुम्हारी खोज में
पर जब उस छोर पर पहुँचा
तो इस छोर पर नज़र आई थी तुम।
बैठकर खूब रोया
मंदिरों में जाकर उपासना भी की
पर काल ने मेरी एक ना सुनी
तुम जा चुकी थी अज्ञात शांतवन में।
इस निरीह कुंज में
मैं अकेला रह गया था।
समय के आशुवत् परिवर्तन ने
बहुतों को छीन लिया था मुझसे।
कोई लक्ष्य नहीं, कोई उमंग नहीं
बिन पतवार की नौका की भाँति
लगता रहा था
इस कगार से उस कगार पर।
सहसा गर्जना हुई थी
आकाशतल में
तारे और नक्षत्रवृंदों का समूह
चमकने लगे थे दिन में ही।
यह कैसा दिवस था
मैं कुछ सोच नहीं पा रहा था
हिमालय को बींधते
उल्कापिडों का अग्निवर्तन
विंध्य के जलप्रपातों का
उल्टा (उलटा) प्रवाह।
विज्ञान के सारे सिद्धांत
या ये कहें प्रकृति के जड़वत् नियम
क्या सही, क्या गलत
कुछ निर्धारित करना मुश्किल था।
भास्कर के अविखंडित प्रकाश में
तुम्हार नूर नज़र आया था।
मैंने लपकना चाहा था तुमको
तो देखा वास्तव में
मैं तुम्हारी ओर आ रहा हूँ।
पक्षियों की तरह उड़ते-उड़ते
जब मैं तुम्हारे पास पहुँचा
तो बहुत खुश हुआ था
क्योंकि मैंने अपनी मंजिल पा ली थी
जी कर ना सही मरकर।


शैलेश भारतवासी

सोमवार, 6 अगस्त 2012

शब्द ..... किसके हैं ये शब्द



पूरी पोस्ट एक ईमानदार अभिव्यक्ति है और अपनी पसंद को अपना मानना बिल्कुल गलत नहीं . सच भी है - कहना था हमें , कह गए वो ...

रश्मि प्रभा



प्रिय ब्लॉगर साथियों,

पिछले दिनों और उससे पहले भी कई लोगों की टिप्पणियाँ और मेल मिली जिसका आशय ये था कि क्या इस ब्लॉग कि सारी पोस्ट आप स्वयं लिखते है ? शायद और पाठकों के मन में भी ये सवाल कभी न कभी उठता होगा......तो आज पेश है मेरी तरफ से आप सबको ये जवाब -

मैं एक साधारण इंसान हूँ....सिर्फ एक ज़र्रा.....कोई कवि, लेखक या कोई शायर बनने या अपने को समझने कि जुर्रत और हिमाकत मेरी नहीं है.....हाँ उर्दू अदब और हिंदी साहित्य से मुझे बहुत लगाव
है, इसके आलावा मुझे आध्यात्मिकता से बहुत लगाव है खासकर सूफी दर्शन से......अपनी उम्र के हिसाब से शायद कुछ अधिक परिपक्व हो गया हूँ......जिंदगी में जो कुछ सुनता हूँ, पढता हूँ उसे बहुत करीब से महसूस करता हूँ बाकि जिंदगी ने बहुत कुछ सिखाया है......दिमाग कि बजाय दिल को ज़्यादा तरजीह देता हूँ.....इसलिए जो कुछ कहीं महसूस किया है वो आपसे बाँटने के लिए इस ब्लॉग कि शुरुआत कि और आज भी कभी फॉलोवर की संख्या या टिप्पणियों की गिनती पर कम ध्यान रहता है क्योंकि ये ब्लॉग मेरी अपनी आत्मसंतुष्टि का जरिया है......यहाँ जो गजले, नज्में, गीत, विचार, सूफियाना कलाम... आप पढ़ते हैं वो सारे के सारे मैं खुद नहीं लिखता या मैंने नहीं लिखे, कुछ संकलन है, कुछ मैंने खुद भी लिखे हैं......इसका हिसाब रखना ज़रूरी नहीं समझा कि क्या अपना था और क्या और किसी का क्योंकि मेरे लिए उसमे छिपे जज़्बात मायने रखते हैं, मैं उसमे खुद को महसूस करता हूँ...... जब मैं यहाँ कुछ प्रकाशित करता हूँ तो उसमे छिपे जज़्बात मेरे और सिर्फ मेरे होते हैं जिसे कभी तस्वीरों के माध्यम से तो कभी शब्दों के माध्यम से बाँट लेता हूँ........

