मंगलवार, 10 नवंबर 2015

मील के पत्थर (७)




धरती का चप्पा चप्पा छानो तभी कोलंबस और वास्कोडिगामा बनने की उम्मीद है, कहते हैं, चाह है तो राह है - मुझे पढ़ने की चाह है, ख़ास कलम की तलाश में निकल पड़ती हूँ, ढूँढ ही लेती हूँ  … 
आज की ख़ास कलमकार हैं, 



और प्यार हो गया

यद्यपि मेरे जीवन में
पूर्वनियोजन था प्रारब्ध का
तुम्हारा पदार्पण
तथापि प्रतिक्षण
प्रति पदचाप
कान जा टिकते हैं
द्वार पर
सुनने को
करने को अनुभूत
तुम्हारा आगमन
जाने क्या परिचय है
तुम्हारे पदचापों का
मेरे कानो से
अनाम है
परन्तु
सर्वथा अंतरंग
कुछ अनाम अंतरंगता भी
बिखेर देती है जीवन में
भीनी सी सुगंध
मादकता से परिपूर्ण
अविदित, अवर्णित
परन्तु अभूतपूर्व तुष्टिदायक
यह विचार मन में आते ही
चिंतन छोड़ कर
जुट जाती हूँ मैं फिर से
तुम्हारी प्रतीक्षा में
और मेरे चहुँ ओर
फूलने लगती हैं
सुगंध की क्यारियाँ
जब हुआ था
हमें परस्पर प्रेम
कहा था तुमने
एक रस-कुण्ड है तुम्हारा प्रेम
निमग्न होना जिसमे
रुचा था मुझे
कहा था तुमने
एक भाव-गिरि है तुम्हारा प्रेम
जिस पर आरोहण
मुझे देता था सुख
कहा था तुमने
तुम अब तक हो
धरातल प्रेम का
और वहीं के होकर
चाहते हो रहना
मैंने कहा था प्रिय
तुम मुझ से ही हो
और 
प्यार हो गया



शायद दुनिया फिर बस जाए ....


जंगल-जंगल तुमको ढूँढा
तुम पानी में बैठे थे 
जब बारिश का मौसम आया 
तब तुम मुझको आये नज़र
जीवन कश्ती 
रूह खेवैया 
जिस्म समन्दर पार करें
आओ फिर तस्वीर बनाएँ
साँसों का कोलाज भरें
इस दुनिया में इतना कुछ है
इतने रंग कि हैराँ हूँ
तुम तो एक मुकम्मल दुनिया
कौन से इसमें रंग बहें
आड़ी-तिरछी रेखाओं में
हमने सड़कें ढूँढी थीं
कितने ख्वाब सजाये मिलकर
और लकीरों के जंगल में
महलदुमहले ढूंढें हमने
लेकिन जिस्म पसीना बनकर
नदियों से जा मिलता था
नदियाँ रेत बहाती रहतीं
हर चौराहा जंगल-जंगल
हर मैदान में दलदल-दलदल
खुश्क ज़मी को आओ तलाशें
फिर से इसमें फूल खिला दें
फिर से इसमें खुशबू भर दें
शायद फिर से बौर आ जाए
शायद दुनिया फिर बस जाए ............


उसका सच
*********

तुम्हे बता दूँ एक सच?
जब खिड़की से पलाश का रंग 
धूप के साथ इठलाता हुआ 
मेरे बिस्तर पर आता है 
जब बालकनी में झुक कर चाँद 
झूला झुला जाता है 
तुम्हारे श्रृंगारदान पर छोड़ी हुई तुम्हारी चूड़ियाँ 
जब मेरे हाथों से उलझ कर फर्श पर खनखना कर 
बिखर जाती हैं
गोया हर वह चीज 
जो है अस्तित्व में 
धूप,खुशबू या 
तेरे लिए मेरी कसमसाहट 
सब कुछ सिमटती हुई 
हमेशा जाती हैं तुम्हारी ही तरफ 
मानो तुम मेरे लिए ही बनी हो
चलो अब तुमने जब 
मुझे अब प्यार करना कम करना शुरू कर ही दिया है 
तो मुझे भी अब 
अपना थोड़ा प्यार बचा लेना चाहिए 
मेरी जिंदगी के मकामों से 
गुजरती है जो हवा 
तुमसे लसी हुई होती है 
और मुझे 
ले जा पटकती है 
दिल के ऐसे किनारे पर 
जहाँ तुमने इरादा कर लिया है 
मुझे अकेला छोड़ देने का 
उसी किनारे पर 
जमी हुई हैं मेरी जड़ें 
भूलना मत
तुम ऐसा क्यों सोचती हो 
कि तुम मेरी नियति हो 
और हर दिन एक फूल 
सुबह-सुबह एडियाँ ऊँची कर के 
तुम्हारा मुँह चूम लेगा?
ओह मेरी प्यार, 
मेरी अपनी 
मेरे भीतर 
कुछ बुझा नहीं है अब भी 
समझो इस सच को
जिन्दा है मेरा प्यार 
तुम्हारे प्यार के ही दम पर 
अब जब तुम बंद कर रही हो 
मुझे प्यार करना 
तो सोचता हूँ 
मैं भी समेट लूँ अपना प्यार का पिटारा 
बंद हो जा सिम सिम 
खेल खत्म |

