मंगलवार, 3 नवंबर 2015

मील के पत्थर (४)




भावनाओं के रास्ते अंतहीन होते हैं, कई भाव स्तम्भ की तरह मिलते हैं, जिनसे टेक लगाकर बैठना, उनसे अपनी भावनाओं के तार जोड़ना असीम सुकून देता है  … 


आज भावों का स्तम्भ हैं 
© आशा चौधरी,  संपादक- भारतकोश

सपने


एक डग रख कर 
जब डग दूसरा
बढ़ाया था
जाने अनजाने 
एक गठरी सी 
बंध गयी थी 
मेरे साथ 
सपनों की

पता ही नहीं चला 
कि कब 
इस ज़िन्दगी के 
सफ़र में चलते चलते 
वज़न बढ़ता गया
सपनों का
जब तक समझ में आया
सपने बहुत भारी हो गये थे
और सफ़र मुश्किल...

धीरे धीरे सपनों का
वज़न कम करना 
शुरू कर दिया
हर मोड़ पर उतार रखा
एक सपने को 
और उम्र के इस पडाव पर
जब सपनों की सुध ली
तो देखा 
वो सपने तो मेरे 
थे ही नहीं…

अपने सपने तो सबसे पहले
उतार कर रख दिए थे
किसी मोड पर
और जो साथ थे
वो ना मेरे थे
और ना ही उनकी
थी ज़रूरत अब…

आँख खुली तो
सपने नहीं हैं
और जब सपने थे
तो एहसास ही नहीं था...
सपनों का...



मैं तो कृष्ण हूँ


तू मेरी राधा
मेरी मीरा
मेरी रूक्मणी
मेरी सत्यभामा
तू जामवंती, सत्या,
भद्रा, लक्ष्मणा,
मित्रविंदा और कालिंदी भी
और गोपियाँ भी

सारा प्यार तुम्हारा
समर्पण तुम्हारा
प्यार तुम्हारा
विश्वास तुम्हारा
सब तुम्हारा
पर मैं ?

मैं तो कृष्ण हूँ
राजनीति मेरी
चालें मेरी
व्याख्याएँ भी मेरी
मैं किसी एक का नहीं
इसीलिए
मेरा कोई सहचर नहीं
मेरे पास ज्ञान है
महाभारत है
गीता है
ब्रह्माण्ड है
मैं कभी मरता नहीं
इसलिए कभी जीता भी नहीं
मेरे पास हृदय नहीं
सिर्फ़ मस्तिष्क है
साम दाम दण्ड भेद
कुछ भी करना हो
अंत में जीतता तो
मैं ही हूँ
जीतता हूँ
योग से
शक्ति से
छ्ल से
माया से
छाया से।
उद्देश्य नहीं
मेरे लक्ष्य होते हैं
छ्ल, प्रपचं
सब रचता हूँ
और इस सब में
मैं भी हारता हूँ
मैं ही हारता हूँ...

सोमवार, 2 नवंबर 2015

मील के पत्थर (३)




कई चेहरे जीवंत पांडुलिपियाँ होती हैं, जिनका प्रकाशन मस्तिष्क करता है,  !.... 
पढ़ते हुए शब्द धमनियों में प्रवाहित होते हैं, और बीमार मन, अकेले मन के सहयात्री बन जाते हैं ! मीलों रास्ते पल भर में बदल जाते हैं, एक सारांश सा मिल जाता है अपनी सोच, अपनी चाह का  .... 
मिलिए अंजना टंडन से 

(1 )
सुनो
अगर तुमसे पहले
कभी मैं चला जाऊँ
तो,
मेरी कब्र पर, तुम
रोज़ मत आना,
फूल भी मत लाना,
सिर्फ
घर बैठ कर
चार काम करना....!!!!
सुबह सुबह
अपने बिस्तर पर
मेरी वाली साईड के
तकिये को गले से लगा,
अपनी मधुर श्वासों
से भर देना.....
......
फिर चढी दोपहरी
मेरी कमीज़ की
तह खोल,हाथ फिराना
सूँघना ,सहलाना
फिर से तहाना
और, साथ ही
बाईं तरफ की जेब में
जरा सा हाथ डाल देना,
मेरा धड़कता सा दिल
तुम वहीं पाओगी....
..........
शाम ढले
बाहर बगिचे में
मेरी पसंद के
पेड़ों के झुरमुट तले बैठ
फुदकती, घर लौटती
गिलहरियों को देखना,
उनकी धारियाँ गिनना,
तुम कहती थी ना, कि
" जितनी धारियों वाली
दिखाओगे, उतनी बार मैं
तुमको प्यार करूँगी "
चीटिंग मत करना......
............
और, देर रात
उसी तरह तैयार होकर
एक एक कर जूड़े में से
पिन निकालना,
बुन्दे खोलना
इत्र लगाना
और फिर, आइने में
देख, अपनी आँखों के
सारे शून्य
एक एक करके
जमा करना,
उनसे पहले मेरी
एक खनकती सी, प्यार भरी
मुसकराहट लगा देना,
पूरी रात के लिए वो
काफी होगी.....!!!
और हाँ,
सुबह होने से पहले
पोरों से हथेली पर मेरा नाम लिख
अपनी पलकें रख देना
चार थमे से, घुटते हुए से
आँसू बहा देना...!!!
मेरी कब्र पर
तुरन्त से
चार फूल उग आयेंगें.....
बस और कुछ नहीं करना 
मेरी कब्र पर तुम मत आना...!!!



(2 )
उम्र की सीढ़ियाँ चढ़ते चढ़ते
पहुँच गई थी
उस घाट तक , जहाँ
निर्लिप्तता का एकान्त था,
सरोवर में व्याकुलता नहीं
एक निस्संग तल्लीनता थी,
उस पल में अटकी थी सालती सी
एक लुढ़कते आत्मविश्वास की गंध,
किनारे पर खड़े बरगद के
शुष्क पत्ते निस्पृहता से
पानी की कगार पर
डूबक डूबक के
अंतिम यात्रा पर थे,
दूर दूर तक फैली थी एक
उदास धूप की पीली सुगंध,
इसके पहले कि
अवसाद का विलाप
मुझ पर आलम्बित होता,
सुनाई दिया
जल की सतह पर
फूटते बुलबुलों का हास्य,
ये कैसा एक
हवा का ताजा झोंका,
शायद
जीवन था कहीं तली में,
बस ज़रूरत थी
फेफड़े भर के
एक
गहरी डुबकी की,
इस छोर पर मैं
मंथर ही सही
पर गतिमान हो
निगल लेती हूँ
वो अटकते
हलक के काँटें,
उलटी कलाई से आँखें पौंछ
समुन्दर के वक्षस्थल को
सौंप देती हूँ
अपनी कृशकाया सी नाव ,
कितना कुछ पाना है
कितना कुछ मिलता है
एक और कोलम्बस जन्मता है,
दूर तक फैली थी 
आमंत्रित करती
गुनगुनाती धूप, 
कितना आसान था वो सफर....!!!

रविवार, 1 नवंबर 2015

मील के पत्थर (२)





भावनायें अहले सुबह सूर्य नमस्कार के साथ, सपनों की निशब्द साँसों की दुनिया में अलख जगाती चलती हैं, कोई उन्हें पिरो लेता है, कोई आँखों में भर लेता है, कोई जीने का सम्पूर्ण सबब बना लेता है  … कागज़ पर कब क्या उतर आए, ये उतारनेवाला भी नहीं जानता।  पढ़नेवाले की नज़रों में कब कौन लेखन मुखर हो, सुकून दे जाये, सब अचानक होता है  - 

आज मेरी नज़र में मीलों तक फैली वंदना बाजपेयी हैं -


घर वापसी



रोटी की तलाश में घर से दूर गए लोग
हर रोज देते हैं दिलासा खुद को
बस कुछ समय और
कि एक दिन लौट जायेंगे घर की ओर
गाते हुए राग मल्हार 
जैसे लौट आते है पखेरू
अपने घोंसलों में मीलों उड़ने के बाद

पर घर वापस आना
सदा घर वापस आना नहीं होता...........
कभी-कभी समय की चाक पर पक कर
रिश्ते ले चुके होते है
कोई दूसरा आकार
या उम्र के साथ हो जाता है दृष्टि भ्रम
दूर से जो नज़र आते थे पास
अब पास से नज़र आते हैं दूर
कभी- कभी टूट चुका होता है
खुद काही कोई कोना
चटके दरके कई टुकड़ों में
कहाँ आ पाते हैं साबुत
..
.
या कभी -कभी जिनकी तलाश में
आते हैं लौटकर
ढूढ़ते हैं जिन्हें बदहवास
वो लोरियां छुप गयी होती हैं
फ्रेम में जड़ी तस्वीर पर चढ़ी माला में
या दिन -रात खटकती हुई लाठी
मात्र रह जाती है टंग कर अलगनी पर
अनछुई सी
जब भी घर से बाहर निकलों
येसोच लेना
कि घर वापस आना
सदा घर वापास आना नही होता...........