मैं खुद कि तारीफ का भूखा नहीं हूँ.......क्योंकि मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि मेरे ब्लॉग - कलाम का सिपाही और खलील जिब्रान पर जो मैं प्रकाशित करता हूँ आप में से नब्बे फीसदी लोग उसे कभी न पकड़ पाते जिसे अगर मैं अपने नाम से प्रकाशित करता , पर मेरा ऐसा इरादा नहीं, बल्कि मैं तो ये चाहता हूँ कि ये चीजें आप तक पहुंचे ताकि आप उन सबसे भी रूबरू हो सके जो कहीं अछूता रह जाता है.......यहाँ हर किसी को समर्पित करने के लिए ब्लॉग बना पाना सम्भव नहीं है इसलिए जज़्बात एक प्लेटफ़ॉर्म है जहाँ कोई दायरा नहीं, कोई सीमा नहीं है, मेरा संकलन जो कई बरसों का है और बढता जाता है उसमे भी मैंने नामों को तरजीह कम दी है इसलिए कई का तो मुझे पता ही नहीं हैं, इतनी छोटी बातों पर मैंने ध्यान नहीं दिया कभी , उसके लिए माफ़ी का हक़दार हूँ |

आप सबसे गुज़ारिश है जिन्हें किसी पोस्ट कि खूबसूरती और उसमे उकेरे जज़्बात अपनी तरफ खींचते है उनका मैं तहेदिल से इस्तकबाल करता हूँ पर जो नामों में उलझे हैं और सिर्फ ये बताने या जताने कि तर्ज पर टिप्पणी छोड़ते हैं कि 'देखा हमने पहचान लिया न कि ये तुमने नहीं लिखा'........उनसे मैं यही कहूँगा हो सके तो इससे ऊपर उठें........यहाँ इस ब्लॉग पर अगर ग़ज़ल में शायर का तखल्लुस शेर में आता है तो वो ज़रूर आएगा......बाकी न मैंने कभी 'नाम' डाला था और न आगे 'नाम' डालूँगा चाहें वो मेरा ही क्यों न हो ........ये दहलीज़ कम से नामों से मुक्त रहेगी......लोगों से अनुरोध है कृपया व्यक्तिगत और अन्यथा न लें......शुक्रिया|
--------------------------------------------------------------------
अरे ....अरे ....नाराज़ न हों आपको खाली हाथ नहीं जाना पड़ेगा तो पेश है आज कि ये पोस्ट .........शब्दों पर अधिकार को लेकर........



शब्द....किसके हैं ये शब्द?
क्या तेरे, क्या मेरे ?
क्या कभी किसी के हुए हैं ?
ये शब्द.....

इस विराट में शब्द नहीं हैं,
है तो सिर्फ एक नाद
जो अनहत गूँजता है,
और उस नाद को
वर्णित करने के लिए ही तो
शब्दों के वस्त्र बनाते हैं हम,

फिर क्या फर्क है, कि किसी के
वस्त्र उजले हैं, और किसी के स्याह
क्या संसार के शब्दकोश में
कोई भी ऐसा शब्द है,
जो उस अनकहे
को अभिव्यक्ति दे,

क्यों है शब्दों की इतनी अहमियत ?
क्या केवल शब्दों को
क्रम देने से ही
शब्दों पर छाप पड़ जाती है ?
'सर्वाधिकार सुरक्षित' हो जाते हैं ?

कभी सोचा है तुमने की तुम
शब्दों पर अपने अधिकार
को सुरक्षित करते हो ....
क्या सच में तुम ऐसा कर सकते हो ?

क्या कभी कोई उस क्रम को थोड़ा
सा बिगाड़कर, थोड़ा इधर
या थोड़ा सा उधर सरकाकर
तुम्हारे 'सर्वाधिकार' को
'असुरक्षित' नहीं कर देता है
फिर कैसा अधिकार है ये ?

क्या कभी अनुमान किया है
कि इन शब्दों के माध्यम
से ही इस संसार में
प्रतिपल कितनी बकवास
की जाती है ?
कितनो के खिलाफ ज़हर
उगला जाता है?
कितने लोगों को लड़ाया
जाता है ?

अरे जागो,
शब्दों के पीछे मत भागो
ये तो सिर्फ एक जाल है,
शब्द अभिव्यक्ति का मात्र माध्यम हैं
और इन अधिकारों के चक्कर
में तुम वो तो भूल ही जाते हो
जिसको कहने के लिए
इन शब्दों का सहारा लिया गया,

थोड़ा सा गहराई में जाओ.....
थोड़ा सा डूबो उस रस में
जो शब्दों से परे है,
जैसे दिल की धडकन
बिना कहे कुछ कहती है,
जैसे साँसों की गरमी,
जैसे हाथों कि नरमी,
जैसे मतवाले नैनो की बोली
बिना बोले भी बोलती है,
------------------------------------------------------
अगर किसी के 'सर्वाधिकार सुरक्षित' में से कोई शब्द भटककर इधर आ निकला हो तो कृपया उसे खींच के यहाँ से ले जाकर सुरक्षित करें :-)

इमरान अंसारी

रविवार, 5 अगस्त 2012

पुरुष आए मंगल से, स्त्री कौन देश से आईं?