शुक्रवार, 6 नवंबर 2015

मील के पत्थर (६)





पढ़ते हुए मीलों की दूरी तय करते हुए ठिठकती हूँ - नायाब पत्थरों पर खुदे एहसास मेरा सुकून बन जाते हैं, और क्षितिज पर अपना नाम दर्ज करते हैं !
कौन कहता है क्षितिज भ्रम है 
वहाँ तक पहुँचने के लिए 
प्रकृति की प्राकृतिक बातों को समझना होता है 
तब क्षितिज पास होता है  … 


क्षितिज पर दर्ज एक नाम सुरेश चन्द्र 
https://www.facebook.com/sureshchandra.sc

(१)
बचपना कौंधता है... 
अचानक ही... 
उम्र की स्लाइड से... 
मैं पीछे फिसलता हूँ...
मोंटेसरी की प्रार्थनाओं मे... 
जा गिरता हूँ... 
हाल्फ़ शर्ट की बाईं तरफ... 
रुमाल पिन किए हुये... 
'सिस्टर क्रिसपिन' हंस देती हैं... 
मेरी तोतली 'छोर्री' पर...
'व्रूम' की आवाज़ निकालता हूँ... 
हाथ से 'स्टीएरिंग' घूमाता हूँ... 
दौड़ पड़ता हूँ, स्कूल तक... 
लकड़ी की बेंच पर... 
चुरमुर करते हुये... 
पार करता हूँ 'अडोलोसेंस'
'बोर्ड्स' की चिंता पेशानी पर लिये... 
नहीं दे पाता लाल गुलाब, 'नुज़्ज़त' को... 
बेस्ट ऑफ लक कहते हुये, झेंप जाता हूँ... 
मेरी प्रैक्टिकल की कॉपी, सोख लेती है, 
उसी गुलाब की सूर्ख, दर्दीली पंखुरियाँ ... 
मेरा कोई निशान नहीं छूटता उसकी नोटबुक मे... 
बस वो मुझमे, कहीं 'दबी' रह जाती है...
पापा के सोंधे सपने... 
मुझे उड़ा ले जाते हैं विदेश... 
जहां हर 'डिग्री' के एंगल बनाती है... 
मंसूबे कातती जवानी... 
'करियर' और 'कॉरिडॉर' के बीच... 
कॉलेज की लड़की, जिसे... 
चूमना नहीं आता... 
कुतरती है मुंह मेरा...
अचानक चौंक कर उठता हूँ... 
और गिनती से वापस... 
आ पहुंचता हूँ गणना मे... 
नौकरी से 'बिज़नेस' तक... 
चश्मे के काँच पर भाप सा जमता हूँ... 
और पोंछ देता हूँ सारी हसरतें... 
अधेड़ होती मजबूरियों के लिये...
वो गाने, वो किताबें, वो मंसूबे, वो चाहतें... 
वो लोग सारे जो बीत कर, मुझमे पैठे हैं... 
कहते हैं... एक बार मुड़ कर, लौट आ 'बेरहम'... 
कुछ तो पूरा कर जा, 'अधूरी' कसकती टीस मे... ... .... !! 


(२)
कई बार ऐसा होता है...
हम निहायत अकेले होते हैं... 
रिश्तों की ठसाठस भीड़ मे... 
उम्मीद का बैरियर 
एक झटके से टूटता है...
और हम अपने अंदर... 
भगदड़ मे कुचले जाते हैं...
कई बार ऐसा होता है...
हम वो कह देना चाहते हैं... 
जिसे कह देना... 
संस्कार की घुट्टी पर... 
नीला फ़ेन ला देता है... 
और हम बेहद सेंसिबल हो जाते हैं... 
हमारे होने की 'हद' लिए...
कई बार ऐसा होता है...
जब हम बहुत अशांत होते हैं... 
स्क्रोल करते हैं... 
मोबाइल की पूरी कांटैक्ट लिस्ट... 
और किसी एक नंबर को मिला पाना... 
तय नहीं कर पाते... 
क्यूंकी हम पूरे 'मिले' होते हैं...
अपने ही, हर 'अधूरे द्वंद' से...
कई बार ऐसा होता है...
हम कोई मखौल नहीं बनाते... 
तमाशाई दुनिया का... 
और उसकी हर खिल्ली पर... 
मुस्कुरा देते हैं...
दम घुटते माहौल मे...
क्यूंकी बने रहना वहाँ बेहद ज़रूरी है... 
जहां के हम कभी, 'ज़रूरी नहीं' होते...
... कई बार ऐसा होता है... ... ... !! - 