                ।भीड़ का मनोविज्ञान।


बहुत कठिन है समझना
भीड़ का मनोविज्ञान
जब ये साथ चलती है
उसमे आ जाता है
सौ हाथियों का बल
बड़ी-बड़ी सत्ताएं
हिल जाती हैं
ये जिसे चाहे राजा
बना सकती है
ये जिसे चाहे धूल
चटा सकती है

भीड़ चलते-चलते
रास्ते से एक
पत्थर उठाती है
उसे हीरा बताती है
अचानक सहस्त्र स्वर
स्वर में स्वर मिलाने लगते हैं
वो पत्थर भी खुद बदलने लगता है
और हीरा बनने लगता है

असली हीरे चिल्लाते हैं
पड़े-पड़े धूल खाते हैं
पर भीड़ मानने को
तैयार नहीं होती
उसमें वाद-विवाद
या तकरार नहीं होती
फिर हीरे भी भीड़ में मिल जाते हैं
और पत्थरों को हीरा बताते हैं

अलग ही होता है
भीड़ का हर काम
बहुत कठिन है समझना
भीड़ का मनोविज्ञान


शनिवार, 31 अक्टूबर 2015

मील के पत्थर (१)





हमेशा कुछ अलग प्रस्तुत करने की इच्छा मन में अनगिनत लहरों सदृश्य उठती-गिरती है, किनारे पड़े, तल में पड़े पत्थरों को छूकर महसूस करती हूँ उनका होना।  किसी एक पत्थर में भगवान होते है, किसी पत्थर में इतिहास,किसी में अपने मन के अनगिनत प्रश्न, किसी में उत्तर की संभावनाएँ  … ये होते हैं मील के पत्थर !
रचनाओं के घेरे से गुजरते हुए कुछ रचनाएँ, कोई व्यक्ति मील के पत्थर सा दिख जाता है  … मैं शुरू करुँगी क्रम से कुछ मील का पत्थर बनी रचनाओं का प्रस्तुतीकरण अपनी नज़र से  …


राजेश्वर वशिष्ठ 
rajeshwar_v@hotmail.com

जानकी के लिए 

मर चुका है रावण का शरीर
स्तब्ध है सारी लंका
सुनसान है किले का परकोटा
कहीं कोई उत्साह नहीं
किसी घर में नहीं जल रहा है दिया
विभीषण के घर को छोड़ कर ।
सागर के किनारे बैठे हैं विजयी राम
विभीषण को लंका का राज्य सौंपते हुए
ताकि सुबह हो सके उनका राज्याभिषेक
बार-बार लक्ष्मण से पूछते हैं
अपने सहयोगियों की कुशल-क्षेम
चरणों के निकट बैठे हैं हनुमान !
मन में क्षुब्ध हैं लक्ष्मण
कि राम क्यों नहीं लेने जाते हैं सीता को
अशोक वाटिका से
पर कुछ कह नहीं पाते हैं ।
धीरे-धीरे सिमट जाते हैं सभी काम
हो जाता है विभीषण का राज्याभिषेक
और राम प्रवेश करते हैं लंका में
ठहरते हैं एक उच्च भवन में ।
भेजते हैं हनुमान को अशोक-वाटिका
यह समाचार देने के लिए
कि मारा गया है रावण
और अब लंकाधिपति हैं विभीषण ।
सीता सुनती हैं इस समाचार को
और रहती हैं ख़ामोश
कुछ नहीं कहती
बस निहारती है रास्ता
रावण का वध करते ही
वनवासी राम बन गए हैं सम्राट ?
लंका पहुँच कर भी भेजते हैं अपना दूत
नहीं जानना चाहते एक वर्ष कहाँ रही सीता
कैसे रही सीता ?
नयनों से बहती है अश्रुधार
जिसे समझ नहीं पाते हनुमान
कह नहीं पाते वाल्मीकि ।
राम अगर आते तो मैं उन्हें मिलवाती
इन परिचारिकाओं से
जिन्होंने मुझे भयभीत करते हुए भी
स्त्री की पूर्ण गरिमा प्रदान की
वे रावण की अनुचरी तो थीं
पर मेरे लिए माताओं के समान थीं ।
राम अगर आते तो मैं उन्हें मिलवाती
इन अशोक वृक्षों से
इन माधवी लताओं से
जिन्होंने मेरे आँसुओं को
ओस के कणों की तरह सहेजा अपने शरीर पर
पर राम तो अब राजा हैं
वह कैसे आते सीता को लेने ?
विभीषण करवाते हैं सीता का शृंगार
और पालकी में बिठा कर पहुँचाते है राम के भवन पर
पालकी में बैठे हुए सीता सोचती है
जनक ने भी तो उसे विदा किया था इसी तरह !
वहीं रोक दो पालकी,
गूँजता है राम का स्वर
सीता को पैदल चल कर आने दो मेरे समीप !
ज़मीन पर चलते हुए काँपती है भूमिसुता
क्या देखना चाहते हैं
मर्यादा पुरुषोत्तम, कारावास में रह कर
चलना भी भूल जाती हैं स्त्रियाँ ?
अपमान और उपेक्षा के बोझ से दबी सीता
भूल जाती है पति-मिलन का उत्साह
खड़ी हो जाती है किसी युद्ध-बन्दिनी की तरह !
कुठाराघात करते हैं राम ---- सीते, कौन होगा वह पुरुष
जो वर्ष भर पर-पुरुष के घर में रही स्त्री को
करेगा स्वीकार ?
मैं तुम्हें मुक्त करता हूँ, तुम चाहे जहाँ जा सकती हो ।
उसने तुम्हें अंक में भर कर उठाया
और मृत्युपर्यंत तुम्हें देख कर जीता रहा
मेरा दायित्व था तुम्हें मुक्त कराना
पर अब नहीं स्वीकार कर सकता तुम्हें पत्नी की तरह !
वाल्मीकि के नायक तो राम थे
वे क्यों लिखते सीता का रुदन
और उसकी मनोदशा ?
उन क्षणों में क्या नहीं सोचा होगा सीता ने
कि क्या यह वही पुरुष है
जिसका किया था मैंने स्वयंवर में वरण
क्या यह वही पुरुष है जिसके प्रेम में
मैं छोड़ आई थी अयोध्या का महल
और भटकी थी वन-वन !
हाँ, रावण ने उठाया था मुझे गोद में
हाँ, रावण ने किया था मुझसे प्रणय निवेदन
वह राजा था चाहता तो बलात ले जाता अपने रनिवास में
पर रावण पुरुष था,
उसने मेरे स्त्रीत्व का अपमान कभी नहीं किया
भले ही वह मर्यादा पुरुषोत्तम न कहलाए इतिहास में !
यह सब कहला नहीं सकते थे वाल्मीकि
क्योंकि उन्हें तो रामकथा ही कहनी थी !
आगे की कथा आप जानते हैं
सीता ने अग्नि-परीक्षा दी
कवि को कथा समेटने की जल्दी थी
राम, सीता और लक्ष्मण अयोध्या लौट आए
नगरवासियों ने दीपावली मनाई
जिसमें शहर के धोबी शामिल नहीं हुए ।
आज इस दशहरे की रात
मैं उदास हूँ उस रावण के लिए
जिसकी मर्यादा
किसी मर्यादा पुरुषोत्तम से कम नहीं थी ।
मैं उदास हूँ कवि वाल्मीकि के लिए
जो राम के समक्ष सीता के भाव लिख न सके ।
आज इस दशहरे की रात
मैं उदास हूँ स्त्री अस्मिता के लिए
उसकी शाश्वत प्रतीक जानकी के लिए  !



उर्मिला


टिमटिमाते दियों से
जगमगा रही है अयोध्या
सरयू में हो रहा है दीप-दान
संगीत और नृत्य के सम्मोहन में हैं
सारे नगरवासी
हर तरफ जयघोष है ----
अयोध्या में लौट आए हैं राम !

अन्धेरे में डूबा है उर्मिला का कक्ष
अन्धेरा जो पिछले चौदह वर्षों से
रच बस गया है उसकी आत्मा में
जैसे मन्दिर के गर्भ-गृह में
जमता चला जाता है सुरमई धुँआ
और धीमा होता जाता है प्रकाश !

वह किसी मनस्विनी-सी उदास
ताक रही हैं शून्य में
सोचते हुए --- राम और सीता के साथ
अवश्य ही लौट आए होंगे लक्ष्मण
पर उनके लिए उर्मिला से अधिक महत्वपूर्ण है
अपने भ्रातृधर्म का अनुशीलन
उन्हें अब भी तो लगता होगा ----
हमारे समाज में स्त्रियाँ ही तो बनती हैं
धर्म-ध्वज की यात्रा में अवांछित रुकावट ---
सोच कर सिसक उठती है उर्मिला
चुपके से काजल के साथ बह जाती है नींद
जो अब तक उसके साथ रह रही थी सहचरी-सी !

अतीत घूमता है किसी चलचित्र-सा
गाल से होकर टपकते आँसुओं में
बहने लगते हैं कितने ही बिम्ब !
०००
चिन्तित हैं राजा जनक
रजस्वला हो गई हैं दोनों बेटियाँ
पर वे अब भी खेलती हैं बच्चों की तरह
पुरोहित से करते हैं विमर्श
उनके विवाह के लिए
पड़ोसी राजाओं की नज़र लगी है
परम सुन्दरी सीता पर
अब सीता का विवाह करना ही होगा
खोजना होगा ऐसा वर
जो प्रत्यंचा तान दे शिव के धनुष की !

सोचती है उर्मिला --
सच, परम सुन्दरी हैं बहन सीता
पर क्या मुझमें कोई कमी है, ईश्वर ?
काश, मैं भी पिता को मिली होती
किसी नदी, नाले या खेत खलिहान में
मेरे लिए भी आता
कोई शिव या किसी अन्य देवता का धनुष
मुझे भी चाहता कोई विशिष्ट धनुर्धर !

नहीं, पर यह कैसे होता,
मैं वीर्य-शुल्का जो नहीं थी
इसलिए मुझे भी
विदा कर दिया गया सीता के साथ
ताकि लक्ष्मण को मिल सके पत्नी
और मैं विवाह के बाद भी
सीता की सहचरी बनूँ
स्त्रियाँ स्नेह में भी बना दी जाती हैं दास
उस दिन मिथिला में
यही तय हुआ था उर्मिला के लिए !
०००
न वाल्मीकि बताएँगे न तुलसी
अयोध्या के महल में कैसे रहती थी उर्मिला ?

चार बहनों में
श्रेष्ठ और ज्येष्ठ थी सीता
भोर की मलयानिल में हम पहुँच जाते थे सीता मन्दिर
देर तक होता था वेदोच्चार
यज्ञ-धूम्र से महक जाता था सारा महल
और हम चरण छूकर आशीर्वाद लेते थे ऋषियों से
सभी राजकुमार साथ-साथ चलते थे अपनी पत्नियों के
पर मैं सदा अकेली ही क्यों रही ?
लक्ष्मण सदा ही चले राम और सीता के पीछे
हे दैव, बोलो उन क्षणों में कौन था उर्मिला के साथ ?