माधवी शर्मा गुलेरी

अक्सर कहा जाता है कि हम सब दुनिया की भीड़ में अकेले हैं, हम अकेले आए थे और अकेले ही जाएंगे। वैसे, इस अकेले आने-जाने के सफर के बीच हम अकेले नहीं रह पाते। लगभग हर इंसान देर-सवेर किसी संबंध में बंधता ही है। मनुष्य का सबसे पहला संबंध अपनी मां से होता है, फिर पिता, भाई, बहन, पत्नी, बच्चे और सगे-संबंधी उसके जीवन से जुड़ते हैं।

बाइबल के मुताबिक, ईश्वर ने सात दिन में कायनात पूरी रच दी थी। उसने जन्नत बनाई, धरती का सृजन किया, जीवजंतु व पेड़-पौधे तैयार किए, अलग-अलग मौसम रचे और इन सबकी हिफाजत के लिए मनुष्य का सृजन किया। खुदा ने जो पहला इंसान बनाया, उसे ‘आदम’ नाम दिया। फिर उसने एक खूबसूरत बगीचा तैयार किया, जिसका नाम ‘ईडन’ रखा। बगीचे में बेहतरीन पेड़ लगाए और आदम को इसमें रहने के लिए छोड़ दिया, लेकिन साथ ही उसे हिदायत दी गई कि वह एक पेड़ के सिवा बगीचे के किसी भी पेड़ से मनचाहा फल खा सकता है। आदम अकेला न रहे, इसलिए खुदा ने एक और इंसान रचा। यह एक औरत थी, जिसे हव्वा (ईव) नाम दिया गया।

आदम और हव्वा के अलावा, खुदा ने एक और जीव की रचना की, जो सांप था। सांप ने हव्वा को वर्जित पेड़ से फल खाने के लिए फुसलाया। इस पर हव्वा ने आदम से भी वो फल खाने के लिए कहा। फल खाकर दोनों को अच्छेबुरे का भान हुआ, लेकिन खुदा ने उन्हें इसकी सजा दी और उन्हें बगीचे से बाहर निकाल दिया। बाइबल के इसी हिस्से से आदम और हव्वा के सांसारिक जीवन की शुरुआत मानी जाती है।

हिंदू मान्यता के अनुसार, धरती पर पहला आदमी ‘मनु’ हुआ। मत्स्य पुराण में जिक्र है कि पहले ब्रrा ने दैवीय शक्ति से शतरूपा (सरस्वती) की रचना की, फिर शतरूपा से मनु का जन्म हुआ। मनु ने कठोर तपस्या के बाद अनंती को पत्नी रूप में प्राप्त किया। शेष मानव जाति मनु और अनंती से उत्पन्न हुई मानी गई है। भगवत पुराण में मनु और अनंती की संतानों का वृहद उल्लेख है। हालांकि ऋग्वेद में मनुष्य की कहानी कुछ और है। इसमें कहा गया है कि प्रजापति की पांच संतानों से मानव जाति आगे बढ़ी।

क्या हम सचमुच अलग-अलग ग्रहों से हैं?

अलग-अलग धर्मो के अलग-अलग मत हैं, मान्यताएं हैं, लेकिन उनमें एक सायता है कि पहले पुरुष आया, फिर स्त्री। दोनों में संबंध बना और संसार आगे बढ़ा। जब सब धर्मो के मत स्थापित हो चुके थे, तब 1990 में अमेरिकी लेखक जॉन ग्रे स्त्री-पुरुष से संबंधित एक नया मत लेकर आए। इस मत के अनुसार, पुरुष मंगल ग्रह से हैं और महिलाएं शुक्रग्रह से। उन्होंने इस विषय पर एक किताब लिख डाली, जो अपने समय की सर्वाधिक बिकने वाली किताब साबित हुई। इस पुस्तक की अब तक 70 लाख से अधिक प्रतियां बिक चुकी हैं। इसी किताब के मुताबिक, एक किस्सा यह भी है कि एक दिन मंगलवासियों ने टेलीस्कोप से शुक्रग्रह की तरफ झांका और वहां जो नजारा उन्हें दिखा, वह अद्भुत था। मंगलवासी शुक्रग्रह पर रहने वाली स्त्रियों को देखते ही उनके प्रेम में पड़ गए। आव देखा न ताव, मंगलवासियों ने एक स्पेसशिप ईजाद किया और शुक्रग्रह पर पहुंच गए। शुक्रग्रह की स्त्रियों ने भी उनका दिल खोलकर स्वागत किया। स्त्रियां पहले से जानती थीं कि एक दिन ऐसा आएगा, जब उनके हृदय प्रेम की छुअन महसूस करेंगे। दोनों वर्गो के बीच प्रेम पनपा और वे साथ-साथ रहने लगे। वे एक-दूसरे की आदतें समझने की कोशिश करने लगे। इस कोशिश में सालों बीत गए, लेकिन इस दौरान वे प्रेम और सौहार्द से रहे। एक दिन उन्होंने पृथ्वी पर आने का फैसला किया। शुरुआत में सब ठीक था, लेकिन धीरे-धीरे उन पर धरती का असर कुछ इस तरह होने लगा कि उनकी याददाश्त जाती रही। वे भूल गए कि वे दो अलग-अलग ग्रहों से आए प्राणी हैं, इसलिए उनकी आदतें और जरूरतें भी एक-दूसरे से जुदा होंगी। एक सुबह वे उठे तो पाया कि एक-दूसरे के बीच के अंतर को वे बिल्कुल भूल चुके हैं। यहीं से उनमें द्वंद्व की शुरुआत हुई, जो आज तक जारी है।