(३)
तुम जब... 
जानना चाहते हो... 
मेरी 'उम्र' कि 'ऊंचाई'... 
पूछ बैठते हो... 'किस' तरह, इतने बसंत' ???
मैं नहीं दिखा पाता तुम्हें... 
मेरे अंदर
'पतझड़' का 'झड़का'... 
किसी भी 'पत्ते का संहार'...
तुम जब... 
जानना चाहते हो... 
मेरे 'रहस्यों' की 'गहराई'... 
'गिनते' हो मेरे 'अवसाद'... 
सुनने से 'अधिक'... 'बुनते' हो 'प्रमाद'... 
मैं नहीं जता सकता तुम्हें... 
अपनी 'जड़ों' कि 'जिजीविषा' पर... 
एक भी 'प्रहार'...
तुम जब... 
जानना चाहते हो... 
मेरी परिधि, मेरे वृत का आकार... 
गणना करते हो, त्रिज्या का आधार... 
मैं मोल कर औपचारिकता, शिष्टाचार... 
कहता हूँ... 
तुम्हारी धारणाओं के अनुपात मे, सरकार...
... तुम्हारी जिव्हा के... स्वादानुसार... ... .... !! 

बुधवार, 4 नवंबर 2015

मील के पत्थर (५)




जीवन में हास्य हो तो मकसदों के रास्ते लहूलुहान होकर भी मंज़िल को पाते हैं  … एक नन्हीं मुस्कान बहुत ताकतवर होती है !

आज इस मीलों की जीत में एक नन्हीं मुस्कान दे रही हैं -
सुनीता शानू 


व्यंग्य नरक में डिस्काऊंट ऑफ़र का कविता रुप



सेल की दुकान देखते देखते
एक आदमी 
नरक के दरवाजे आ गया
यमराज को देख घबरा गया
बोला हे महाराज
इतनी जल्दी क्यों मुझे बुलाया
अभी तो मेरा समय नही आया
यमराज बोला 
तुम्हें बुलाया नही गया है
तुम खुद चले आये हो 
लालच मे फ़ँस कर
हमने जो नाइनटी पर्सेंट ऑफ़र का
बोर्ड लगाया
ऎ मानव तूं उसी में फँसा आया
पर हुजूर नरक तो है यातना गृह जैसा
फिर ये ऑफ़र ये डिस्काऊँट कैसा???
यम्रराज झल्लाया
अरे क्या हमे मूर्ख समझ रखा है
तुम रोज अपनी रणनीति बदलते हो
नये-नये ऑफ़र देते हो
और तो और सुना है
आजकल तुहारी जेलो मे
कैदियों को मोबाईल से लेकर एसी तक
सारे सुख मिलते हैं
तुमने चोरो अपराधियों को इतना सम्मान दिया है कि
आजकल वो टी वी पर दिखते हैं 
छोटे चोर हो या बड़े चोर
सब अपना कैरियर बनाते हैं
इसीलिये हमने
ये तरीका अपनाया है
सेल का ऑफ़र दे
तुम्हें बुलाया है
और सोच विचार कर
विशेष फ़ेसिलिटी देने का निश्चय किया है
ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग परिवार सहित
नरक मे आयेऔर 
हमारे नरक का नाम रोशन करें
अच्छा ऎसी बात है
तो क्या ऑफ़र है बताईये
यमराज बोला
जवान आने वाले के साथ
एक के साथ एक फ़्री होगा
रूम विद अकोमोडेशन मिलेगा
फ़ार्म धरती पर भिजवा दिये गये हैं
जो जल्दी भर देगा उसका नम्बर पहला
आदमी फोरन रहने के लिये तैयार हो गया
बोला मै तो शरीफ़ आदमी हूँ सरकार
चोरो के लिये वार्ड अलग बने होंगे न
उन्हे तो आप जरूर यातना ग्रह में डालेंगे
यमराज बोला अरे मानव 
तू सचमुच पक्का बिजनेस मैन है रे
तेरी धरती पर भी
क्या चोरो का मुह काला होता है
क्या अब भी उन्हे गधे पे बिठाया जाता है
आजकल चोर तो वाह वाह करते नजर आते हैं
चोरी करके इनाम पाते है
चोरो के करिश्मे इतने मशहूर हुए हैं
कि चोर सेलिब्रिटी बन जाते हैं
जब तुम्हे चोरो को अपनाने में एतराज नही तो हमें क्यूं होगा
हमने फ़ैसला किया है
धरती के जैसे ही यमराज की जेल
पूरी तरह से सुख सुविधाओं से लैस होगी
ताकि प्रकृति के नियम को न बदले आदमी
समय-समय पर नरक में भी आ जा सके
आदमी खुशी से झूम उठ
पूरे परिवार के साथ स्पेशल डिस्काऊँट पा गया
धरती से दौड़ता हुआ नरक में आ गया 


अठन्नी तो बचाओ (चवन्नी प्रकरण)



सुबह-सुबह की खबर पर
पड़ी जब नज़र
प्यारे ने पुकारा
प्रभु! तेरा ही सहारा...
आज संसार का तुमने
क्या हाल कर दिया
मंहगाई को जवान
और
प्याज को बदनाम कर दिया

कितने सुखी थे हम
इकन्नी दुअन्नी के जमाने में
एक उम्र बीत गई थी
चवन्नी कमाने में
आज उसी चवन्नी को
कर दिया आऊट
क्या आयकर विभाग को था
मेरी चवन्नी पर डाऊट?

