शनिवार, 3 नवंबर 2012

किताब..




















डॉ.अजीत 


तुमसे मिलना
कविता की तरफ लौटना है
तुमसे बिछ्डने का डर
कोई उदास गजल कहने जैसा है
कभी तुम कठिन गद्य की भांति नीरस हो जाती हो
कभी शेर की तरह तीक्ष्ण  
तो कभी तुम्हारी बातों में दोहों,मुहावरों,उक्तियों की खुशबू  आती है
तुम्हारे व्याकरण को समझने के लिए
मै दिन मे कई बार संधि विच्छेद होता हूँ
अंत में
तुम्हारी लिपि को समझने का अभ्यास करते करते
सो जाता हूँ
उठते ही जी उदास हो जाता है
तुमको भूलने ही वाला होता हूँ कि
तुम्हारे निर्वचन याद आ जाते है
जिन्दगी की मुश्किल किताब सा हो गया है
तुम्हे बांचना...
प्रेम के शब्दकोश भी असमर्थ है
तुम्हारी व्याख्या करने में
मेरे जीवन की मुश्किल किताब
तुम्हे खत्म करके मै ज्ञान नही बांटना चाहता
बल्कि मुडे पन्नों
और शब्दों के चक्रव्यूह में फंसकर
दम तोड देना चाहता हूँ
क्योंकि गर्भ ज्ञान के लिहाज़ से
मै तो अभिमन्यू से भी बडा अज्ञानी हूँ।

10 टिप्‍पणियां:

  1. वाह डॉ.अजीत साहब क्या कहना आपका यह प्रेम का अंदाज निराला है, सुन्दर अति सुन्दर, आदरणीया माँ आपको अनेक-2 धन्यवाद आपने अजीत जी की रचना को साझा किया।

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  2. क्योंकि गर्भ ज्ञान के लिहाज़ से
    मै तो अभिमन्यू से भी बडा अज्ञानी हूँ।
    अपने को अज्ञानी मानने से ज्यादा समझदारी और कुछ हो सकती हैं !!

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  3. अंतिम पंक्तियां बहुत ही सशक्‍त हैं अभिव्‍यक्ति की,

    आपका बहुत-बहुत आभार इसे साझा़ करने के लिए

    सादर

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  4. वाह....
    बहुत बढ़िया..
    तुम्हारे व्याकरण को समझने के लिए
    मै दिन मे कई बार संधि विच्छेद होता हूँ
    अंत में
    तुम्हारी लिपि को समझने का अभ्यास करते करते
    सो जाता हूँ
    बहुत सुन्दर..

    आभार रश्मि दी..
    सादर
    अनु

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  5. प्रस्तुत कविता स्वयम के निर्वचन में जीवन से संघर्षरत अभिमन्यु है ....एक शसक्त अभिव्यक्ति ...बधाई

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  6. प्रस्तुत कविता स्वयम के निर्वचन में जीवन से संघर्षरत अभिमन्यु है ....एक शसक्त अभिव्यक्ति ...बधाई

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  7. जीवन संघर्ष है और अभिमन्यु अनभिज्ञ !

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  8. क्योंकि गर्भ ज्ञान के लिहाज़ से
    मै तो अभिमन्यू से भी बडा अज्ञानी हूँ।

    प्रेम का ज्ञानी तो हमेशा अज्ञानी ही रहता है।

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  9. तुम्हारे व्याकरण को समझने के लिए
    मै दिन मे कई बार संधि विच्छेद होता हूँ |
    बहुत सुन्दर

    सादर

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