जॉन ग्रे ने पुरातन काल से चली आ रही मान्यताओं और पौराणिक धारणाओं से बिल्कुल जुदा एक बात कह दी। हालांकि ‘पुरुषों के मंगल ग्रह से और स्त्रियों के शुक्र ग्रह से’ होने की उनकी बात को एक खोज या सत्य के अन्वेषण के रूप में नहीं लिया गया है। ग्रे की बात को एक लेखक के औरत-मर्द को लेकर विश्लेषण या एक विचार के रूप में लिया गया है, पर उनका इस विचार को पेश करने का ढंग इतना मजेदार था कि लोग इसके दीवाने हुए बिना नहीं रह पाए। ग्रे ने अपनी पुस्तक में एक जगह लिखा है, ‘पुरुषों की शिकायत है कि जब वे किसी ऐसी समस्या का हल रखने की कोशिश करते हैं, जिसके बारे में महिलाएं बात करना चाहती हैं तो होता यह है कि महिलाएं उस समस्या के बारे में सिर्फ बात करना चाहती हैं, हल नहीं ढूंढ़ना चाहतीं।’

ग्रे कहते हैं कि स्त्री और पुरुष के बीच की समस्याओं का कारण उनका स्त्री और पुरुष होना है। लिंगभेद ही उनकी समस्याओं की जड़ है। अपनी बात को समझाने के लिए वे कहते हैं कि पुरुष मंगल से हैं और स्त्रियां शुक्र से.. और ये दोनों ही अपने ग्रहों के समाज और रीति-रिवाजों से बंधे हुए हैं। ये दोनों प्रजातियां इन्हीं ग्रहों के प्रताप की वजह से एक खास तरह का आचरण करती हैं। यही वजह है कि स्त्री-पुरुष का समस्याओं, तनावपूर्ण स्थितियों, यहां तक कि प्यार से निपटने का भी एक अलग अंदाज, एक अलग नजरिया है।

ग्रे ने स्त्री-पुरुष की बात की, उनके परस्पर संबंधों की बात की। ग्रे की तरह दुनिया के ज्यादातर बुद्धिजीवी, लेखक, विचारक और दार्शनिक अपने-अपने अंदाज में संबंधों के विषय में अपनी-अपनी बात कहते आए हैं, विचार और तथ्य पेश करते आए हैं, फिर भी स्त्री-पुरुष संबंधों का तानाबाना इतना जटिल और हर रोज नए रंग व आयाम दिखाने वाला है कि कोई एक धारणा या एक मत केवल कुछ समय तक ही वजूद और आकर्षण बनाए रख पाता है। समय के साथ हर विचार पर एक नया विचार और हर धारणा पर एक नई धारणा अपना प्रभाव दिखाने लगती है।

अनुभवों ने संबंधों को दी बेहतरीन अभिव्यक्ति

स्त्री-पुरुष के संबंधों को लेकर विभिन्न लेखकों, कवियों, बुद्धिजीवियों ने बहुत कुछ कहा है और इनमें से ज्यादातर के विचार उनके अपने अनुभवों और अपनी ज़िन्दगी की मथनी में मथकर बाहर आए हैं। इनमें से कवियों को तो उनके संबंधों ने ही कवि और लेखक बनाया है। अब चाहे वह भारत के मोहन राकेश हों या तुर्की के हिकमत।

मोहन राकेश अपने जीवन में स्त्रियों के साथ अपने संबंधों के दरिया में डूबते-तैरते रहे। उनकी यही छटपटाहट, यही कोशिश उनकी लेखनी में भी साफ नÊार आती है। ‘आषाढ़ का एक दिन’, ‘आधे-अधूरे’, ‘लहरों के राजहंस’ जैसे नाटकों और उनकी लिखी सैकड़ों उम्दा कहानियों में स्त्री-पुरुष के संबंधों का एक अनूठा जाल बुना गया है। ‘आषाढ़ का एक दिन’ में नायिका मल्लिका, नायक कालिदास से कहती है कि ‘मेरी आंखें इसलिए गीली हैं कि तुम मेरी बात नहीं समझ रहे। तुम यहां से जाकर भी मुझसे दूर हो सकते हो..? यहां ग्राम प्रांतर में रहकर तुम्हारी प्रतिभा को विकसित होने का अवसर कहां मिलेगा? यहां लोग तुम्हें समझ नहीं पाते। वे सामान्य की कसौटी पर तुम्हारी परीक्षा करना चाहते हैं। विश्वास करते हो न कि मैं तुम्हें जानती हूं? जानती हूं कि कोई भी रेखा तुम्हें घेर ले तो तुम घिर जाओगे। मैं तुम्हें घेरना नहीं चाहती, इसलिए कहती हूं, जाओ।’
जहां एक ओर मोहन राकेश अपने संबंधों को मूर्त-रूप में मौजूद होकर जीते रहे, वहीं हिकमत ने अपनी ज़िन्दगी का ज्यादातर हिस्सा जेल में बिताया। जेल में रहकर वे अपने जीवन में घटित स्थितियों, घटनाओं और संबंधों पर कविताएं रचते रहे। हिकमत की मनोदशा के एक पहलू की झलक तब मिलती है, जब वे कैदखाने से अपनी पत्नी को लिखते हैं —

