बुधवार, 29 अगस्त 2012

प्रेम क्या है? (what is Love?)





Amit Tiwari


एक छोटा सा प्रश्न लेकिन अनेक उत्तर. एक ऐसा प्रश्न जिसके लिए हर किसी के पास अपना एक अलग उत्तर है. जिस जिस से पूछा जाए वह इसके लिए कुछ अलग उत्तर दे देता है. सबकी अपनी परिभाषाएं हैं प्रेम को लेकर. बहुत बार बहुत सी विरोधाभाषी परिभाषाएं भी.
मैं सोच रहा हूँ कि क्या प्रेम वास्तव में ऐसा है कि जिसकी कोई नियत परिभाषा ही नहीं बन पायी है. क्या प्रेम सचमुच ही ऐसा है कि इसका स्वरुप देश-काल और परिस्थिति के अनुसार परिवर्तित होता रहता है? क्या प्रेम का अपना कोई स्वरुप, अपनी कोई पहचान नहीं है?
क्या वास्तव में लोगों की भावनाओं के अनुरूप रूप ग्रहण कर लेना ही प्रेम का स्वरुप है? क्या प्रेम व्यक्तिगत या वस्तुगत हो सकता है? जिसके नाम पर हर रोज़ इतनी घृणा फैलाई जा रही है, क्या वही प्रेम है? क्या प्रेम महज एक दैहिक अभिव्यक्ति से अधिक कुछ भी नहीं? क्या किसी विपरितलिंगी के प्रति मन में उठ रही भावनाएं ही प्रेम हैं?
कदापि नहीं !!!
यह जो कुछ भी है वह प्रेम नहीं हो सकता. वह प्रेम हो ही नहीं सकता कि जो लोगों की भावनाओं के अनुरूप रूप ले लेता हो. वह प्रेम कदापि नहीं हो सकता है जिसके मूल में ही घृणा पल रही हो. प्रेम तो स्वयं एक सम्पूर्ण भाव है. प्रेम किसी के चरित्र का हिस्सा नहीं वरन स्वयं में एक पूर्ण चरित्र है.
प्रेम तो कृष्ण है, वह कृष्ण जिसके पाश में बंधकर गोपियाँ-ग्वाले और गायें सब के सब चले आते हैं.
प्रेम तो राम है, वह राम जिसके पाश में कोल-किरात भील सभी बंधे हुए हैं.
प्रेम तो ईसा है, वह ईसा जो मरते समय भी अपने मारने वालों के लिए जीवनदान की प्रार्थना करता है.
प्रेम बुद्ध है, वह बुद्ध जिसकी सैकड़ों साल पुरानी प्रतिमा भी करुणा बरसाती सी लगती है.
प्रेम बस प्रेम है.
प्रेम पुष्प की वह सुगंध है, जो बिना किसी भेद के सबको आह्लादित कर दे. प्रेम की गति सरल रेखीय नहीं है. प्रेम का पथ वर्तुल है. वह अपनी परिधि में आने वाले हर जीव को अपनी सुगंध से भर देता है. प्रेम करने का नहीं, वरन होने का भाव है. प्रेम स्वयं में होता है. प्रेम किसी से नहीं होता है, वरन वह किसी में होता है और फिर जो भी उस प्रेम की परिधि में आता है उसे वह मिल जाता है, बिना किसी भेद के. प्रेम किसी भी प्रकार से व्यक्ति-केन्द्रित भाव नहीं है.
यह कहना कि "मैं सिर्फ तुमसे प्रेम करता/करती हूँ." इस से बड़ा कोई झूठ नहीं हो सकता है.
लेकिन फिर ऐसे में यह भ्रम होना स्वाभाविक है कि आखिर वैयक्तिक रूप से अपने किसी निकटवर्ती साथी, सम्बन्धी, मित्र या किसी के भी प्रति मन में उठने वाली भावना क्या है?
वह निस्संदेह प्रेम नहीं हैं, वरन प्रेम से इतर भावनाएं हैं, जिन्हें प्रेम मान लिया जाता है. प्रेम को समझने से पहले हमें कुछ शब्दों के विभेद को भी समझ लेना होगा.
प्रेम, प्यार, मोह (मोहब्बत) और अनुराग (इश्क) परस्पर समानार्थी शब्द नहीं हैं, बल्कि इनके अपने अर्थ और अपनी मूल भावनाएं हैं.
प्रेम शक्ति चाहता है, (Prem seeks Power )
प्यार को अपनी अभिव्यक्ति के लिए काया चाहिए. ( Pyar seeks Body ).
मोह (मोहब्बत) माधुर्य चाहता है, (Moh seeks Maadhurya ).
अनुराग (इश्क) आकर्षण चाहता है. ( Anurag seeks Attraction ).
प्रेम शक्ति चाहता है. यह शक्ति शरीर की नहीं, मन की शक्ति है. एक कमजोर व्यक्ति सब कुछ तो कर सकता है. वह विश्व-विजयी हो सकता है, प्रकांड विद्वान् हो सकता है, परन्तु उसमे प्रेम नहीं हो सकता है.
प्रेम का मूल निर्मोह है. निर्मोह के धरातल पर ही प्रेम का बीज अंकुरित होता है. निर्मोह की शक्ति के बिना प्रेम की प्राप्ति नहीं हो सकती है. पुष्प अगाध और निस्वार्थ प्रेम का प्रतीक है. वह प्रेम रुपी सुगंध बिना किसी भेद के फैलाता है, लेकिन कभी किसी के मोह में नहीं आता. कोई दिन-रात बैठकर पुष्प के सुगंध की चर्चा करता रहे, लेकिन फिर भी पुष्प उसके मोह में नहीं आता. वह उसके जाने के बाद भी उसी प्रकार सुगंध फैलाता रहता है. वह एक निश्छल बालक के लिए भी उतना ही सुगन्धित होता है, जितना कि किसी भी अन्य के लिए.
प्रेम प्राप्ति का माध्यम नहीं है. प्रेम बंधन भी नहीं है. प्रेम तो मुक्त करता है. प्रेम जब अंकुरित हो जाता है तब प्राणिमात्र के बीच भेद नहीं रह जाता.
किसी की माँ को गाली देने वाला, अपनी माँ से प्रेम नही कर सकता. किसी भी स्त्री का अपमान करने वाला, अपने परिवार की स्त्रियों से प्रेम नहीं कर सकता. किसी के बच्चे पर हाथ उठा रही माता को अपने पुत्र से मोह तो हो सकता है, लेकिन उसके मन में सहज प्रेम नहीं हो सकता.
प्रेम जब होता है, तब सिर्फ प्रेम ही होता है. प्रेम किसी से नहीं होता है, प्रेम किसी में होता है, ठीक वैसे ही जैसे कि पुष्प की सुगंध हमसे या आपसे नहीं है, वह पुष्प में है, जो सबके लिए है.
बस यही प्रेम है.