बोलो दैव, रात को जब कई बार
बुझ चुकी होती थी दिए की बाती
प्रतीक्षा में अकड़ने लगता था मेरा शरीर
तब थक कर,
पिता और भाई के चरण दबा कर
लौटते थे मेरे पति
मैं स्नेह से सुला देती थी उन्हें पुत्रवत
और रात भर जलती थी बिना तैल की बाती-सी
क्या आपने यही नियति तय की थी उर्मिला के लिए ?
०००
राम जा रहे थे वनवास पर
विशद व्याकुलता के क्षण थे
महल में मचा था हाहाकार
सीता का आग्रह था वह जाएगी राम के साथ
मुझे तो अन्त तक यह भी मालूम नहीं था
कि लक्ष्मण भी वन जाएँगे उन के साथ
मैं जड़वत खड़ी थी महल के द्वार पर
और लक्ष्मण ने आकर कहा ---
सुनो, तुम मेरी अनुपस्थिति में
रखोगी मेरी सभी माताओं का ध्यान
यदि उन्हें कष्ट हुआ
तो हम नरक के भागी होंगे !
और वह बिना मुझे सान्त्वना का
एक भी शब्द कहे दौड़ गए राम के पीछे
दैव, ऐसा तो कोई
अपनी परिचारिका के साथ भी नहीं करता
मैं तो अग्नि की साक्षी में उनकी पत्नी बनी थी !
०००
ये चौदह वर्ष कैसे काटे हैं उर्मिला ने
पूछो किसी व्रती से
पूछो किसी ऐसी स्त्री से
जिसे दण्ड मिला हो सुहाग का
जो वचनबद्ध होकर जी रही हो
किसी काल्पनिक पुरुष के लिए
सतयुग में भी यही जीवन था एक स्त्री का !
०००
दीपपर्व है आज
और मेरे मन में गहन अन्धकार है
सच कहूँ तो मुझे प्रतीक्षा नहीं है लक्ष्मण की
मुझे प्रतीक्षा नहीं है अपने धर्मपरायण पति की
उनका आना, आना है किसी शेषनाग का
जिसके फन पर पूरी पृथ्वी स्थापित है
जो फुँकार सकता है
भस्म कर सकता है पूरा ब्रह्माण्ड
पर अपने शीश को
प्रेयसी के वक्ष पर नहीं टिका सकता !

उर्मिला, मैं तुमसे क्षमा चाहता हूँ
बिना उस अपराधबोध से मुक्त हुए
जो पुरुष ने सदा ही दिया है स्त्री को
कुछ भी तो नहीं बदला आज तक
स्त्री तो स्त्री ही रही
इस सतयुग से कलयुग तक की यात्रा में !

मंगलवार, 18 अगस्त 2015

एक शख्स - जिसकी काबिलियत हर दिन की जानकारी के साथ जागती है

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एक शख्स - जिसकी काबिलियत हर दिन की जानकारी के साथ जागती है और भूली बिसरी यादों से रूबरू कराती है  . शिवम मिश्रा, हैरानी से मैंने पढ़ा है इनको हर बार  … इतिहास को वर्तमान पीढ़ी से इन्होंने जोड़कर रखा है और वक़्त का सम्मान किया है।  


बुरा भला - इनका अपना ब्लॉग हो 

या ब्लॉग बुलेटिन 

इनकी प्रखरता,दूर दृष्टि स्तब्ध करती है तो गौरवान्वित भी। हमें भी स्मरण रहता है, लेकिन इनकी स्मरणशक्ति अद्भुत है, और कितने ऐसे दिन हैं, जिनको इनके द्वारा जाना है
आइये, एक दो रचनाओं से मुखातिब हों - 

भारत की ३ महान विभूतियों के नाम है २३ जुलाई


आज २३ जुलाई है ... एक बेहद खास दिन ... भारत की ३ महान विभूतियों से जुड़ा हुआ ... जिन मे से २ की आज जयंती है और एक की पुण्यतिथि !!



'स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है, और हम इसे लेकर रहेंगे' का नारा देकर देश में स्वराज की अलख जगाने वाले बाल गंगाधर तिलक उदारवादी हिन्दुत्व के पैरोकार होने के बावजूद कट्टरपंथी माने जाने वाले लोगों के भी आदर्श थे। धार्मिक परम्पराओं को एक स्थान विशेष से उठाकर राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचाने की अनोखी कोशिश करने वाले तिलक सही मायने में 'लोकमान्य' थे। एक स्वतंत्रता सेनानी, समाज सुधारक, शिक्षक और विचारक के रूप में देश को आजादी की दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने वाले तिलक ने कांग्रेस को सभाओं और सम्मेलनों के कमरों से निकाल कर जनता तक पहुंचाया था।

सही मायने में लोकमान्य थे बाल गंगाधर तिलक (२३/०७/१८५६ - ०१/०८/१९२०)


पण्डित चन्द्रशेखर 'आजाद' (२३ जुलाई, १९०६ - २७ फरवरी, १९३१) ऐतिहासिक दृष्टि से भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के अत्यन्त सम्मानित और लोकप्रिय स्वतंत्रता सेनानी थे। वे पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल व सरदार भगत सिंह सरीखे महान क्रान्तिकारियों के अनन्यतम साथियों में से थे। सन् १९२२ में गाँधीजी द्वारा असहयोग आन्दोलन को अचानक बन्द कर देने के कारण उनकी विचारधारा में बदलाव आया और वे क्रान्तिकारी गतिविधियों से जुड़ कर हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसियेशन के सक्रिय सदस्य बन गये। इस संस्था के माध्यम से उन्होंने राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में पहले ९ अगस्त १९२५ को काकोरी काण्ड किया और फरार हो गये। इसके पश्चात् सन् १९२७ में 'बिस्मिल' के साथ ४ प्रमुख साथियों के बलिदान के बाद उन्होंने उत्तर भारत की सभी क्रान्तिकारी पार्टियों को मिलाकर एक करते हुए हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन ऐसोसियेशन का गठन किया तथा भगत सिंह के साथ लाहौर में लाला लाजपत राय की मौत का बदला सॉण्डर्स का वध करके लिया एवम् दिल्ली पहुँच कर असेम्बली बम काण्ड को अंजाम दिया।

पण्डित चन्द्रशेखर 'आजाद' की जयंती पर विशेष



कर्नल ड़ा॰ लक्ष्मी सहगल (जन्म: 24 अक्टूबर, 1914 - निधन : 23 जुलाई , 2012 ) भारत की स्वतंत्रता संग्राम की सेनानी थी। वे आजाद हिन्द फौज की अधिकारी तथा 'आजाद हिन्द सरकार' में महिला मामलों की मंत्री थीं। वे व्यवसाय से डॉक्टर थी जो द्वितीय विश्वयुद्ध के समय प्रकाश में आयीं। वे आजाद हिन्द फौज की 'रानी लक्ष्मी रेजिमेन्ट' की कमाण्डर थीं।

कर्नल डा॰ लक्ष्मी सहगल की पहली बरसी पर विशेष

  हम सब की ओर से इन तीनों महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानीयों को शत शत नमन ! 
वन्दे मातरम !!
जय हिन्द !!!



अमर शहीद कैप्टन विक्रम 'शेरशाह' बत्रा


आज ७ जुलाई है ... आज ही के दिन सन १९९९ की कारगिल की जंग मे कैप्टन विक्रम बत्रा जी की शहादत हुई थी ! 
पालमपुर निवासी जी.एल. बत्रा और कमलकांता बत्रा के घर 9 सितंबर, 1974 को दो बेटियों के बाद दो जुड़वां बच्चों का जन्म हुआ। माता कमलकांता की श्रीरामचरितमानस में गहरी श्रद्धा थी तो उन्होंने दोनों का नाम लव-कुश रखा। लव यानी विक्रम और कुश यानी विशाल। पहले डीएवी स्कूल, फिर सेंट्रल स्कूल पालमपुर में दाखिल करवाया गया। सेना छावनी में स्कूल होने से सेना के अनुशासन को देख और पिता से देश प्रेम की कहानियां सुनने पर विक्रम में स्कूल के समय से ही देश प्रेम प्रबल हो उठा। स्कूल में विक्रम शिक्षा के क्षेत्र में ही अव्वल नहीं थे, बल्कि टेबल टेनिस में अव्वल दर्जे के खिलाड़ी होने के साथ उनमें सांस्कृतिक कार्यक्रमों में बढ़-चढ़कर भाग लेने का भी जज़्बा था। जमा दो तक की पढ़ाई करने के बाद विक्रम चंडीगढ़ चले गए और डीएवी कॉलेज चंडीगढ़ में विज्ञान विषय में स्नातक की पढ़ाई शुरू कर दी। इस दौरान वह एनसीसी के सर्वश्रेष्ठ कैडेट चुने गए और उन्होंने गणतंत्र दिवस की परेड में भी भाग लिया। उन्होंने सेना में जाने का पूरा मन बना लिया और सीडीएस (सम्मिलित रक्षा सेवा) की भी तैयारी शुरू कर दी। हालांकि विक्रम को इस दौरान हांगकांग में भारी वेतन में मर्चेन्ट नेवी में भी नौकरी मिल रही थी, लेकिन देश सेवा का सपना लिए विक्रम ने इस नौकरी को ठुकरा दिया।

सेना में चयन विज्ञान विषय में स्नातक करने के बाद विक्रम का चयन सीडीएस के जरिए सेना में हो गया। जुलाई 1996 में उन्होंने भारतीय सेना अकादमी देहरादून में प्रवेश लिया। दिसंबर 1997 में शिक्षा समाप्त होने पर उन्हें 6 दिसंबर 1997 को जम्मू के सोपोर नामक स्थान पर सेना की 13 जम्मू-कश्मीर राइफल्स में लेफ्टिनेंट के पद पर नियुक्ति मिली। उन्होंने 1999 में कमांडो ट्रेनिंग के साथ कई प्रशिक्षण भी लिए। पहली जून 1999 को उनकी टुकड़ी को कारगिल युद्ध में भेजा गया। 