सबसे खूबसूरत महासागर वह है
जिसे हम अब तक देख पाए नहीं
सबसे खूबसूरत बच्चा वह है
जो अब तक बड़ा हुआ नहीं
सबसे खूबसूरत दिन हमारे वो हैं
जो अब तक मयस्सर हमें हुए नहीं
और जो सबसे खूबसूरत बातें मुझे तुमसे करनी हैं
अब तक मेरे होंठों पर आ पाई नहीं।

इन पंक्तियों को पढ़कर ही भीतर उस सजायाता कैदी का दर्द सामने आता है, जिसका कसूर सिर्फ इतना था कि वह कविताएं लिखता था। ऐसी कविताएं, जो व्यवस्था और सरकार को पसंद नहीं आती थीं, लेकिन को जेल की उस अंधेरी, सीलन भरी ठंडी कोठरी में उनके संबंधों की गर्मी ने ताकत दी। उनके भीतर ऊर्जा और एहसासों का लावा बहाए रखा, जो उन्हें अपनी सदी का महान कवि और एक महत्वपूर्ण शिसयत बना गया।

प्रेम में विवाह और विवाह में प्रेम

मुक्त प्रेम, विवाह की कार्बन कॉपी है। अंतर यही है कि इसमें निभ न पाने की स्थिति में तलाक की आवश्यकता नहीं है। फ्रेंच लेखिका सिमोन और बीसवीं सदी के महान विचारक व लेखक ज्यां पाल सात्र्र का रिश्ता पूरी तरह से कुछ अलग तरह का था। वे कभी साथ नहीं रहे। पचास वर्षो तक उनका अटूट संबंध उनके लिए बहुधा सामान्य घरेलू जीवन जैसा ही था। वे लंबे समय तक होटलों में रहे, जहां उनके कमरे अलग अलग थे। कभीकभी तो वे अलग मंजिलों पर भी रहे। बाद में सिमोन अपने स्टूडियो में रहीं और सात्र्र अपना मकान खरीदने से पहले अपनी मां के साथ रहे। किसी स्त्रीपुरुष के बीच यह एक ऐसा संबंध था, जिसकी पारस्परिक समझ केवल मृत्यु के द्वारा ही टूटी। इन दोनों का प्रेम मुक्त ही नहीं था, बल्कि आनंदहीन, नीरस चीजों से उन्हें असंबद्ध और मुक्त रखता था। यही वजह है कि सात्र्र के साथ अपने संबंध को सिमोन ज़िन्दगी का सबसे बड़ा हासिल मानती थीं।

‘एक सफल विवाह से प्यारा दोस्ताना और अच्छा रिश्ता और कोई नहीं हो सकता..’ मार्टिन लूथर की यह बात सोलह आने सही है। किंतु आधुनिक जीवन में सफल विवाह के कुछ सबसे बड़े शत्रु उभरकर सामने आए हैं और उनमें से प्रमुख है — ईगो, दंभ और घमंड। इन तीनों शदों के अर्थो में कुछ भेद जरूर है, पर इनकी आत्मा एक है। इनका वार एक सा है, प्रहार एक सा है और इनका असर भी एक सा है। जब तक ये तीनों ज़िन्दगी हैं, सफल विवाह दम तोड़ता नÊार आता है। हम अपनी ईगो के चलते विवाह जैसे खूबसूरत रिश्ते की बलि चढ़ाने में भी नहीं हिचकिचाते। इसके विपरीत अगर ईगो को ही बलि की वेदी पर चढ़ा दिया जाए तो विवाह जैसा संबंध हमारे जीवन में नई रोशनी भर सकता है। ईगो को टक्कर देने के लिए हमारे पास कुछ हथियार हैं और वे हथियार हैं, प्यार और त्याग.. क्योंकि अगर प्यार है तो त्याग है, और त्याग है तो रिश्ता टूट ही नहीं सकता। बल्कि वह अच्छे से फले फूलेगा और मिठासभरा होगा। जहां दंभ है, वहां प्यार नहीं रह सकता, वहां हम एकदूसरे के साथ नहीं, एक दूसरे से मिलकर नहीं, बल्कि एक दूसरे से अलग होकर जी रहे होते हैं।

जुदा होकर भी..

वूडी एलन ने स्त्री पुरुष के संबंध की तुलना शार्क से की है। वे कहते हैं कि शार्क की ही तरह किसी रिश्ते को भी आगे बढ़ते रहना चाहिए, नहीं तो उसके दम तोड़ने की गुंजाइश है। उनके इस कथन में दम है। यह विचार आजकल के जन मानस के लिए उपयोगी साबित हो सकता है, क्योंकि अब अरेंज्ड मैरिज की जगह प्रेम विवाहों की बढ़ रही है। पर इस सबके बीच कुछ प्रेम ऐसे होते हैं, जो विवाह तक नहीं पहुंच पाते और ब्रेकअप का शिकार हो जाते हैं। ज्यादातर मामलों में इन ब्रेकअप्स की वजह बहुत छोटी होती है, लेकिन उस वक्त प्रेम में आकंठ डूबे प्रेमियों को वही छोटी वजहें बहुत बड़ी नÊार आती हैं और नतीजा होता है ब्रेकअप। लेकिन प्रेमी जोड़ा कुछ समय के लिए उन वजहों को अंदाज करके किसी शार्क की तरह आगे बढ़ता जाए और उस संबंध को विवाह तक ले जाए तो इस बात की बहुत संभावना है कि फिर वे कभी अलग न हों। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह है विवाह के साथ पैकेज के रूप में आई समझदारी और सहनशीलता। इसका एक दूसरा कारण भी है कि विवाह किसी भी अफेयर से बड़ा संबंध होता है। हम किसी छोटे-बड़े कारण के चलते अफेयर को ब्रेकअप में बदल सकते हैं, लेकिन उन्हीं कारणों के चलते विवाह को तलाक में बदलने से पहले कई बार सोचते हैं। हर इंसान अपने संबंध को बचाने के लिए जी-जान लगाता है और समय के साथ विवाहित पुरुष-स्त्री जानने लगते हैं कि संबंध इतना कमजोर नहीं होता, जो छोटे छोटे झगड़ों की भेंट चढ़ जाए, लेकिन यह समझने के लिए सहनशीलता चाहिए और वह आती है विवाह के बाद ही।