हे सर्वशक्तिमान
कोई उपाय बतलायें
सरकारी चंगुल से मेरी
चवन्नी को छुड़वायें...

सुनकर प्यारे की चिल्ल पौं
पत्नी दौड़ी आई
तुमको भी न प्यारे जी
कभी अकल न आई
बेवजह इतना चिल्लाते हो
सुबह सुबह बेचारे
पडौसियों को जगाते हो...

सुनकर पत्नी की फ़टकार
प्यारे लाल बोले
सुनो मेरी सरकार
क्या जमाना आ गया
मेरी चवन्नी को ही
खा गया...

पत्नी बोली प्यारे जी
चवन्नी तो जाने कब से
खो गई थी बाज़ारों में
लुटते-लुटते लुट गई थी
भिखमंगों की कतारों में
और अब तो
भिखमंगो ने भी पल्लू छुड़ा लिया
जाने कबसे
सम्पूर्ण चवन्नी को ही गटका लिया

चवन्नी का तो बस
रह गया था नाम
अस्तित्व तो कबका
सिमट गया श्रीमान...

प्यारे हुए परेशान बोले भाग्यवान
चवन्नी भर की चवन्नी ने
कितनी दौड़ लगवाई थी
तब जाके एक चवन्नी
अपनी जेब में आई थी।
इस छोटी सी चवन्नी ने
कितनों को बना दिया
चवन्नी छाप
कैसे भूल गई हैं
 इसकी गरिमा को आप?

रोते हुए प्यारे को
पत्नी ने समझाया
चवन्नी खोने का गम
है उसे भी बतलाया

जो होना था हुआ प्यारे मोहन
खुद को अब समझाओ
हो सके तो अपनी
अठन्नी को बचाओ...

मंगलवार, 3 नवंबर 2015

मील के पत्थर (४)




भावनाओं के रास्ते अंतहीन होते हैं, कई भाव स्तम्भ की तरह मिलते हैं, जिनसे टेक लगाकर बैठना, उनसे अपनी भावनाओं के तार जोड़ना असीम सुकून देता है  … 


आज भावों का स्तम्भ हैं 
© आशा चौधरी,  संपादक- भारतकोश

सपने


एक डग रख कर 
जब डग दूसरा
बढ़ाया था
जाने अनजाने 
एक गठरी सी 
बंध गयी थी 
मेरे साथ 
सपनों की

पता ही नहीं चला 
कि कब 
इस ज़िन्दगी के 
सफ़र में चलते चलते 
वज़न बढ़ता गया
सपनों का
जब तक समझ में आया
सपने बहुत भारी हो गये थे
और सफ़र मुश्किल...

धीरे धीरे सपनों का
वज़न कम करना 
शुरू कर दिया
हर मोड़ पर उतार रखा
एक सपने को 
और उम्र के इस पडाव पर
जब सपनों की सुध ली
तो देखा 
वो सपने तो मेरे 
थे ही नहीं…

अपने सपने तो सबसे पहले
उतार कर रख दिए थे
किसी मोड पर
और जो साथ थे
वो ना मेरे थे
और ना ही उनकी
थी ज़रूरत अब…

आँख खुली तो
सपने नहीं हैं
और जब सपने थे
तो एहसास ही नहीं था...
सपनों का...



मैं तो कृष्ण हूँ


तू मेरी राधा
मेरी मीरा
मेरी रूक्मणी
मेरी सत्यभामा
तू जामवंती, सत्या,
भद्रा, लक्ष्मणा,
मित्रविंदा और कालिंदी भी
और गोपियाँ भी

सारा प्यार तुम्हारा
समर्पण तुम्हारा
प्यार तुम्हारा
विश्वास तुम्हारा
सब तुम्हारा
पर मैं ?

मैं तो कृष्ण हूँ
राजनीति मेरी
चालें मेरी
व्याख्याएँ भी मेरी
मैं किसी एक का नहीं
इसीलिए
मेरा कोई सहचर नहीं
मेरे पास ज्ञान है
महाभारत है
गीता है
ब्रह्माण्ड है
मैं कभी मरता नहीं
इसलिए कभी जीता भी नहीं
मेरे पास हृदय नहीं
सिर्फ़ मस्तिष्क है
साम दाम दण्ड भेद
कुछ भी करना हो
अंत में जीतता तो
मैं ही हूँ
जीतता हूँ
योग से
शक्ति से
छ्ल से
माया से
छाया से।
उद्देश्य नहीं
मेरे लक्ष्य होते हैं
छ्ल, प्रपचं
सब रचता हूँ
और इस सब में
मैं भी हारता हूँ
मैं ही हारता हूँ...