कमांडिंग ऑफिसर लेफ्टीनेंट कर्नल वाय.के.जोशी पॉइंट ५१४० की जीत के बाद कैप्टन की रैंक पर विक्रम का प्रमोशन करते हुये 
हम्प व राकी नाब स्थानों को जीतने के बाद उसी समय विक्रम को कैप्टन बना दिया गया। इसके बाद श्रीनगर-लेह मार्ग के ठीक ऊपर सबसे महत्त्वपूर्ण 5140 चोटी को पाक सेना से मुक्त करवाने का जिम्मा भी कैप्टन विक्रम बत्रा को दिया गया। बेहद दुर्गम क्षेत्र होने के बावजूद विक्रम बत्रा ने अपने साथियों के साथ 20 जून 1999 को सुबह तीन बजकर 30 मिनट पर इस चोटी को अपने कब्जे में ले लिया।
शेरशाह के नाम से प्रसिद्ध विक्रम बत्रा ने जब इस चोटी से रेडियो के जरिए अपना विजय उद्घोष ‘यह दिल मांगे मोर’ कहा तो सेना ही नहीं बल्कि पूरे भारत में उनका नाम छा गया। इसी दौरान विक्रम के कोड नाम शेरशाह के साथ ही उन्हें ‘कारगिल का शेर’ की भी संज्ञा दे दी गई। अगले दिन चोटी 5140 में भारतीय झंडे के साथ विक्रम बत्रा और उनकी टीम का फोटो मीडिया में आया तो हर कोई उनका दीवाना हो उठा। इसके बाद सेना ने चोटी 4875 को भी कब्जे में लेने का अभियान शुरू कर दिया। इसकी भी बागडोर विक्रम को सौंपी गई। उन्होंने जान की परवाह न करते हुए लेफ्टिनेंट अनुज नैयर के साथ कई पाकिस्तानी सैनिकों को मौत के घाट उतारा।
 
कैप्टन विक्रम के पिता जी.एल. बत्रा कहते हैं कि उनके बेटे के कमांडिंग ऑफिसर लेफ्टीनेंट कर्नल वाय.के.जोशी ने विक्रम को शेर शाह उपनाम से नवाजा था। अंतिम समय मिशन लगभग पूरा हो चुका था जब कैप्टन अपने कनिष्ठ अधिकारी लेफ्टीनेंट नवीन को बचाने के लिये लपके। लड़ाई के दौरान एक विस्फोट में लेफ्टीनेंट नवीन के दोनों पैर बुरी तरह जख्मी हो गये थे। जब कैप्टन बत्रा लेफ्टीनेंट को बचाने के लिए पीछे घसीट रहे थे तब उनकी  छाती में गोली लगी और वे “जय माता दी” कहते हुये वीरगति को प्राप्त हुये।
16 जून को कैप्टन ने अपने जुड़वां भाई विशाल को द्रास सेक्टर से चिट्ठी में लिखा –“प्रिय कुशु, मां और पिताजी का ख्याल रखना ... यहाँ कुछ भी हो सकता है।” 
अदम्य साहस और पराक्रम के लिए कैप्टन विक्रम बत्रा को 15 अगस्त, 1999 को परमवीर चक्र के सम्मान से नवाजा गया जो उनके पिता जी.एल. बत्रा ने प्राप्त किया। विक्रम बत्रा ने 18 वर्ष की आयु में ही अपने नेत्र दान करने का निर्णय ले लिया था। वह नेत्र बैंक के कार्ड को हमेशा अपने पास रखते थे।
 
१६ वें बलिदान दिवस पर अमर शहीद कैप्टन विक्रम 'शेरशाह' बत्रा जी को शत शत नमन !
जय हिन्द !!!
जय हिन्द की सेना !!!

मंगलवार, 11 नवंबर 2014

सरस्विता पुरस्कार से सम्मानित श्रेष्ठ कहानी 2014




रचनाकार का नाम : डॉ स्वाति पांडे नलावडे 
पता :इ ७०४, केप्रिशियो , दत्त मंदिर रोड़ , वाकड़ , पुणे ४११०५७ 
मोबाइल नंबर : ९९७५४५७०१२
ईमेल एड्रेस : swati.nalawade@gmail.com
रचना का शीर्षक : पंद्रह यादव कॉलोनी 
विधा : कहानी 

पंद्रह यादव कॉलोनी 
(१)
 चटोरी रूही 
“ ‘और मुझे ताल के पास खड़े होकर सिंघाड़े समेटने हैं ...हरे हरे कच्चे सिंघाड़ों को अपनी फ़्रोक में लपेट कर लाती थी मैं और फिर... वैसे उन्हें छील के नमक मिर्च लगा के खाने में कितना मज़ा आता है ...तुम बम्बई वाले लोग क्या जानो ताल तलईया के बारे में !”’
“ ‘रूही , रूही ...’”
“ ‘आं ..क्या हुआ, सुभा ?”’
“ ‘रूही , तुम क्यों ये सब बातें करती हो ? और फिर क्या तुम भूल गयी कि मैं भी तो तुम संग यादव कॉलोनी  जबलपुर की ही तो पैदाइश हूँ ? क्या मैं कभी सिंघाड़ों का स्वाद भूल पाया ?”’
“ ‘हाँ हाँ, भूले नहीं तो कभी याद भी तो नहीं किया !” - कुछ इठलाते हुए रूही बोली |’
“ ‘खैर , ये बताओ तुम्हें और क्या करने को मन करता है ?”’
“ ‘पता है, भोपाल जाने के बाद मेरा चटोरापन और भी बढ़ गया था”’ कहते कहते रूही की आँखों में एक बदमाशी भरी चमक कौंध गयी | 
“ ‘मतलब?’”
“ ‘मुझे खट – मीठे बेर कितने पसंद थे , ये तो तुम जानते ही हो ..फिर मैंने भोपाल के अपने स्कूल के बाहर कितनी तरह की इमलियाँ खायीं क्या बताऊँ ...चपटी छोटी एकदम हरी कन्च खट्टी इमली , बाहर से हरी और भीतर से लाल कन्च, तेज खट्टी- बड़ी इमली , बाहर से भूरे छिलके वाली और अंदर से हरी हरी बेहद खट्टी मोटी इमली, और फिर सूखे हुए इमली के खट्टे मीठे गदराए बूटे जिसे बेचनेवाला भैया नमक मिर्चे में लपेट के देता था ..आह क्या मज़ा आता था उन्हें चूसते रहने में! फिर एक होती थी इलायची इमली ..वो ना तो इलायची थी और ना ही उसमे इमली के कोई गुण ! मीठी सी फीकी सी इमली की तरह दिखनेवाली इलायची इमली बहुत कम ही पसंद आती थी लेकिन फिर भी सभी बड़े चाव से खाते थे ! ये तो हुआ इमली पुराण , इसके अलावा गंडेरी (गन्ने के छोटे कटे टुकड़े ) जिस पर कभी गुलाब जल छिडक के तो कभी मलाई डलवा के हम लोग मजे से खाते थे ! फिर, बेर ..मारवाड़ी बेर, हरे बेर, लाल उबले बेर, जाम ..माने अमरूद ..कचोरियाँ आइसक्रीम ..जीरा गोली , हर्पर रेवड़ी ...”’
‘चटोरी रूही !” सुभा चिढ़ाते हुए बोला !’
“ ‘आं ? क्या ,क्या कहा तुमने ?”’
 ‘“चटोरी कहीं की ...चटोरी रूही !! भोपाल जाकर तुम पूरी चटोरी बन गयी .. अच्छा कहो तो मैं यदि तुम्हें ये सब ला दूँ तो तुम खुश हो जाओगी ?”’
 ‘“नहीं, मुझे और भी बहुत कुछ चाहिये !”’
 ‘“बोलो क्या ?”’
 ‘“बंगी जम्पिंग..
लेह लद्दाख की बाइक ट्रीप...
पब में जाकर बेख़बर होकर थिरकना चाहती हूँ मैं ... हाँ , जानती हूँ तुम कहोगे कि  “इस कल्चर को तो बिलकुल पसंद नहीं करती हो!” लेकिन फिर भी .. जो पसंद न हो उसे भी तो कर के देख लेना चाहिए कभी !”’
“ ‘और??”’
“ ‘और ....हज़ारों हज़ार लाल गुलाब, पैरिस .... पैरिस की सैर ..” कहते कहते उसके गोरे गाल गुलाबी हो गये |’
 ‘“रूही तुम्हें ठण्ड लग रही होगी , चलो कमरे में चलते हैं ...”’
 ‘“आं ... हाँ .. न न अभी नहीं कुछ देर बाद ..” “हाउ अन-रोमान-टिक” रूही मन में बोल पड़ी |’
 ‘“अच्छा और क्या करने का मन है ?”’
 ‘“मुझे वो स्वेटर की अधूरी पड़ी बाँहें बुननी हैं ..माँ के घर में किसी अलमारी में शायद अभी भी वो पोलीथीन पड़ा होगा जिसमें अधूरा बुना सामान  पड़ा है ...”’