प्रेम की धुरी पर घूमता है, संबंधों का चक्का

विवाह संबंध इंसान को परिपक्व बनाता है। आपको अपने आसपास कई वर्गो के कई लोग यह कहते मिल जाएंगे कि जो प्रेम-संबंध उन्होंने विवाह के बाद महसूस किया, वह पहले कभी महसूस नहीं किया। नोबेल पुरस्कार विजेता ब्रिटिश लेखक हैरॉल्ड पिंटर अपनी पत्नी के लिए लिखते हैं,
मर गया था और जिंदा हूं मैं
तुमने पकड़ा मेरा हाथ, अंधाधुंध मर गया था मैं
तुमने पकड़ लिया मेरा हाथ
तुमने मेरा मरना देखा और मेरा जीवन देख लिया
तुम ही मेरा जीवन थीं, जब मैं मर गया था
तुम ही मेरा जीवन हो और इसीलिए मैं जीवित हूं..

ऐसी बात अपनी पत्नी से गहन प्रेम संबंध के बाद ही किसी लेखक की कलम से निकल सकती है। कुछ ऐसा ही प्रेम-संबंध इमरोज ने अमृता प्रीतम के लिए महसूस किया। वह अपने संस्मरण में कहते हैं, ‘कोई भी रिश्ता बांधने से नहीं बंधता। प्रेम का मतलब होता है एक-दूसरे को पूरी तरह जानना, एक-दूसरे के जज्बात की कद्र करना और एक-दूसरे के लिए फना होने का जज्बा रखना। अमृता और मेरे बीच यही रिश्ता रहा। पूरे 41 बरस तक हम साथ साथ रहे। इस दौरान हमारे बीच कभी किसी तरह की कोई तकरार नहीं हुई। यहां तक कि किसी बात को लेकर हम कभी एक-दूसरे से नाराज भी नहीं हुए।’

इमरोज आगे कहते हैं कि ‘अमृता के जीवन में एक छोटे अरसे के लिए साहिर लुधियानवी भी आए, लेकिन वह एकतरफा मोहबत का मामला था। अमृता साहिर को चाहती थी, लेकिन साहिर फक्कड़ मिजाज था। अगर साहिर चाहता तो अमृता उसे ही मिलती, लेकिन साहिर ने कभी इस बारे में संजीदगी दिखाई ही नहीं।

एक बार अमृता ने हंसकर मुझसे कहा था कि अगर मुझे साहिर मिल जाता तो फिर तू न मिल पाता। इस पर मैंने कहा था कि मैं तो तुझे मिलता ही मिलता, भले ही तुझे साहिर के घर नमाज अदा करते हुए ढूंढ़ लेता। मैंने और अमृता ने 41 बरस तक साथ रहते हुए एक-दूसरे की प्रेजेंस एंजॉय की। हम दोनों ने खूबसूरत ज़िन्दगी जी। दोनों में किसी को किसी से कोई शिकवा-शिकायत नहीं रही। मेरा तो कभी ईश्वर या पुनर्जन्म में भरोसा नहीं रहा, लेकिन अमृता का खूब रहा है और उसने मेरे लिए लिखी अपनी आखिरी कविता में कहा है — मैं तुम्हें फिर मिलूंगी। अमृता की बात पर तो मैं भरोसा कर ही सकता हूं।’

संबंधों का सागर विशाल है। एक कुशल और अच्छा नाविक वही है, जो इस सागर में अपनी नाव तमाम हिचकोलों के बावजूद पार ले जाकर माने और वो जब भी इस सागर में डुबकी लगाए तो संबंधों का सबसे कीमती मोती ही निकालकर लाए। न केवल निकाले, बल्कि उसे सहेज कर भी रख सके, उसकी हिफाजत करे, उसका सम्मान करे।

शुक्रवार, 3 अगस्त 2012

मेरे दोस्त





मैं खुद को आज़ाद तब समझूँगी
जब सबके सामने यूँ ही
लगा सकूँगी तुम्हें गले से
इस बात से बेपरवाह कि तुम एक लड़के हो,
फ़िक्र नहीं होगी
कि क्या कहेगी दुनिया?
या कि बिगड़ जायेगी मेरी 'भली लड़की' की छवि,
चूम सकूँगी तुम्हारा माथा
बिना इस बात से डरे
कि जोड़ दिया जाएगा तुम्हारा नाम मेरे नाम के साथ
और उन्हें लेते समय
लोगों के चेहरों पर तैर उठेगी कुटिल मुस्कान