अमित तिवारी
समाचार संपादक
निर्माण संवाद

शनिवार, 25 अगस्त 2012

सच्चे कवि लिखते नहीं




कुछ लोग लिखते नहीं
नुकीले फाल से
सोच की मिट्टी मुलायम करते हैं
शब्द बीजों को परखते हैं
फिर बड़े अपनत्व से उनको मिट्टी से जोड़ते हैं
उम्मीदों की हरियाली लिए
रोज उन्हें सींचते हैं
एक अंकुरण पर सजग हो
पंछियों का आह्वान करते हैं
पर नुकसान पहुँचानेवाले पंछियों को उड़ा देते हैं
कुछ लोग -
प्रथम रश्मियों से सुगबुगाते कलरव से शब्द लेते हैं
ब्रह्ममुहूर्त के अर्घ्य से उसे पूर्णता दे
जीवन की उपासना में
उसे नैवेद्य बना अर्पित करते हैं
.....
कुछ लोग लिखते नहीं
शब्दों के करघे पर
भावों के सूत से
ज़िन्दगी का परिधान बनाते हैं
जिनमें रंगों का आकर्षण तो होता ही है
बेरंग सूत भी भावों के संग मिलकर
एक नया रंग दे जाती है
रेत पर उगे क़दमों के निशां जैसे !...


रश्मि प्रभा

सच्चे कवि लिखते नहीं


अपने शब्दों से खरीद ली थी
कुछ रोटियां
कुछ ज़ज्बात

वो ज़ज्बात
आंसू बन गिरे थे
मेरे काँधे पर,
कमीज के रेशों में कही खो गए.
वो रोटी
हलक से नीचे ना उतर पायी
कितनी बार ...........बनाया
गले को बहरूपिया
तब जाके वो कौर, निगल पाया.

मान बैठा था खुद को रचयिता
कवि, गज़ब का.