सोमवार, 2 नवंबर 2015

मील के पत्थर (३)




कई चेहरे जीवंत पांडुलिपियाँ होती हैं, जिनका प्रकाशन मस्तिष्क करता है,  !.... 
पढ़ते हुए शब्द धमनियों में प्रवाहित होते हैं, और बीमार मन, अकेले मन के सहयात्री बन जाते हैं ! मीलों रास्ते पल भर में बदल जाते हैं, एक सारांश सा मिल जाता है अपनी सोच, अपनी चाह का  .... 
मिलिए अंजना टंडन से 

(1 )
सुनो
अगर तुमसे पहले
कभी मैं चला जाऊँ
तो,
मेरी कब्र पर, तुम
रोज़ मत आना,
फूल भी मत लाना,
सिर्फ
घर बैठ कर
चार काम करना....!!!!
सुबह सुबह
अपने बिस्तर पर
मेरी वाली साईड के
तकिये को गले से लगा,
अपनी मधुर श्वासों
से भर देना.....
......
फिर चढी दोपहरी
मेरी कमीज़ की
तह खोल,हाथ फिराना
सूँघना ,सहलाना
फिर से तहाना
और, साथ ही
बाईं तरफ की जेब में
जरा सा हाथ डाल देना,
मेरा धड़कता सा दिल
तुम वहीं पाओगी....
..........
शाम ढले
बाहर बगिचे में
मेरी पसंद के
पेड़ों के झुरमुट तले बैठ
फुदकती, घर लौटती
गिलहरियों को देखना,
उनकी धारियाँ गिनना,
तुम कहती थी ना, कि
" जितनी धारियों वाली
दिखाओगे, उतनी बार मैं
तुमको प्यार करूँगी "
चीटिंग मत करना......
............
और, देर रात
उसी तरह तैयार होकर
एक एक कर जूड़े में से
पिन निकालना,
बुन्दे खोलना
इत्र लगाना
और फिर, आइने में
देख, अपनी आँखों के
सारे शून्य
एक एक करके
जमा करना,
उनसे पहले मेरी
एक खनकती सी, प्यार भरी
मुसकराहट लगा देना,
पूरी रात के लिए वो
काफी होगी.....!!!
और हाँ,
सुबह होने से पहले
पोरों से हथेली पर मेरा नाम लिख
अपनी पलकें रख देना
चार थमे से, घुटते हुए से
आँसू बहा देना...!!!
मेरी कब्र पर
तुरन्त से
चार फूल उग आयेंगें.....
बस और कुछ नहीं करना 
मेरी कब्र पर तुम मत आना...!!!



(2 )
उम्र की सीढ़ियाँ चढ़ते चढ़ते
पहुँच गई थी
उस घाट तक , जहाँ
निर्लिप्तता का एकान्त था,
सरोवर में व्याकुलता नहीं
एक निस्संग तल्लीनता थी,
उस पल में अटकी थी सालती सी
एक लुढ़कते आत्मविश्वास की गंध,
किनारे पर खड़े बरगद के
शुष्क पत्ते निस्पृहता से
पानी की कगार पर
डूबक डूबक के
अंतिम यात्रा पर थे,
दूर दूर तक फैली थी एक
उदास धूप की पीली सुगंध,
इसके पहले कि
अवसाद का विलाप
मुझ पर आलम्बित होता,
सुनाई दिया
जल की सतह पर
फूटते बुलबुलों का हास्य,
ये कैसा एक
हवा का ताजा झोंका,
शायद
जीवन था कहीं तली में,
बस ज़रूरत थी
फेफड़े भर के
एक
गहरी डुबकी की,
इस छोर पर मैं
मंथर ही सही
पर गतिमान हो
निगल लेती हूँ
वो अटकते
हलक के काँटें,
उलटी कलाई से आँखें पौंछ
समुन्दर के वक्षस्थल को
सौंप देती हूँ
अपनी कृशकाया सी नाव ,
कितना कुछ पाना है
कितना कुछ मिलता है
एक और कोलम्बस जन्मता है,
दूर तक फैली थी 
आमंत्रित करती
गुनगुनाती धूप, 
कितना आसान था वो सफर....!!!

रविवार, 1 नवंबर 2015

मील के पत्थर (२)





भावनायें अहले सुबह सूर्य नमस्कार के साथ, सपनों की निशब्द साँसों की दुनिया में अलख जगाती चलती हैं, कोई उन्हें पिरो लेता है, कोई आँखों में भर लेता है, कोई जीने का सम्पूर्ण सबब बना लेता है  … कागज़ पर कब क्या उतर आए, ये उतारनेवाला भी नहीं जानता।  पढ़नेवाले की नज़रों में कब कौन लेखन मुखर हो, सुकून दे जाये, सब अचानक होता है  - 

आज मेरी नज़र में मीलों तक फैली वंदना बाजपेयी हैं -


घर वापसी



रोटी की तलाश में घर से दूर गए लोग
हर रोज देते हैं दिलासा खुद को
बस कुछ समय और
कि एक दिन लौट जायेंगे घर की ओर
गाते हुए राग मल्हार 
जैसे लौट आते है पखेरू
अपने घोंसलों में मीलों उड़ने के बाद