जब मेरे-तुम्हारे रिश्ते पर
नहीं पड़ेगा फर्क
तुम्हारी या मेरी शादी के बाद,
तुम वैसे ही मिलोगे मुझसे
जैसे मिलते हो अभी,
हम रात भर गप्पें लड़ाएँगे
या करेंगे बहस
इतिहास-समाज-राजनीति और संबंधों पर,
और इसे
तुम्हारे या मेरे जीवनसाथी के प्रति
हमारी बेवफाई नहीं माना जाएगा

वादा करो मेरे दोस्त!
साथ दोगे मेरा,
भले ही ऐसा समय आते-आते
हम बूढ़े हो जाएँ,
या खत्म हो जाएँ कुछ उम्मीदें लिए
उस दुनिया में
जहाँ रिवाज़ है चीज़ों को साँचों में ढाल देने का,
दोस्ती और प्यार को
परिभाषाओं से आज़ादी मिले.


आराधना चतुर्वेदी

सोमवार, 30 जुलाई 2012

भूल तो तुमसे भी हुई है





सती ने खुद को कमज़ोर जाना
अतिशय जिद्द में खुद को अग्नि में डाला
पार्वती ने भी यही समझा
पर तप की अग्नि में निखरती गयीं
बस परखना है खुद को
सुनना है ईश को
फिर देखो
तुम्हारी कोमलता में
लचीलेपन में ही परिवर्तन है ...

रश्मि प्रभा


भूल तो तुमसे भी हुई है


हे प्रभु
जब तुमने नारी को बनाया
तो क्यों उसे इतना कोमल
कमनीय बनाया कि
इस निर्मम संसार में
चहुँ ओर पसरे दरिंदों से
अपनी रक्षा करने में
वह कमज़ोर पड़ जाती है ,
और फिर जीवनपर्यंत एक
अकथनीय वेदना और
शर्मिंदगी के बोझ तले
अपने ही मन के गह्वर में
कहीं गहराई तक नीचे
गढ़ जाती है !
तुमने जब उसका
करुणा से ओत-प्रोत
अत्यंत कोमल ह्रदय
बनाया था तो साथ ही
उसमें हिमालय सा अटल
अडिग और वज्र सा कठोर
निर्णय लेने का हौसला भी
दिया होता ताकि वह
अविचलित हो
अपने अपराधियों का
सटीक न्याय कर पाती ,
और हर आताताई को
अपने समक्ष
घुटने टेकने के लिए
विवश कर पाती !
तुमने जब उसके नयनों में
बहाने के लिए
अगाध प्यार, ममता और
करुणा का गहरा सागर
भर दिया तो उसके
नैनों के तरकश में
अनवरत रूप से चलने वाले
अक्षय अग्नेयास्त्र भी
क्यों नहीं भर दिये
कि वह हर पापी को उसके
पाप का दण्ड वहीं दे
न्याय कर पाती ,
और ऐसे कई असुरों को
अपने अग्निबाणों से
भस्म कर इस धरा को
पापियों से मुक्त कर पाती !
तुमने जब संसार के
सबसे बड़े वरदान
मातृत्व का सुख उठाने के लिए
उसके शरीर में कोख बनाई
तो क्यों नहीं उसके शरीर में
ऐसी शक्तिशाली
विद्युत तरंगें भी डाल दीं
कि गंदे इरादों से उसे स्पर्श
करने वालों को छूते ही
कई हज़ार वाट का
झटका लग जाता
और वह वहीं का वहीं
ढेर हो जाता ,
और यह संसार एक
हिंसक एवं आक्रामक
आदमखोर पशु के बोझ से
उसी वक्त हल्का हो जाता !

बोलो प्रभु
मानते हो ना
भूल तो तुमसे भी हुई है !
है ना?

साधना वैद

शनिवार, 28 जुलाई 2012

देखती है दुनिया...



अडिग अटल .... कुछ हटकर - हमेशा नज़रों में आता है
फिर होती है परीक्षा , हर कोई डिगाना चाहता है
दुनिया मौन को भी नहीं बक्शती !

रश्मि प्रभा

देखती है दुनिया...



कभी एक सड़क के किनारे एक भिखारी बैठा करता था... वो हमेशा भीख में १ रु. का सिक्का ही लेता था, कोई ज्यादा देना भी चाहे, तो मना कर देता था... एक दिन एक व्यक्ति उसकी परीक्षा लेने के उद्देश्य से उसके पास गया और उसे १०००/- का नोट निकाल कर देने लगा...उस भिखारी ने इंकार की मुद्रा में सिर हिलाते हुए व्यक्ति की तरफ मुस्कुरा कर देखा...
व्यक्ति ने हैरत से पूँछा, "क्यों नहीं ?"...
भिखारी ने उसी तरह मुस्कराहट को होंठों पर सजाये रखा और धीरे से जवाब दिया,
"बाबूजी, आप भी मुझे १०००/- का नोट इसलिए दे रहे हैं, क्योंकि आपको पता है कि मैं लूँगा नहीं... आप जैसे कई आते हैं मेरी परीक्षा लेने के लिए... कई तो रोज इसी चाहत में आते हैं कि किसी दिन तो मेरा ईमान डिगेगा और १/- का सिक्का देकर चले जाते हैं... अगर मैं यहाँ सिर्फ भीख मांगने बैठा होता, तो कोई ५० पैसे का सिक्का भी नहीं देता, उलटे दुत्कार कर और चला जाता..."
" ये दुनिया एक भीड़ है, बाबूजी और जो भी इस भीड़ से अलग हटकर खड़े होने की हिम्मत दिखाता है, उसी को ये दुनिया देखती है और सिर माथे पर बैठाती है..."