बुजुर्गों ने समझाया भी--
सच्चे कवि लिखते नहीं
रचयिता कुछ रचता नहीं.
उस चिलम फूंकते बुड्ढे ने कहा था--
शब्दों के सूअर, समय कसाई हैं
काट देगा.

मुझे याद हैं
भीड़ से हटके खड़े, उस बच्चे की चीख
तालियों की गूंज में
कही खो गयी थी.
लगातार घूरता जा रहा था
अपनी क्षोभ भरी आँखों से मुझे.
उसने फेंका भी था
अपने ज्वर ग्रस्त हाथो से एक पत्थर
मेरी तरफ.

धन्यभाग, मेरी कुर्सी कुछ ऊँची थी
मैं बच गया.!

आज सालो बाद
जाने कहा से वो पत्थर लग गया.

अपने एहसासों के कन्धों पर
जा रहा हूँ मरघट तक
जलूँगा आज अपने ही वर्कों में

समय कसाई था, मुझे काट दिया
आज ये बोध हुआ,
में फकत शब्द हूँ , कवि नहीं
क्योंकि ....
कवि कभी मरता नहीं


-अहर्निशसागर-

शुक्रवार, 24 अगस्त 2012

क्यूँ बने सती-सावित्री जब सत्यवान कहीं नहीं...






पूरी ज़िंदगी हम लड़कियों को ये कह कर पाला जाता है कि दूसरे के घर जाना है ये करो...ये मत करो...कभी कुछ गलती हो जाए तो भी यही सुनने मिलता है...कल को दूसरे घर जाएगी तो वहाँ सब कहेंगे माँ-बाप ने नहीं सिखाया...खाना बनाना आना चाहिए,घर के काम आने चाहिए,पढ़ाई-लिखाई तो ठीक है लेकिन सिलाई-कढ़ाई मे भी निपुण रहो...कोई कुछ भी कह दे कभी पलट कर जवाब मत दो...हर बड़े का आदर करो चाहे वो कैसा भी हो...पूजा-पाठ मे लगे रहो..मेहमान चाहे कितना भी बेशर्म हो उसके साथ अच्छी तरह पेश आओ...एक तरह से दुनिया भर की सारे गुण तुम्हारे अंदर होने चाहिए और इसी तरह हमारे सीरियल्स की हीरोइनों को भी दिखाया जाता है क्यूंकी हमारी नज़र मे शायद एक अच्छी बेटी और बहू का पैमाना ही ये है...

और हम बस इस पैमाने पर खरे उतरने के लिए सारी ज़िंदगी कोशिश मे लगी रहती हैं...इस उधेड्बुन मे कि क्या सही है क्या गलत...हम कभी ज़िंदगी जी ही नहीं पाते...और कई बार अपनी कोशिशों मे गलत साबित होते हैं...गलतियाँ करते हैं...दुखी होते हैं पश्चाताप होता है कि अब तक जो अच्छी लड़की का रूप सबके सामने आया था...वो कहीं मिट तो नहीं गया...और फिर उसे वापस पाने की जद्दोजहद शुरू हो जाती है...इस तरह जब ज़िंदगी के वो सारे पल निकल जाते हैं जिन्हे हमें जीना था...अपने परिवार के साथ...और जब दूसरे घर जाने का असली वक़्त आता है ऐसे समय मे हम क्या चाहते हैं...?सालों परिवार के साथ रहकर जिस ट्रेनिंग से गुजरते हुये अपनी ज़िंदगी काटी...उसे भूलकर कुछ दिन तो खुलकर जीने मिले न जाने आने वाला समय कैसा हो...न जाने वो लोग कैसे होंगे...कम से कम इन कुछ दिनों को तो अपने परिवार के साथ खुलकर जी लें...जहां न तो पहले वाली बन्दिशें हों न आने वाले दिनों का डर...पर शायद कुछ ही लोग होते हैं जो इन पलों को भी इस तरह जी पाते हैं क्यूंकी इन दिनों मे जब हम अपनों का साथ और उनका स्नेह चाहते हैं हमें मिलती है हर पल सलाह...जाने वाले घर मे कैसे व्यवहार करना है...कैसे रहना है...तो क्या हमारे अपने परिवार को सिर्फ उस दूसरे घर की फिक्र होती है जहां हम जाने वाले है...उन्हे क्यूँ लगता है कि उनकी बेटी किसी दूसरे घर मे सिर्फ तभी खुश रह सकती है जब वो उनके लिए हर पल काम करे या अच्छा खाना बनाकर खिलाये...