पर घर वापस आना
सदा घर वापस आना नहीं होता...........
कभी-कभी समय की चाक पर पक कर
रिश्ते ले चुके होते है
कोई दूसरा आकार
या उम्र के साथ हो जाता है दृष्टि भ्रम
दूर से जो नज़र आते थे पास
अब पास से नज़र आते हैं दूर
कभी- कभी टूट चुका होता है
खुद काही कोई कोना
चटके दरके कई टुकड़ों में
कहाँ आ पाते हैं साबुत
..
.
या कभी -कभी जिनकी तलाश में
आते हैं लौटकर
ढूढ़ते हैं जिन्हें बदहवास
वो लोरियां छुप गयी होती हैं
फ्रेम में जड़ी तस्वीर पर चढ़ी माला में
या दिन -रात खटकती हुई लाठी
मात्र रह जाती है टंग कर अलगनी पर
अनछुई सी
जब भी घर से बाहर निकलों
येसोच लेना
कि घर वापस आना
सदा घर वापास आना नही होता...........


                ।भीड़ का मनोविज्ञान।


बहुत कठिन है समझना
भीड़ का मनोविज्ञान
जब ये साथ चलती है
उसमे आ जाता है
सौ हाथियों का बल
बड़ी-बड़ी सत्ताएं
हिल जाती हैं
ये जिसे चाहे राजा
बना सकती है
ये जिसे चाहे धूल
चटा सकती है

भीड़ चलते-चलते
रास्ते से एक
पत्थर उठाती है
उसे हीरा बताती है
अचानक सहस्त्र स्वर
स्वर में स्वर मिलाने लगते हैं
वो पत्थर भी खुद बदलने लगता है
और हीरा बनने लगता है

असली हीरे चिल्लाते हैं
पड़े-पड़े धूल खाते हैं
पर भीड़ मानने को
तैयार नहीं होती
उसमें वाद-विवाद
या तकरार नहीं होती
फिर हीरे भी भीड़ में मिल जाते हैं
और पत्थरों को हीरा बताते हैं

अलग ही होता है
भीड़ का हर काम
बहुत कठिन है समझना
भीड़ का मनोविज्ञान


शनिवार, 31 अक्टूबर 2015

मील के पत्थर (१)





हमेशा कुछ अलग प्रस्तुत करने की इच्छा मन में अनगिनत लहरों सदृश्य उठती-गिरती है, किनारे पड़े, तल में पड़े पत्थरों को छूकर महसूस करती हूँ उनका होना।  किसी एक पत्थर में भगवान होते है, किसी पत्थर में इतिहास,किसी में अपने मन के अनगिनत प्रश्न, किसी में उत्तर की संभावनाएँ  … ये होते हैं मील के पत्थर !
रचनाओं के घेरे से गुजरते हुए कुछ रचनाएँ, कोई व्यक्ति मील के पत्थर सा दिख जाता है  … मैं शुरू करुँगी क्रम से कुछ मील का पत्थर बनी रचनाओं का प्रस्तुतीकरण अपनी नज़र से  …