शिक्षा:- दुनिया लीक पर चलने वालों को भाव नहीं देती, इसलिए लीक से हट कर चलने कि हिम्मत दिखाइए... एक कहावत भी है,

" लीक-२ गाड़ी चलै, लीकहि चलै कपूत..
ये तीनों उलटे चलें, शायर, सिंह, सपूत..."


डा. गायत्री गुप्ता 'गुंजन'
http://drgayatri10.blogspot.in/
http://jyotishaahvan.blogspot.in/
http://drgayatrigunjan.blogspot.in/

शुक्रवार, 20 जुलाई 2012

और मिल गयी मैं मुझको !



पता नहीं कब कहाँ मैं
मुझसे बिछड़ गयी हूँ
नहीं...किसी भीड़ में नहीं थी
फिर भी खो गयी हूँ !

पहले ढूँढा खुद को मैंने
उस तारीफों से भरे संदूक में
जो प्यार से कभी मिली थीं मुझे ....
अपनों से , अन्जानों से
बोहत संभालकर रखी थी मैंने
सारी की सारी ....यादों के लॉकर में
कुछ झूठी थीं...कुछ सच्ची थीं
छोटी-छोटी ही सही पर अच्छी थीं
मीठी -मीठी उन सौगातों में
सोचा शायद थोड़ी सी मिल जाऊं खुद को
ठीक से ढूँढा मैंने...
पर नहीं मिली मैं मुझको..................

फिर सोचा खोजूं खुद को
कविताओं में...नज्मों में
जो टांक दी थी मैंने....कागज़ के सीने पर ....
लगा ,शायद किसी शब्दों की इमारत तले
जान बूझकर....... दब गयी हूँ ?
या फिर भूल आई हूँ खुद को
गलती से ......किसी अधूरी ग़ज़ल में ?
या शायद बाँध दिया हो रूह को अपनी
किसी रूपक में .....बेवजह ही ...बावली हूँ ना
बहुत ढूँढा मैंने खुद को
लफ्ज़ दर लफ्ज़ ...
खंगाल डाला
ज़ज्बातों के समुंदर को
पर नहीं मिली मैं मुझको............

मेरी परछाईं भी तो लापता थी
रपट दर्ज थी उसकी भी दिल-ओ-दिमाग में
वर्ना उसी से पूछ लेती .....
फिर ख्याल आया
किसी की आँखों में ढूँढूं
शायद वहीँ महफूज़ होंगी
पर उतनी पास कोई कहाँ था …..
परेशां होकर ......दौड़कर फिर गयी
आईने के पास....
सोचा वहां तो ज़रूर पाउंगी खुद को
पर ये क्या …आईना भी खाली था ……
मेरे भीतर की तरह ...इकदम खोखला ....
और फिर नहीं मिली मैं मुझको .........

कबसे ढूंढ रही हूँ खुद को
हाथ की हथेलियों में
ज़िन्दगी की पहेलियों में
बीते हुए कल के अंधेरों में
आने वाले कल के कोहरों में
सब से तो पूछ लिया
सब जगह तो देख लिया ….
नहीं मिल रही ……मैं मुझको …………
नहीं मिल रही ……मैं मुझको …………

किसी ने बताया था मुझे …
मेरा पुराना पता ……
किसी छोटे से सपने के
बड़े से घरौंदे में रहती थी मैं
ख़ुशी -ख़ुशी …….तितलियों जैसी ..
खैर....अब वहां कोई दूसरा किरायेदार रहता है ….

घर लौटी जब थक हारकर
रोई खूब मैं फूंट-फूंट कर …
बोहत देर बाद अचानक किसी ने आकर
(खुदा ही होगा )
आँखों पर जैसे इक चश्मा पहनाया
पलकों पर जमी धूल हटाया
और दिखाया ………….
की किसी कोने में जब
बिखरी-बिखरी सी पड़ी थी मैं
तो माँ-पापा ने कैसे
टुकड़े -टुकड़े तिनका -तिनका जोड़कर मुझे
अपनी दुआओं में .......सहेज कर......... रख लिया था
पाँच साल की गुड़िया जैसे ........
पापा के अक्स की छाँव तले
माँ के आँचल में लिपटी
कितने सुकून से तो थी मैं
दुनिया की सबसे सलामत जगह पर ...
ना आँखों में डर था,ना दिल में बेचैनी
लगा की कहीं खोयी ही नहीं थी मैं कभी
हमेशा से वहीँ तो थी.....
माँ-पापा की दुआओं में............महफूज़!


सौम्या