“ ‘और ?”’
 ‘“और मुझे बर्फ में खेलने जाना है ...”’
 ‘“रूही , तुम सचमुच में पागल हो गयी हो”’
 ‘“क्यों? क्योंकि मैं अब नानी बन गयी हूँ और मुझे ये सब शोभा नहीं देता ?”’
 ‘“नहीं बाबा ...”’
 ‘“फिर? क्या मेरी बीमारी के कारण ?”’
 ‘“हे ..कुछ भी बकवास मत करो तुम ! तुम्हें सिर्फ बुखार हुआ है जो एक दो दिन में ठीक हो जायेगा”’
‘“ठीक है , फिर बताओ ..क्यूँ नहीं मैं ये सब कर सकती ?”
“मैं ये सब करुँगी मिस्टर सब्यसाची दत्ता , माई डियर दोस्त सुभा ...और तुम्हें अपने संग लेकर जाऊँगी उन सभी जगहों पे और वो सब खिलाने जिनका मैंने तुम्हें ज़िक्र किया है ! तुम बस देखते जाओ ...”’
“ ‘हाँ हाँ ...जरुर ...”’
मासूमियत या तो होती है या नहीं होती ... मासूम ख़्वाब, मासूम तमन्नायें , मासूम भावनाएं ... मासूम बच्चा , मासूम प्रेमी .. इन सबमें मासूम शब्द कितना सुन्दर लगता है, अद्भुत भाव जगाता है ! कहते हैं ना कोई भी बात इस जग में स्थायी नहीं होती ... और जहाँ तक मासूमियत का सवाल है, लोगों का मानना है कि यह उम्र-दराज़ वाकया नहीं होता .. इंसान बड़ा होता है और उसकी मासूमियत पीछे छूटती जाती है | बहुत कम ही ऐसा होता है कि ये मासूमियत अंत तक ऐसे ही बनी रहे ! रूही को देखकर आज ये कहना मुश्किल हो गया है की ये सच में बड़ी हो गयी है या वही चार साल की मासूम रूही रह गयी है ... सुभा सोचने को मजबूर हो गया |
“ ‘रूही, चलो अब अंदर चलते हैं ओके! अब तो मुझे भी ठण्ड लगने लगी है, तुम्हारी तो कुल्फ़ी बन रही होगी ! तुम्हें तो उतनी बचपन में भी साल भर जबलपुर में ठण्ड  लगती थी ! सारे सारे वक़्त वो कार्डिगन – पीले – नीले रंग का पहने घुमा करती थी” !’
 रूही ने हँसते हुए अपने कांधे पर हल्का नीला नरम शाल लपेटा और उसे सुभा को दिखा कर चिढाने लगी | सुभा बिस्तर पर लेटा  हुआ था सो उसके पैरों को उसने हौले से बिस्तर पर ठीक किया ,बिस्तर के सिरहाने रखा ब्लेंकेट उठा कर उसे ठीक तरह से सुभा के पैरों पर ओढ़ाया | हौले से सुभा के माथे पर गिर आयी बालों की लट  को सँवारते हुए रूही ने बगीचे से कॉरिडोर  जाने वाली पगडंडी पर उसके पहिये लगे बिस्तर को गोल घुमा कर धीरे धीरे ठेलना शुरू किया | 
“ ‘अरे बाबा ब्रदर को बुला लो ना ....तुम क्यूँ धक्का दे रही हो, थक जाओगी?”’ 
 ‘“क्यूँ , मेरे धक्का देने पर डर लगता है तुम्हें ?”’
 ‘“नहीं ऐसी बात नहीं है रूही!” सुभा की आवाज़ अचानक नरम हो गयी थी |’
 ‘“हेल्लो सब्या, हाउ आर यू फीलिंग नाऊ ?’” कैंसर केयर ट्रस्ट के वरिष्ठ चिकित्सक एवम संस्थापक  डॉ श्रीमाली अक्सर शनिवार को अपने सभी मरीज़ों से पर्सनली मिलने आते थे |
“ ‘आई एम फाइन डॉक ! आजकल मुझे बहुत अच्छा लग रहा है ---- मेरी जन्मों की बिछड़ी दोस्त जो मुझे मिल गयी ! रूही , इनसे मिलो , ये हैं मेरे मित्र , डॉ श्रीमाली ! हम दोनों ने सीएटल के फ्रेड हचिन्सन कैंसर रिसर्च सेंटर से एक साथ पढ़ाई की थी , बोन मेर्रो ट्रांसप्लांटेशन में और साथ ही वापस भारत लौटे थे ये सोच कर की देस में हम जैसे चिकित्सकों की बहुत जरुरत है | दोनों ने बीकानेर के कैंसर हॉस्पिटल से अपने करियर की शुरुआत की थी और फिर साथ ही पुणे में इस कैंसर केयर ट्रस्ट की स्थापना की | दोस्त तो आज भी सबकी सेवा कर रहा है ....मैं सेवा का मज़ा लूट रहा हूँ .. हा हा हा’ ....”  डॉ श्रीमाली ये सुनकर सब्यसाची के  गले मिले और एक ज़ोरदार ठहाका लगाया |
“ ‘और डॉक , ये हैं रूही ...”’
“ ‘मिसेज़ रूही लोखंडे.. नमस्ते !”’ रूही ने हाथ जोड़, कुछ अचकचाते हुए कहा |
“ ‘हाँ ... रूही मेरे बचपन की दोस्त हैं .. इत्तेफ़ाक़न यहाँ मिल गयी ... बस पिछले हफ्ते, इतवार को .. यहाँ सोशल वर्क करती हैं और बचपन में मेरे संग यादव कॉलोनी जबलपुर में खेला करती थी ....”’
ये सुनकर डॉ श्रीमाली ने बायीं तरफ की  भौं ऊपर करते हुए सब्या की ओर प्रश्न करते हुए देखा !
“ ‘अरे भाई , बातों बातों में बात चली तो पता पड़ा .. अब मैं इसकी भी सेवा का मज़ा लूट रहा हूँ ! खुद तो बच्ची सी है और देखो कैसे ख्याल रखती है --   जैसे मैं कोई छोटा बच्चा हूँ !”’
 ‘“हेल्लो रूही , तुमसे मिल कर बहुत बहुत अच्छा लगा ! वैसे यकीन करो , मैं सब्या को ये सारे मज़े ज्यादा दिन नहीं लेने दूँगा ....”’
 ‘“मतलब ?” रूही ने डरते हुए पूछा’
 ‘“अरे मतलब ये कि बस जल्दी से जल्दी इनका ऑपरेशन करूँगा , इन्हें कीमो - मेडिसिन देकर, फिजियोथेरेपी देकर, फटाफट आराम करवाऊँगा और वापस काम पर लेकर आऊँगा !”’
 ‘“ओह्ह अच्छा !” कहते हुए रूही मुस्कुरा दी ...’
 ‘“डॉ श्रीमाली, मुझे भी बहुत अच्छा लगा आपसे मिल कर |आपसे ज़िंदा दिल दोस्त तो बहुत बड़ी नेमत है सुभा के लिए !”’
“ ‘ये सुभा वाला क्या किस्सा है भाई सब्या ? हम तो बचपन ही से तुझे सब्या बुलाते आये हैं... तू सुभा भी है ? खैर, मैं अपने राउंड खत्म कर आप दोनों से मेस में लंच के वक्त मिलता हूँ , चलेगा ?”’
 ‘“ठीक है डॉक , मैं भी तब तक आराम करता हूँ ...”’
“ ‘तुम बहुत सोने लगे हो सुभा !”’
“ ‘हाँ कभी कभी नींद आना भी चाहिए !” दुर्गा दीदी की मौत को ज़िम्मेदार माननेवाला सुभा जैसे जन्मों से सोया ही ना था  ... इन दिनों दवाईयों का असर कुछ ऐसा था की उसे कयी बार नींद आ जाती थी |’
रूही कहने लगी थी , “’सुभा , तुम्हें तो अभी वो छिपा छायी वाला खेल खेलना है, याद है .... हम दोनों ने मिलकर उसे बनाया था ..”’ लेकिन रूही चुप हो गयी | दुर्गा का ख्याल आकर रूही चुप हो गयी ... साथ ही  कैंसर के कारण सुभा को राइट पाँव में बहुत बड़ा सिस्ट नुमा घाव हो गया था जिसका ऑपरेशन करना आवश्यक था—सुभा अब वो खेल क्या ही खेल पायेगा | सुभा को भी इस बात का पूरा इल्म था लेकिन वो इससे कतई परेशान नहीं था |
सुभा को नींद आने लगी ये देख कर रूही अपने कमरे की ओर लौट गयी | क्या सुभा दुर्गा दी की मौत से कभी उबर पाया था ? इसकी पत्नी, बच्चे और वो छोटी बहन कहाँ हैं ? रूही को जल्दी थी की कब लंच की बेल बजे और कब सुभा से ये सारे सवाल पूछे !