राजेश्वर वशिष्ठ 
rajeshwar_v@hotmail.com

जानकी के लिए 

मर चुका है रावण का शरीर
स्तब्ध है सारी लंका
सुनसान है किले का परकोटा
कहीं कोई उत्साह नहीं
किसी घर में नहीं जल रहा है दिया
विभीषण के घर को छोड़ कर ।
सागर के किनारे बैठे हैं विजयी राम
विभीषण को लंका का राज्य सौंपते हुए
ताकि सुबह हो सके उनका राज्याभिषेक
बार-बार लक्ष्मण से पूछते हैं
अपने सहयोगियों की कुशल-क्षेम
चरणों के निकट बैठे हैं हनुमान !
मन में क्षुब्ध हैं लक्ष्मण
कि राम क्यों नहीं लेने जाते हैं सीता को
अशोक वाटिका से
पर कुछ कह नहीं पाते हैं ।
धीरे-धीरे सिमट जाते हैं सभी काम
हो जाता है विभीषण का राज्याभिषेक
और राम प्रवेश करते हैं लंका में
ठहरते हैं एक उच्च भवन में ।
भेजते हैं हनुमान को अशोक-वाटिका
यह समाचार देने के लिए
कि मारा गया है रावण
और अब लंकाधिपति हैं विभीषण ।
सीता सुनती हैं इस समाचार को
और रहती हैं ख़ामोश
कुछ नहीं कहती
बस निहारती है रास्ता
रावण का वध करते ही
वनवासी राम बन गए हैं सम्राट ?
लंका पहुँच कर भी भेजते हैं अपना दूत
नहीं जानना चाहते एक वर्ष कहाँ रही सीता
कैसे रही सीता ?
नयनों से बहती है अश्रुधार
जिसे समझ नहीं पाते हनुमान
कह नहीं पाते वाल्मीकि ।
राम अगर आते तो मैं उन्हें मिलवाती
इन परिचारिकाओं से
जिन्होंने मुझे भयभीत करते हुए भी
स्त्री की पूर्ण गरिमा प्रदान की
वे रावण की अनुचरी तो थीं
पर मेरे लिए माताओं के समान थीं ।
राम अगर आते तो मैं उन्हें मिलवाती
इन अशोक वृक्षों से
इन माधवी लताओं से
जिन्होंने मेरे आँसुओं को
ओस के कणों की तरह सहेजा अपने शरीर पर
पर राम तो अब राजा हैं
वह कैसे आते सीता को लेने ?
विभीषण करवाते हैं सीता का शृंगार
और पालकी में बिठा कर पहुँचाते है राम के भवन पर
पालकी में बैठे हुए सीता सोचती है
जनक ने भी तो उसे विदा किया था इसी तरह !
वहीं रोक दो पालकी,
गूँजता है राम का स्वर
सीता को पैदल चल कर आने दो मेरे समीप !
ज़मीन पर चलते हुए काँपती है भूमिसुता
क्या देखना चाहते हैं
मर्यादा पुरुषोत्तम, कारावास में रह कर
चलना भी भूल जाती हैं स्त्रियाँ ?
अपमान और उपेक्षा के बोझ से दबी सीता
भूल जाती है पति-मिलन का उत्साह
खड़ी हो जाती है किसी युद्ध-बन्दिनी की तरह !
कुठाराघात करते हैं राम ---- सीते, कौन होगा वह पुरुष
जो वर्ष भर पर-पुरुष के घर में रही स्त्री को
करेगा स्वीकार ?
मैं तुम्हें मुक्त करता हूँ, तुम चाहे जहाँ जा सकती हो ।
उसने तुम्हें अंक में भर कर उठाया
और मृत्युपर्यंत तुम्हें देख कर जीता रहा
मेरा दायित्व था तुम्हें मुक्त कराना
पर अब नहीं स्वीकार कर सकता तुम्हें पत्नी की तरह !
वाल्मीकि के नायक तो राम थे
वे क्यों लिखते सीता का रुदन
और उसकी मनोदशा ?
उन क्षणों में क्या नहीं सोचा होगा सीता ने
कि क्या यह वही पुरुष है
जिसका किया था मैंने स्वयंवर में वरण
क्या यह वही पुरुष है जिसके प्रेम में
मैं छोड़ आई थी अयोध्या का महल
और भटकी थी वन-वन !
हाँ, रावण ने उठाया था मुझे गोद में
हाँ, रावण ने किया था मुझसे प्रणय निवेदन
वह राजा था चाहता तो बलात ले जाता अपने रनिवास में
पर रावण पुरुष था,
उसने मेरे स्त्रीत्व का अपमान कभी नहीं किया
भले ही वह मर्यादा पुरुषोत्तम न कहलाए इतिहास में !
यह सब कहला नहीं सकते थे वाल्मीकि
क्योंकि उन्हें तो रामकथा ही कहनी थी !
आगे की कथा आप जानते हैं
सीता ने अग्नि-परीक्षा दी
कवि को कथा समेटने की जल्दी थी
राम, सीता और लक्ष्मण अयोध्या लौट आए
नगरवासियों ने दीपावली मनाई
जिसमें शहर के धोबी शामिल नहीं हुए ।
आज इस दशहरे की रात
मैं उदास हूँ उस रावण के लिए
जिसकी मर्यादा
किसी मर्यादा पुरुषोत्तम से कम नहीं थी ।
मैं उदास हूँ कवि वाल्मीकि के लिए
जो राम के समक्ष सीता के भाव लिख न सके ।
आज इस दशहरे की रात
मैं उदास हूँ स्त्री अस्मिता के लिए
उसकी शाश्वत प्रतीक जानकी के लिए  !



उर्मिला


टिमटिमाते दियों से
जगमगा रही है अयोध्या
सरयू में हो रहा है दीप-दान
संगीत और नृत्य के सम्मोहन में हैं
सारे नगरवासी
हर तरफ जयघोष है ----
अयोध्या में लौट आए हैं राम !

अन्धेरे में डूबा है उर्मिला का कक्ष
अन्धेरा जो पिछले चौदह वर्षों से
रच बस गया है उसकी आत्मा में
जैसे मन्दिर के गर्भ-गृह में
जमता चला जाता है सुरमई धुँआ
और धीमा होता जाता है प्रकाश !

वह किसी मनस्विनी-सी उदास
ताक रही हैं शून्य में
सोचते हुए --- राम और सीता के साथ
अवश्य ही लौट आए होंगे लक्ष्मण
पर उनके लिए उर्मिला से अधिक महत्वपूर्ण है
अपने भ्रातृधर्म का अनुशीलन
उन्हें अब भी तो लगता होगा ----
हमारे समाज में स्त्रियाँ ही तो बनती हैं
धर्म-ध्वज की यात्रा में अवांछित रुकावट ---
सोच कर सिसक उठती है उर्मिला
चुपके से काजल के साथ बह जाती है नींद
जो अब तक उसके साथ रह रही थी सहचरी-सी !