क्यूँ नहीं वो ये सोचते कि जब वो दूसरे घर के लड़के को अपने घर के हिसाब से नहीं बदलना चाहते,वैसे ही वो भी इनकी बेटी को जैसी वो है वैसे ही अपनाए...क्यूँ हम लड़की के लिए ज्यादा से ज्यादा गुण बताना चाहते हैं...हर एक का अपना गुण होता है और मैंने आजतक किसी ऐसे को नहीं देखा जिसमे सिर्फ गुण हों...उन्होने तो अपने लड़के को कभी नहीं टोका...पर आपने तो अपनी लड़की को कभी अपने मन से एक कदम भी नहीं उठाने दिया...जबकि आपको तो अपनी लड़की के पैदा होते साथ ही ये पता था कि वो हर वक़्त आपके साथ नहीं रहेगी..फिर तो उसे और भी खुलकर जीने देना चाहिए...मैं ये नहीं कहती कि उसका मार्गदर्शन नहीं करना चाहिए...लेकिन सिर्फ एक लड़की होने के कारण उसके लिए एक अलग नज़रिया अपनाना सरासर गलत है...

आज आपके कहे अनुसार चलती है...कल दूसरे घर जाकर उनके हिसाब से चलेगी....तो वो वक़्त कब आएगा जब वो अपने मन की करेगी,जब वो बिना किसी रोकटोक की फिक्र किए खुलकर जिएगी...क्या कभी ऐसा कोई पल उसकी ज़िंदगी मे आएगा...?

अपनी ज़िंदगी से खुद के लिए दो पल निकालना कइयों के लिए इतना मुश्किल होगा...सोचा ना था....

नेहा
मैं ख़ुद को पानी की तरह मानती हूँ....सबके साथ मिल जाना मेरी प्रकृति है...बावजूद इसके मेरा अपना एक वजूद है...जो निरंतर प्रगतिशील है.....

सोमवार, 20 अगस्त 2012

बहन-रक्षा का प्रण लेने की जरुरत नहीं





अभी पिछले हीं दिन अखबार में छपी एक खबर में पढ़ा था बारहवीं की एक छात्रा के साथ हुए सामूहिक बलात्कार के मुख्य नामजद अपराधी प्रशांत कुमार झा तीन बहनों का भाई है, उसकी बहन के बयान से शर्मिंदगी साफ़ झलक रही थी और छोटी बहन तो समझ भी नहीं पा रही उसके भाई ने किया क्या है | बस यही सोच रही थी की आज राखी के दिन क्या मनः स्थिति होगी ऐसी बहन की जिसका भाई बलात्कार के जुर्म में जेल गया हो ...............

तेरे हिस्से की राखी आज जला दी मैंने
इस बंधन से तुझको मुक्ति दिला दी मैंने
अफ़सोस तेरी बहन होने के अभिशाप से छुट ना पाउंगी
अपनी राखी की दुर्बलता पर जीवन भर पछ्ताउंगी
मुझ पर उठी एक ऊँगली, एक फब्ती भी बर्दास्त ना थी
सोचती हूँ कैसे उस लड़की का शील तुमने हरा होगा ?
वर्षों का मेरा स्नेह क्यूँ उस वक़्त तुम्हे रोक सका नहीं?
क्यूँ एक बार भी उसकी तड़प में तुम्हे मेरा चेहरा दिखा नहीं?
इतनी दुर्बल थी मेरी राखी तुझको मर्यादा में बाँध ना सकी
शर्मशार हूँ भाई, कभी तेरा असली चेहरा पहचान ना सकी
उधर घर पर माँ अपनी कोख को कोस कोस कर हारी है
तेरे कारण हँसना भूल पिता हुए मौन व्रत धारी हैं
सुन ! तेरी छुटकी का हुआ सबसे बुरा हाल है
अनायास क्यूँ बदला सब, ये सोच सोच बेहाल है
छोटी है अभी 'बलात्कार' का अर्थ भी समझती नहीं
हिम्मत नहीं मुझमे, उसे कुछ भी समझा सकती नहीं
पर भाई मेरे, तु तो बड़ा बहादुर है, मर्द है तु
उसको यहीं बुलवाती हूँ , तु खुद हीं उसको समझा दे
बता दे उसे कैसे तुने अपनी मर्दानगी को प्रमाणित किया है
और हाँ ये भी समझा देना प्यारी बहना को, वो भी एक लड़की है
किसी की मर्दानगी साबित करने का वो भी जरिया बन सकती है
अरे ये क्या, क्यूँ लज्जा से सर झुक गया, नसें क्यूँ फड़कने लगीं ?
यूँ दाँत पिसने , मुठ्ठियाँ भींचने से क्या होगा ?
कब-कब, कहाँ-कहाँ, किस-किस से रक्षा कर पाओगे?
किसी भाई को बहन-रक्षा का प्रण लेने की जरुरत नहीं
खुद की कुपथ से रक्षा कर ले बस इतना हीं काफी है
जो मर्यादित होने का प्रण ले ले हर भाई खुद हीं
किसी बहन को तब किसी रक्षक की जरुरत हीं क्या है?