(२)
 सुकून रूह का
  ‘“अच्छा बताओ तो निधि कहाँ है इन दिनों ? और तुम्हारा परिवार ?”’ सूप पीते हुए मेस में रूही ने सुभा से पूछा|
“  ‘हा हा वो ...हमार छुटकी बहना  .. वो बड़ी हो गयी है रूही ... हम सभी में छोटी होने के बावजूद वो ही आज बड़ा काम कर रही है | पुदुचेरी के आश्रम में सोशल वर्क करती है , तुम्हारी तरह ...”’
“ ‘मेरी तरह ?”’
 ‘“हाँ , जैसे तुम यहाँ सोशल वर्क करने आई हो !”’
 ‘“ओह हाँ हाँ ...” रूही ने खुद को संयत कर कुछ अनमने भाव से कहा |’ 
मेस में सादा किन्तु स्वादिष्ट भोजन मिलता था ...बिलकुल सात्विक | दोनों ही भोजन करने में जुट गये और पुरानी बातों का सिलसिला फिर शुरू हो गया |
“ ‘मेरे एकठो बेटा है ... इन दिनों यहीं मुंबई में काम करता है | पहले गुडगाँव में बड़ी कम्पनी में था | कहता हूँ उसे की तू भी पुणे आकर बस जा तो कहता है बाबा, रिटायर होकर आना ही है, आपका सहारा बन ! बेचारे की माँ बचपने ही में एक दुर्घटना में जाती रही, सो उसका माँ और बाबा मैं ही हूँ  ...”’
 ‘“मतलब तुम्हारे यहाँ भी सब के सब बैरागी ही हैं !’” खाना खाकर, हथेली पर सौंफ़ साफ़ करते हुए रूही ने पूछा |
 ‘“क्या मतलब ?”’
सुनते ही रूही ज़ोरों से हँस पड़ी और साथ ही उसे ज़ोरों से खाँसी आ गयी | इतनी खाँसी की जैसे उसकी जान ही निकल रही हो ... साथ ही उसे चक्कर भी आने लगे ...आजू बाज़ू से सिस्टर लोग दौड़ कर आयीं और उन्हें सहारा देकर अन्दर ले गयी |
“ ‘सुनो तो, की होबे ? क्या हुआ रूही को ?’” सुभा ने बेचैन होकर पास खड़ी  सिस्टर से पूछा |
 ‘“किछु न दादा ... ठसका लग गया ताई को लगता है !कितनी बार कहा है सौंफ़ ना खाया करो ....बस आती ही होंगी ...”’
उतने में रूही को आता देखकर सुभा कुछ आश्वस्त हुआ | 
‘“कहा था न, ठण्ड लग जायेगी .. बिलकुल ख्याल नहीं रखती हो अपना ..”’
रूही को अपनी शाल ठीक से लपेटते देख सुभा को उसे देखते रहना अच्छा लगा... चालीस साल बाद उस पाँच साल की बच्ची-सी अपनी दोस्त को याद करना अच्छा लगा!
उस रात रिक्रिएशन रूम में कैरम बोर्ड खेलने डॉक्टर श्रीमाली कुछ देर के लिए उनकी टेबल पर आये| अभी गपशप का दौर शुरू ही हुआ था की किसी पेशंट की तबियत ख़राब हो जाने से उन्हें तुरंत जाना पड़ा | उस जगह सोने का वक़्त तय था ... और दोनों ही वक़्त के बड़े पाबंद इंसान थे सो बेल होते बराबर दोनों एक दूसरे को गुड नाईट कह अपने अपने डोर्म में सोने चले गए |
सोते हुए उसका प्यारा शरारती चेहरा आँखों के सामने घूमता रहा | उस चेहरे ने मासूमियत और शरारत से उठकर किस तरह परिपक्वता के अनगिन पर्चे दिए होंगे ... किस तरह उसके लावण्यमयी सौंदर्य को यूँ संजीदगी की झालर आकर चिपक गयी होगी ? आज भी वो कितनी मोहक है | पत्नी की अचानक हुई मृत्यु ने सुभा को इस ओर से उदासीन कर दिया था | अपनी बाल-सखि को देख न जाने क्यों वो इन सारी बातों पर फिर सोचने लगा था ! अचानक सुभा को याद आया की रूही ने अपने बारे में अब तक कुछ नहीं बताया है ... सिवा इसके की वो अब नानी बन गयी है | “सुबह उसकी खबर लेता हूँ” कहते कहते उसे नींद आ गयी |
सुबह योगा करती हुई रूही सहज सी दिव्यता से आलोकित हो रही थी | सुभा अपनी व्हील चेयर में बैठा हाथ और गर्दन के एक्सरसाइज करता रहा |
“ ‘चलो नाश्ता करने चलते हैं ...”’
 ‘“तुम्हें बड़ी भूख लगती है ...”’
 ‘“जानती हो न कुछ मामलों में मैं पक्का बंगाली हूँ !!”’
 ‘“इश्श”..’
 ‘“अच्छा रूही , तुम्हारी नातिन क्या करती है ?”’
“ ‘नातिन नहीं , मुझे दो नाती हैं ..मेरी एक बेटी की शादी कलकत्ते में हुई है ... बंगाली से शादी की है”’ 
तिरछी नज़र के वार से सुभा बच नहीं सका और हँस दिया !
“ ‘वो छोटी वाली है आम्रपाली !’
 ‘उसे दो बेटे हैं ..रोज़ बतियाती है फ़ोन पे ... पति बिज़नेस करते हैं , और बड़ी वाली बेटी, वैशालिका फैशन मॉडल है ...दुनिया भर घूमती फिरती है ...शो पे शो करती है और जब फुरसत मिलती है तो उसके पापा ने दिए पैरिस के फ्लेट में आराम करती है |”’ हल्की सी मुस्कान और भीतर घुमड़ आये दुःख को दबाते हुए रूही बोली |
रूही ने अपने हाथों से टेबल पर रखे मोज़े लिए और धीरे से झुकते हुए खुद ही पहनने लगी .. 
 ‘“मेरे पति एनवायरनमेंटलिस्ट हैं ... देश का समाज का वातावरण न बिगड़े इसका ख़याल रखते हैं |”’ सुभा की ओर देखते हुए रूही बोली, ‘“इन दिनों ओम्कारेश्वर में जल सत्याग्रह में लगे हुए हैं ... आज शायद दसवाँ दिन है ... अन्य ग्रामीण बंधुओं संग नर्मदा मैया की गोद में खड़े हैं ... पिछले पाँच  सालों से नर्मदा बचाओ आन्दोलन और टेहरी बाँध के बीच बहते रहे हैं ... उन्हें माँ नर्मदा से बहुत प्यार है !”’
 ‘“तुम्हें भी तो है रूही ...”’
 ‘“हाँ बहुत ज़्यादा !”’
कुछ संजीदा होते हुए रूही बोली , ‘“पहले लोखंडे साहब एक बहुत बड़ी पॉवर कंपनी में बहुत बड़े पद पर कार्यरत थे ... एक रोज़ घर आये और बोले रूही , ये सब बेबुनियाद बातें हैं ... ये शिमला - देहरादून में बड़े मकान , ये मर्सिडीज़ में घूमना , पैरिस में अपना फ्लेट ... बस अब और नहीं .. अब मैं कुछ ऐसा करना चाहता हूँ जिससे मेरी रूह को सुकून मिले !”’
“ ‘और क्या उन्होंने ऐसा कुछ किया जिससे उनकी ‘रूही’ को सुकून मिले ?”’ 
 ‘“हाँ ..क्यूँ नहीं!! खूब ख़याल रखा मेरा हमेशा ...कभी किसी बात की कमी नहीं होने दी | मुझे आवाज़ देने की ज़रूरत नहीं पड़ती और ...”’
 ‘“और वो दौड़े चले आते!”’
 ‘“हा हा, वो नहीं , चार चार नौकर ! उनके पास सालों साल वक़्त नहीं रहा मेरे लिए ... लेकिन फिर भी देखो ना ...उन्होंने मुझे ख्वाब देखने की आज़ादी दी ... सिंघाडों , बेर को चखने की याद के ख्वाब .... बंगी जंपिंग और स्कूबा डाइविंग करने के ख्व़ाब! घर पर रहने वाली ‘होम मेकर्स’ को उनके पति अक्सर ये सबसे बड़ी नेमत देते हैं ... ख़्वाब देखने की आज़ादी की नेमत ! बस एक बात है, इसमें ख्वाब पूरा करने की शर्त नहीं होती !”’
बात शायद गंभीर हो चली थी , रूही ने जैसे ही सुभा की ओर देखा, वो दहल पड़ी .... सुभा का मुँह एक ओर को लटक गया था! वो ज़ोर से चीख़ी ... ब्रदर, ब्रदर ...प्लीज़ कम ..प्लीज़ हेल्प !
……………………………………………………………..
(३)
 छिपा छिपायी, ये जीवन!
ऑपरेशन थिएटर से बाहर निकलते हुए डॉक्टर श्रीमाली ने अपनी पेशानी पे आये पसीने को बाँह ही से पोछते हुए सब्या के बेटे संबरन की ओर देखा और कहा,  ‘“तुम्हारे बाबा अब खतरे से बाहर हैं बेटा ! अच्छा हुआ तुम जल्दी से पहुँच गए , ये सब्या हमेशा से ही मुझे ऐसा ही दौड़ाता रहता है ...अचानक ही चौंका देने की आदत जाती नहीं कमबख्त की... कितने खेल खेलता है !”’
 ‘डॉक्टर अंकल, “इन्हें अब आगे की मेडिसिन ....”’
 ‘“बस इसे कुछ महीने फुल बॉडी कीमो देना होगा , कुछ साल तक दवाईयाँ और साल में दो बार मेरे पास चेक अप और हाँ ..फिजियो थेरेपी भी !”’
 ‘किन्तु बाबा तो आमार पाशे …’
 ‘जानता हूँ, वो तुम लोगों संग रहना पसंद नहीं करेगा... सोचता है क्यूँ तुम सभी को तकलीफ़ दी जाये! वैसे तुम्हें चिंता करने की कोई बात नहीं बेटा.. इसका मेडिकल का सारा ख़र्चा हम लोग उठायेंगे | इसने इस हॉस्पिटल को इतना दिया है , क्या ये हॉस्पिटल इसके लिए इतना भी नहीं कर सकता ?’” 
 ‘लेकिन बाबा यहाँ, अकेले ? वो भी अब बिना राईट लेग के ..”’
 ‘हाँ सो तो है लेकिन संबरन, वो यहाँ अकेले नहीं हैं .. उन्हें यहाँ एक साथी मिल गया है !”’
 ‘साथी? कौन??’ डॉक्टर संग चलते चलते संबरन कुछ खुश सा हुआ लेकिन चौंक भी गया |
 ‘एक भली सी स्त्री हैं ... क्या नाम बताया याद नहीं आता लेकिन कह रही थी की तुम्हारे बाबा की जबलपुर की दोस्त हैं !’” संबरन को क्यों बेफ़जूल कुछ ज्यादा बताया जाये, डॉक्टर सोच रहे थे |
  ‘ओह्ह .. जबलपुर की ? फिर तो वो वोही होंगी ..”’
 ‘कौन ?’
 ‘बाबा उन्हें बड़े अरसे से ढूँढ रहे थे .. क्या नाम था , जूही ? नहीं नहीं रूही ... रूही फडणीस. बाबा के घर के सामने रहती थी”’ कहते हुए संबरन हौले से मुस्कुरा पड़ा |