अतीत घूमता है किसी चलचित्र-सा
गाल से होकर टपकते आँसुओं में
बहने लगते हैं कितने ही बिम्ब !
०००
चिन्तित हैं राजा जनक
रजस्वला हो गई हैं दोनों बेटियाँ
पर वे अब भी खेलती हैं बच्चों की तरह
पुरोहित से करते हैं विमर्श
उनके विवाह के लिए
पड़ोसी राजाओं की नज़र लगी है
परम सुन्दरी सीता पर
अब सीता का विवाह करना ही होगा
खोजना होगा ऐसा वर
जो प्रत्यंचा तान दे शिव के धनुष की !

सोचती है उर्मिला --
सच, परम सुन्दरी हैं बहन सीता
पर क्या मुझमें कोई कमी है, ईश्वर ?
काश, मैं भी पिता को मिली होती
किसी नदी, नाले या खेत खलिहान में
मेरे लिए भी आता
कोई शिव या किसी अन्य देवता का धनुष
मुझे भी चाहता कोई विशिष्ट धनुर्धर !

नहीं, पर यह कैसे होता,
मैं वीर्य-शुल्का जो नहीं थी
इसलिए मुझे भी
विदा कर दिया गया सीता के साथ
ताकि लक्ष्मण को मिल सके पत्नी
और मैं विवाह के बाद भी
सीता की सहचरी बनूँ
स्त्रियाँ स्नेह में भी बना दी जाती हैं दास
उस दिन मिथिला में
यही तय हुआ था उर्मिला के लिए !
०००
न वाल्मीकि बताएँगे न तुलसी
अयोध्या के महल में कैसे रहती थी उर्मिला ?

चार बहनों में
श्रेष्ठ और ज्येष्ठ थी सीता
भोर की मलयानिल में हम पहुँच जाते थे सीता मन्दिर
देर तक होता था वेदोच्चार
यज्ञ-धूम्र से महक जाता था सारा महल
और हम चरण छूकर आशीर्वाद लेते थे ऋषियों से
सभी राजकुमार साथ-साथ चलते थे अपनी पत्नियों के
पर मैं सदा अकेली ही क्यों रही ?
लक्ष्मण सदा ही चले राम और सीता के पीछे
हे दैव, बोलो उन क्षणों में कौन था उर्मिला के साथ ?

बोलो दैव, रात को जब कई बार
बुझ चुकी होती थी दिए की बाती
प्रतीक्षा में अकड़ने लगता था मेरा शरीर
तब थक कर,
पिता और भाई के चरण दबा कर
लौटते थे मेरे पति
मैं स्नेह से सुला देती थी उन्हें पुत्रवत
और रात भर जलती थी बिना तैल की बाती-सी
क्या आपने यही नियति तय की थी उर्मिला के लिए ?
०००
राम जा रहे थे वनवास पर
विशद व्याकुलता के क्षण थे
महल में मचा था हाहाकार
सीता का आग्रह था वह जाएगी राम के साथ
मुझे तो अन्त तक यह भी मालूम नहीं था
कि लक्ष्मण भी वन जाएँगे उन के साथ
मैं जड़वत खड़ी थी महल के द्वार पर
और लक्ष्मण ने आकर कहा ---
सुनो, तुम मेरी अनुपस्थिति में
रखोगी मेरी सभी माताओं का ध्यान
यदि उन्हें कष्ट हुआ
तो हम नरक के भागी होंगे !
और वह बिना मुझे सान्त्वना का
एक भी शब्द कहे दौड़ गए राम के पीछे
दैव, ऐसा तो कोई
अपनी परिचारिका के साथ भी नहीं करता
मैं तो अग्नि की साक्षी में उनकी पत्नी बनी थी !
०००
ये चौदह वर्ष कैसे काटे हैं उर्मिला ने
पूछो किसी व्रती से
पूछो किसी ऐसी स्त्री से
जिसे दण्ड मिला हो सुहाग का
जो वचनबद्ध होकर जी रही हो
किसी काल्पनिक पुरुष के लिए
सतयुग में भी यही जीवन था एक स्त्री का !
०००
दीपपर्व है आज
और मेरे मन में गहन अन्धकार है
सच कहूँ तो मुझे प्रतीक्षा नहीं है लक्ष्मण की
मुझे प्रतीक्षा नहीं है अपने धर्मपरायण पति की
उनका आना, आना है किसी शेषनाग का
जिसके फन पर पूरी पृथ्वी स्थापित है
जो फुँकार सकता है
भस्म कर सकता है पूरा ब्रह्माण्ड
पर अपने शीश को
प्रेयसी के वक्ष पर नहीं टिका सकता !

उर्मिला, मैं तुमसे क्षमा चाहता हूँ
बिना उस अपराधबोध से मुक्त हुए
जो पुरुष ने सदा ही दिया है स्त्री को
कुछ भी तो नहीं बदला आज तक
स्त्री तो स्त्री ही रही
इस सतयुग से कलयुग तक की यात्रा में !