आलोकिता गुप्ता

रविवार, 19 अगस्त 2012

बेटियाँ




उन्होंने एक ही रजाई में
अपने सुख दुःख बाटें है |
वाचलता से नही ,
एक दूसरे की सांसो से
एक ही रजाई में सोना,
उनका आपस में प्यार नही ,
उनकी मजबूरी थी |
क्योकि लड़कियों को हाथ पाँव पसारकर ,
सोने की अनुमति नही थी |
उनके उस घर (जो उनका कभी नही था )में ,
उनके दादा दादी ,पिताजी, चाचा,भाई सबका
बिस्तर पलंग प्रथक होता
सिर्फ़ थकी मांदी माँ और बेटियों का बिस्तर
साँझा होता था |
बिस्तर ही क्यो ?
उनके कपडे भी सांझे होते|

उनकी योग्यता ,उनकी प्रतिभा को
सदेव झिड्किया मिलती |
किनतु उन लड़कियों
ने अपने पूरे परिवार के लिए न जाने
कितने ही व्रत उपवास रखे
उनकी खुशहाली की कामना की |
क्योकि
वे उस परिवार की बेटियाँ थी......


शोभना चौरे

गुरुवार, 16 अगस्त 2012

वह







जब कोई ज्वाला बुझ जाती है
तो समाज ....
अपनी नींद हराम नहीं करता
पर जब कोई ज्वाला धधकने की जगह बढाती है
तो समाज...
कहता है आजिजी से
औरत जात पर कलंक है !!! :(

रश्मि प्रभा


परे ढ्केल अपने दुधमुंहे बच्चे को,
वह, मुंहअंधेरे उठ गई ।
अंगडाई के लिये उठ्ते हाथ ,
पीडा से जहां के तहां रुक गये ।
फ़िर, उसने उचट्ती निगाह डाली
अपने सोये पति पर
और घूम गया , कल रात का वह दॄश्य
जब पी कर उसे पीटा गया था ।
वह पिट्ती रही बेहोश होने तक।
जब होश आया, वह सहला रहा था ,
उसका बदन ।
उसकी निगहों में थी दीनता ,
याचक की भांति गिडगिडा रहा था ।
वह जड बनी साथ देती रही, उसका ,
जड्ता से भी तृप्त हो सो गया वह,
और
सुलगती रही सूखी लकडी की तरह वह ।
बरबस उठ गई निगाहें ,
अपनी झोंपडी की तरफ़
कुल चार हाथ लम्बी , दो हाथ चौडी जगह।
काफ़ी है उसके चार बच्चों ,पति
और स्वयं के लिये ।
वह तो अच्छा है , चार पहले ही चल बसे,
वरना.............?
सोच कर उसकी आह ,निकल जाती है ।
बच्चे के करुण क्रन्दन ने रोक दिया विचारों का तांता,
शायद भूखा है ।
उसके पास अब था ही क्या ,
जो उसकी भूख मिटाता ।
छातियों का दूध भी , आखिरी बूंद तक निचुड चुका था ।
उसे एक घूंट पानी पिला ,
वह हड्बडाती उठी,
कब तक बैठी रहेगी ?
जल्दी चले वरना ,
सारे कागज पहले ही बीन लिये जाएगें ,
और वह कूडे को कुरेदती रह जाएगी ।
फ़टी चादर लपेट ,
पैंबद लगा बोरा उठा ,
नंगे पांव ,
ठिठुरती सर्दी में ,
सड्क पर आ गई वह।
अभी दिन भी नहीं निकला था , पूरी तरह ।
इधर- उधर से कुत्तों ने मुंह उठाया,
फ़िर से दुबक गए,
शायद पह्चानने लगे थे ,उसकी पद्चाप ।
वह चलती गई, चलती गई........गई,
लडखडाती ....
कांपती ....
कुलबुलाती....
ठिठुरती......
अब, वह सब कुछ भूल चुकी थी ,
मंजिल थी ............कूडे का ढेर
एक मात्र ध्येय.......
आंतिम ल्क्ष्य....
सारा संसार वृक्ष बन गया था उसके लिये,
और कूडे का ढेर चिडिया की आंख ,
जहां उसे , अपनी पडॊसन से पहले
पंहुचना था...........