 ‘तेरे बाबा को फिलहाल होश आने में तीन से चार घं'टे लग सकते हैं | तुम उतनी देर मेरे केबिन में आराम करो |’” डॉ श्रीमाली उसे अपने केबिन में  बैठा कर दूसरे डॉक्टर्स से बातें करने चले गए |
कुछ देर बाद डॉ साहब अपने साथ कॉफ़ी के दो बड़े मग लेकर आये | इसके साथ ही संबरन और उनके बीच गहरी बातें होने लगी | कॉफ़ी का मग साइड टेबल पे रखते हुए संबरन बोला ,‘और आपको पता है , बाबा और रूही जी इकट्ठे इतनी शैतानी करते थे की पूछो मत ! ताल से सिंघाड़े जमा कर के लाना, यादव कॉलोनी के मोड़ पर जो परचून वाला था उससे चूरण की बड़ी बड़ी गोलियाँ नहीं , बम गोले लेकर आते थे ये लोग और फिर बाबा की चार मंजिला चौल की छत पे जाते, एक जगह जहाँ मुंडेर टूट गयी थी और जहाँ से रेत-गारा नीचे गिरता रहता था, वहीं बैठते और मज़े ले लेकर चूरण खाते थे ...”’
 ‘ “अच्छा ? क्या उम्र रही होगी दोनों की तब ?’
 ‘“उमर ? बाबा और रूही जी दोनों एक ही स्कूल में पढ़ते थे – सेंट थॉमस स्कूल में, एक ही साइकिल रिक्शा में जाते , एक ही क्लास में पढ़ते थे ... कभी बाबा फर्स्ट आते और रूही जी सेकंड तो कभी ठीक इसका उल्टा ! सिर्फ पाँच या शायद छे साल तक की उमर तक साथ रहे ये.. और फिर भी बाबा को ये सारी बातें ऐसे याद रहती हैं जैसे कल ही की बात हो !’
 ‘“अच्छा फिर, फिर क्या हुआ ?’” डॉक्टर साहब ने उठ कर खिड़की का पर्दा हल्के से पूरी खिड़की पर फैला दिया ... दोपहर की तेज़ धूप अचानक भीतर आने लगी थी !
 ‘“इनकी शरारतों के किस्से सारे मोहल्ले में मशहूर थे डॉक्टर अंकल | सुबह सुबह पाँच बजे के आसपास इनकी कॉलोनी के सभी संघी लोक इकट्ठा होकर प्रभात फेरी निकालते थे जिसमें राष्ट्र प्रेम के गीत गाये जाते थे | कॉलोनी के अधिकांश घरों से छोटे छोटे बच्चे हर रविवार को इस प्रभात फेरी में हिस्सा लेने जाते थे | बाबा बताते थे ये दोनों जान बूझकर उन  संघी कार्यकर्ताओं की ख़ाकी हाफ पैंट पे धूल मिट्टी उछालते फिरते थे ... जब पकड़ा जाते तो खूब डाँट पड़ती थी लेकिन इन दोनों को कोई परवाह नहीं थी ज़माने की .. ये क्षमस्व-क्षमस्व कहते हुए अगले रविवार वोही मिट्टी धूल कंकर का खेल शुरू कर देते थे ! हाउ डेरिंग एंड एडवेंचरस ऑफ़ देम, राईट ?”’
 ‘तो गोया की इन्हें शुरू से ही धूल मिट्टी में खेलने का शौक रहा है .. यहाँ भी बागीचे का सारा काम ये दोनों ही देखते हैं !”’
 ‘अरे अंकल धूल मिट्टी का अब क्या बतायें ..”’
 (संबरन अब तक निश्चिंत मन से डॉक्टर साहब से बात करने लगा था पिछले कुछ घंटों की गुफ्तगू में वो उसके लिए घनिष्ट , मित्रवत अंकल बन गए थे|)
‘“बाबा और रूही जी ने मिल कर बचपने में ही हमारे चिर-परिचित छिपा छिपायी खेल को बहुत नया आयाम दे डाला था | ये खेल कुछ ऐसा था ...
 दस से बारह छोटे बड़े बच्चों के समूह में , एक कोई दाम देता था – दाम देना माने उसे दूसरों को ढूँढना /पकड़ना होता था | अब ये आम तरीके का ढूँढना नहीं था .. उस दाम देने वाले बच्चे की आँखों पे कसके पट्टी या रूमाल बाँधा जाता .. फिर बाकि बच्चों में से कोई एक उसे थोड़ा सा घुमा फिराकर पास पड़ी मिट्टी का ढेर हाथों में दे देता था ... दूसरा कोई और आकर उस मिट्टी के ढेर पे एक बड़ी सी टहनी या डंगाल लगा जाता (बिलकुल पताका की तरह ) और फिर उस दाम देने वाले को गोल गोल घुमाया जाता ... उसकी आँखों पे पट्टी बंधी होती, उसके दोनों हाथों की अंजुलि में मिट्टी ,उस पर टहनी रूपी पताका ...और तब कोई एक आकर उसे हौले से ‘धक्का’ देता और कहता, पकड़ो !!’
डॉक्टर श्रीमाली अब तक पूरी तरह इस किस्से में डूब चुके थे ... बोले, ‘“फिर??”’
  ‘हाँ फिर , फिर वो दाम देने वाला, अपने हिसाब से दिशा का आकलन करता, तालियों की आवाज़ में दौड़ता और ज्योंही उसे लगता कोई नजदीक है , उस पर वो मिट्टी का ढेर और टहनी फेंक देता ... जिसे भी वो मिट्टी और टहनी छू जाती, उसे आउट क़रार दिया जाता और उस पर दाम आता ...’”
  ‘ये तो बड़ा दिलचस्प खेल मालूम होता है , सब्या ने हमें कभी नहीं सिखाया’” एक ठंडी सांस छोड़ते हुए संबरन बोला, ‘बाबा ने वो गेम खेलना बंद कर दिया था अंकल| जिस टूटी हुई मुंडेर पर बैठना इन दोनों ही को बहुत पसंद था, उसी टूटी मुंडेर के अरक्षित हिस्से पर एक रोज़ मेरी बड़ी बुआ, दुर्गा दी खड़ी थीं .. उन पर दाम आया था , पच्चीसों बच्चों का हुल्लड़ मचा हुआ था ! यह खेल अक्सर छत पर ही खेला जाता ताकि दिशाओं का अंदाज़ा मिलता रहे और नीचे सड़क पर लोग भी परेशान ना हो ! उस रोज़, छोटी सी रूही ने दुर्गा बुआ की आँखों पे कस के पट्टी बाँधी ..किसी ने हाथ में मिट्टी का ढेर दिया  और उस पर टहनी लगायी ... गोल गोल घुमाया और छोड़ दिया | तब सब्या बोला, ऐसे कैसे छोड़ दिया तुमने दी को .. और हँसते हँसते ‘धक्का’ दे दिया !!” पाँच साल के सब्या को इस बात का इल्म ही न था की उसकी प्यारी दुर्गा दी उसी टूटी मुंडेर के मुहाने पे खड़ी थी ...’
“ ;दुर्गा दी ओ ओ ओ ओ ओ माँआआ चीखते हुए चौथे माले से नीचे बेर की कँटीली झाड़ियों में गिर पड़ी !शायद उन बेर की झाड़ियों को दया आ गयी होगी .. एक बार को लगा की दीदी उन झाड़ियों में फँस जायेंगी ....ताड़ सी लड़की की देह किंतु उन झाड़ियों को चीरते हुए धम्म से एक बड़े से पत्थर पे आ गिरी .. सीधे माथे पे ही चोट लगी थी !”  
सब्या, रूही और तमाम सारे बच्चे जितनी देर में चार मंजिलें फलांगते हुए नीचे  पहुँचते ..’” संबरन की इतना कहते कहते रुलाई फूट गयी |
डॉक्टर साहिब ने उठकर उसकी पीठ पे हाथ फेरा और खुद के आँसू पोंछकर उसे पानी का ग्लास पकड़ाया |
“ ‘मेरी दादी माँ दुर्गा बुआ की लाश को गोद में लिए ज़ोर ज़ोर से रोती रहीं ... सारा खेल ख़त्म हो चुका था !”’
कमरे में कुछ देर के लिए सन्नाटा छाया रहा | चालीस साल पहले की घटना जिसे उन दोनों ने ही देखा नहीं था ... आज उनके समक्ष अपनी पूरी क्रूरता संग दोनों के ह्रदय को मथ रही थी ..
“ ‘उसके बाद बाबा के जीवन से जैसे सब कुछ छिन गया .. वो शरारतें , वो नटखट-पना, वो हँसी ठिठोली ..जीवन के उस क्रूर खेल के समक्ष अब उन्हें कोई खेल नहीं सूझता था ... रही सही कसर रूही जी की माँ के भोपाल ट्रान्सफर हो जाने ने पूरी कर दी ... उन गर्मियों में रूही जी अपनी माँ के साथ, अपने पिता  संग भोपाल रहने चली गयीं | हम सभी को बाबा के बचपन की बस इतनी ही बातें पता हैं | इसके बाद तो वो हमें हमारे बाबा के रूप में ही मिले !’ 
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(४)
 आमी छेये छेये देखी शारा दिन
“ ‘देट गेम ऑफ़ छिपा छिपायी ... जिस पे दाम आता था तो पीछे वाला उसे ‘धक्का’ देता था .... और फिर आँखों पे बंधी पट्टी लिए और हाथों में मिट्टी का ढेर उठाये दाम देने वाले को किसी और को पकड़ना पड़ता था … सुभा , तुम्हें नहीं लगता हम फिर से वोही गेम खेल रहे हैं ... वो गेम जिसे हमने चार साल की उम्र में मिल कर बनाया था , आज पैतालीस  साल की उम्र में हमें वोही गेम फिर से एक दफा खेल कर उसका हिसाब चुकाना होगा !’”
“ ‘रूही, दुर्गा दी की उस खौफनाक मौत ने मेरी ज़िन्दगी को ही दहला दिया ... मेरे संग ज़िन्दगी ने तो तभी हिसाब चुकता कर लिया था !”’
  ‘माँ हमेशा समझाती रही , “सब्या , खुद को दोषी मत समझ .... तेरी उसमें कोई गलती नहीं थी ... तू क्यूँ पश्चाताप करता है ?’” 
 ‘“सच मानो रूही , मैं सारी ज़िन्दगी खुद को कुसूरवार मानता आया हूँ .. दुर्गा दी को धक्का मारने की सज़ा मेरे दिल ने सारी ज़िन्दगी भोगी है ...”’
रूही ने सुभा का हाथ अपने हाथों में लेते हुए कहा , “ ‘वो परिस्तिथि थी सुभा , और परिस्तिथियाँ तो इंसान से जाने किस किस खेल का बदला चुकाया करती हैं ... कई बार हमें ऐसे खेल का भी दोषी क़रार दे दिया जाता है हम जिसका हिस्सा ही न रहे हों ! तुमने जो भी किया , जानकर नहीं किया, इस बात की मैं साक्षी हूँ ! सुभा, आओ इस दफ़ा हम दोनों मिल कर दाम दें ! चिंता मत करो , मैं हूँ न तुम्हारे संग !”’
 ‘“दाम तो दे देंगे रूही ..लेकिन वो मिट्टी ... वो मिट्टी का ढेर किस पर फेंकेंगे?”’  