पूनम जैन कासलीवाल

बुधवार, 15 अगस्त 2012

एक लड़की ..............






एक लड़की नेहा नाम है उसका , किस्मतवाली है जो उसे उसका नाम मिला वरना वह भी उन्ही लड़कियों में शामिल हो जाती जिनका कोई नाम नहीं होता । माँ के गर्भ में आते ही यह जान लिया जाता है कि बेटी है या बेटा और यदि बेटी होती तो उसके जन्म लेने का सवाल ही नहीं उठता फिर कैसा नाम और कैसी पहचान । वो माँ जिसके गर्भ में वो आई थी सिर्फ उसे ही पहचान होती है कि उसके गर्भ में भी एक नन्ही कली है पर चाह कर भी वो उसे नहीं बचा नहीं सकती । दोनों के बीच एक रिश्ता होता जो सिर्फ और सिर्फ उस के द्वारा ही महसूस किया जाता जो उससे जुड़ा होता ।
नेहा को अपने वजूद के लिए संघर्ष करना था लेकिन यह संभव नहीं था क्योंकि अभी तो वह अपनी माँ के गर्भ में सिर्फ तीन महीने की ही तो थी । वो जन्म लेगी या नहीं इसका निर्णय उसकी माँ भी नहीं कर सकती थी । नेहा अपनी तीन बहनों के बाद चौथे नंबर पर जन्म लेती शायद इसीलिए जब वे लोग जान गए कि लड़की जन्म लेगी तो नहीं चाहते थे कि नेहा का जन्म हो । लड़के की चाहत में तीन बेटियां पहले ही हो चुकी थी । परिवारवालों ने निर्णय लिया कि नेहा को जन्म लेने ही नहीं दिया जायेगा , अर्थात भ्रूण हत्या होना निश्चित था । नेहा की माँ भी इसके लिए तैयार थी , शायद मज़बूरी में । इस काम के लिए वो मेरे घर पटना आई । जब मेरी माँ को पता चला कि वो इसीलिए आई है तो एकदम गुस्सा हो गयी और समझाया कि इसे जन्म लेने दो , वैसे भी वे लोग चार महीने का गर्भपात करवाना चाहते थे जो खतरनाक था । माँ ने समझाया कि शायद इसके जन्म के बाद ही बेटा हो। इस तरह उन्हें समझाने में माँ को काफी समय लगा तब जाकर वे लोग माने । इस तरह नेहा का जन्म संभव हो सका और वो अपना नाम पा सकी । कितना वाद - विवाद और मुश्किलों का दौर रहा होगा वो । शायद माँ के गर्भ में नेहा भी महसूस करती होगी ।
नाम तो उसे जन्म से ही मिल गया लेकिन उसके साथ -साथ उसकी माँ को भी बेटा नहीं होने के ताने सुनने पड़े । नेहा के बाद उसका भाई पैदा नहीं हुआ । दुःख तो उसके माता - पिता दोनों को था लेकिन समय के साथ उन्होंने उसे अपनी किस्मत समझ ली । उसके बाद वे लोग मेरे घर कभी नहीं आये । एक तरह से सम्बन्ध ही टूट गया ।
अभी कुछ दिनों पहले नेहा की नानी का फोन मेरे पास आया था कि नेहा का सलेक्शन मेडिकल में हो गया है । अपने परिवार की पहली लड़की नेहा है जो मेडिकल की पढाई कर रही है और उसकी जिंदगी की यह नयी शुरुआत पटना में मेरे घर से ही हुई । उसके माता-पिता मेरी माँ से आशीर्वाद दिलाने के लिए लाये थे। ख़ुशी का ठिकाना नहीं था। नेहा अपने परिवार के लड़कों को पछाड़ कर आगे बढ़ गयी है । अब उसके माता-पिता को बेटा नहीं होने का गम नहीं है और समाज में होनहार बेटी के पिता के रूप में काफी सम्मान हो गया है ।
इश्वर करे ये बेटी खूब आगे बढे .......................



डॉ संध्या तिवारी