 ‘“मिट्टी फेंकेंगे इस मरदूद केंसर पे जो शरीर को नहीं, दिल को, मन को जकड लेता है ! अब ये लाइलाज़ बीमारी नहीं रही ... देखो तुम्हारे आस-पास ..कितने लोग इस में से उबर कर आज ख़ुशी ख़ुशी ... शायद ज्यादा ख़ुशी से जी रहे हैं ! धूल झोकेंगे हम इस कमबख्त बेनूर सी मौत के मुँह पर और हम जीत के दिखायेंगे ...’”
रूही के तमतमाये चेहरे को देख सुभा दो पल के लिये कहीं खो गया ..
रूही के  चेहरे पर खिल आयी एक लट को हौले से उसके कानों के पीछे टांक कर गाने लगा  .. 
“ ‘आमी छेये छेये देखी शारा दिन , आज ओई चोखे शागोरीरो नील 
आमी गाईची गान गाईची, बुझी मोने मोने होए गेलो मिल..”’
“ ‘माने ?”’
“ ‘ये बहुत पुराना बांग्ला गीत है प्रिये ..इसका मतलब है मैं सारे सारे दिन तुम्हारी आँखों को देखता रहता हूँ जिनमें मुझे नीला नीला सागर दिखाई देता है ... और फिर , और फिर मैं एक गीत गाता हूँ और ऐसा जाना पड़ता है जैसे हम एक हो गए हों .. आमी छेये छेये ..”’
सुभा के इस रोमांटिक मूड को देख रूही लरज़ गयी .. बात बदलने की गरज़ से बोली , “ ‘तुम्हें याद है , इस गेम को कोई जीत नहीं पाता था ?”’
 ‘“हाँ ! हर दफ़ा दाम देने वाला या तो किसी को पकड़ नहीं पाता या खुद ही पकड़ा जाता था! लेकिन इस दफा हम, दाम देने वाले ही जीतेंगे ..है न ?”’
“  ‘सुभा , आज जयपुर फुट वाले लोग आकर तुम्हारे पाँव का नाप लेकर जायेंगे और बस महीने भर में तुम फिर एक बार चल फिर सकोगे और बहुत जल्द दौड़ भी पाओगे ...’” कहते कहते रूही की आँखें भर आई थी ..
“ ‘अच्छा , तुम्हें किस्मत पर इतना भरोसा है?’”
“ ‘मुझे तुम पर भरोसा है, मिस्टर सब्यसाची दत्ता, माई डियर दोस्त सुभा !”’
“ ‘हम्म और फिर हम दोनों दोस्त ढ़ेरों अधूरे काम पूरे करेंगे ...सबसे पहले ताल के पास खड़े होकर सिंघाड़े समेटेंगे !!”’
“यकीनन ...” रूही ने तुरंत नज़र फेरते हुए कहा’  आँखों से बेलगाम आँसुओं का सैलाब बाहर उमड़ने को आतुर हो चला था ..
“ ‘सोच लो, मैं लोखंडे साहब से कहूँगा जनाब आप तो वातावरण और समाज का ख्याल रखते हैं ... हमें रूही का ख्याल रखने दीजिये ...!”’
सुनकर दोनों ही ने एक ठहाका लगाया | आँसू जिस रास्ते बाहर आने को बेताब थे, दो पल में जैसे दुम दबाकर कहीं भाग गए|
शाम हो चली थी और दोनों ही टहल रहे थे रूही सुभा की व्हील चेयर को एक हाथ से हौले से संभाले थी ... पुणे के खुशनुमा मौसम में मंद मंद हवा बह रही थी और ट्रस्ट के सुन्दर बागीचे में लगाये ऊँचे पेड़ों पर रंग बिरंगे फूलों की छटा देखते ही बनती थी | रूही को लग रहा था जैसे वो किसी ऊँचे टीले पे बैठ के गन्ने छील कर खा रही है  और मज़े से पैर हिलाते हुए उसका पसंदीदा गाना गा रही है ... “पुरवैय्या ले के चली मेरी नैय्या ...जाने कहाँ रे ... और नेपथ्य से एक आवाज़ आती है , -- मैं भी यहाँ रे, तू भी यहाँ रे ...”
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(५)
सत्याग्रह
“ ‘रूही , उठो रूही , प्लीज़ ...तुम्हें खुदा का वास्ता !!”’
हॉस्पिटल के आई. सी. यू. में रूही के बेड के पास व्हील चेयर पे बैठे सुभा की आवाज़ उसे सुनाई देती है ... सुभा उसे हौले हौले जगाने का प्रयत्न कर रहा है| 
रूही धीरे से आँखें खोलती है , सुभा को अपने सम्मुख पाकर हलकी सी स्मित उसके चेहरे पे आ जाती है ... रात अचानक रूही की तबियत बहुत ज्यादा खराब हो जाने से उसे आई. सी. यू. में शिफ्ट करना पड़ा था | पिछले तीन घंटों की मशक्कत के बाद डॉक्टर्स उसे होश में ला पाए हैं |
“ ‘रूही , यू स्काऊँडरल !! तुमने मुझे पहले क्यूँ नहीं बताया ? तुमने मुझसे झूठ कहा की तुम यहाँ सोशल वर्क करने आई हो !! मैं तुम्हें कभी माफ़ नहीं करूँगा ...जाओ मैं तुमसे कट्टी ... बड़ी वाली कट्टी !!’” कहते हुए कब सुभा की आँखों से आँसूओं की धार बह चली उसे ही पता न पड़ा |
“ ‘तुमने तो कहा था हम दोनों को वो गेम खेलना बाकी है ...संग खेलने वाली थी न तुम तो, फिर बीच ही में क्यूँ साथ छोड़ के जा रही हो ? बोलो ?”’
 ‘“सुभा , कहाँ साथ छोड़ के जा रही हूँ ? तुम्हें मेरा धक्का देना बुरा नहीं लगता न ? सो मैंने तुम्हें ‘धक्का’ दिया ना ... मैंने तुम्हें ज़िन्दगी की ओर ‘धक्का’ दिया ... तुम्हें फिर चलना होगा , दौड़ना होगा ... ये बाज़ी, ज़िन्दगी की मौत पे शह दिखानी होगी ...”’
“ ‘रूही ...प्लीज़”’
“’और रही बात मेरी , तो अब ‘धक्का’ देने की बारी तुम्हारी है सुभा ... तुम पीछे नहीं हट सकते इससे !”’ कहते कहते रूही फिर एक बार सुस्ताने लगी थी’ ... सुभा उसे कंधे से हिलाता उतने में डॉक्टर श्रीमाली और संबरन अन्दर आ गए | 
“ ‘डॉक्टर ..देखो न रूही को ...”’
“ ‘सुभा (सब्या अब सब्या कहाँ रह गया था ...पिछले कुछ दिनों में वो सभी के लिए ‘सुभा’ ही हो गया था!), अब इसे आराम करने दो ... इसके पास अब कुछ ही दिन और हैं ..या शायद कुछ घंटे ...”’ डॉ ने अपने दोस्त के कानों में नीचे झुकते हुए कहा|
“ ‘डॉक्टर !!!!”’
“ ‘हाँ सुभा , शी इज़ अ टर्मिनल केस ऑफ़ ब्लड केंसर .... उसके पति सामाजिक कार्यकर्त्ता हैं शायद ..घर के किसी पुराने नौकर के साथ आयी थी दो सप्ताह पहले | खुद से ही रजिस्टर किया खुद को ..नौकर को वापस भेज दिया था तभी| एक रोज़ तुम्हें शायद बगीचे में काम करते देखा तो मुझसे तुम्हारे बारे में पूछ ताछ की ..उसे तभी पता चल गया था की तुम ही उसके पुराने मित्र ‘सुभा’ हो | हमसे कहा तुम्हारी सेवा करेगी ... उसने तुम्हें कुछ भी बताने से मना  कर दिया था इस लिए हम सभी को ये खेल करना पड़ा, उसकी बीमारी छुपानी पड़ी’
“ ‘हा हा ... शी हेज़ बीन अ मास्टर माईंड ... वो हमेशा से ही खेल बनाने में माहिर रही है .. ओह रूही !! ठीक है , लेकिन मेरी बारी बाकि है ... मेरा उसे ‘धक्का’ देना अभी बाकी है डॉक्टर |”’
एक स्पेशल वैन में रूही को जबलपुर ले जाया जा रहा था ... साथ में थी एक अति विशिष्ठ एम्बुलेंस ... 
जबलपुर के यादव कॉलोनी में शायद अब वो चार मंज़िला चौल जहाँ सब्यसाची दत्ता अपने माँ-बाबा और छोटी बहन निधि के साथ रहता था, वो टूटी मुंडेर जहाँ से उसकी बड़ी बहन दुर्गा की मौत हुई थी, वो बेरी की झाड़ियाँ , वो सानेज़ बंग्लो जिसमें रूही रहा करती थी ... वो सब होगा या नहीं, पता नहीं लेकिन सुभा की ज़िद थी की वो रूही को ताल के किनारे से सिंघाड़े समेट कर जरुर देगा , उस सड़क से ज़रूर ले जायेगा जिस पर हर इतवार वो लोग प्रभात फेरी पर जाते थे .... बाकी सारे काम अगले जनम के लिए मुल्तवी ! खुद ही से हँसते देख संबरन ने अपने बाबा को  दिलासा दिया ! सुभा ने भी उसके हाथ को अपने हाथों में ले लिया और वैन में अपने सामने लेटी हुई रूही को निहारने लगा|
चार दिनों बाद संबरन का जबलपुर से फोन आया था -- गत दिवस , रविवार को सुबह पाँच बजकर दस मिनट पर, पंद्रह यादव कॉलोनी, सानेज़ बंग्लो से रूही ने उसके बाबा, सब्यसाची दत्ता के समक्ष साँसों की अंतिम प्रभात फेरी ली थी ! परसों उसके मर्त्य अवशेष नर्मदा के लमेटा घाट के नजदीक उसके प्रिय स्थान से प्रवाहित करने जा रहे थे वो लोग | घर से कोई नहीं आ पाया था ... ख़बर सभी को कर दी थी |
डॉक्टर श्रीमाली ने मोबाईल पर बात करते हुए खुद को संभाला ... भरी हुई आँखों से हौले से कहा – “ ‘ओह, रूही !!’”
न्यूज़ चेन्नल पर देर रात एक छोटी सी ख़बर आ रही थी ... नर्मदा बचाओ आन्दोलन में प्रसिद्द पर्यावरण शास्त्री श्री लोखंडे ने आज अन्य ग्रामीणों संग ओम्कारेश्वर में जल सत्याग्रह के चौदह दिन पूरे किये ... सरकार इस मामले पर चिंतित है किन्तु इस बारे में कोई हल निकलने के संकेत नहीं आ रहे हैं ... आन्दोलनकर्ता अपने आन्दोलन से नहीं हटेंगे ....
डॉक्टर श्रीमाली ने रिमोट का बटन दबा टी वी बंद कर दिया और मन ही मन हठात बोल पड़े ... रूही, लमेटा में नर्मदा का धुआंधारी और आक्रामक रूप तुम्हें क्यूँ पसंद था, समझ सकता हूँ लेकिन लमेटा से नर्मदा संग बहते बहते थक जाओगी .... आगे चल ओम्कारेश्वर में कुछ पल विश्राम कर लेना ... शायद वहाँ दीप हाथों में लिए कोई तुम्हारा इन्तेज़ार कर रहा है !
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