बुधवार, 9 अप्रैल 2014

आकाश को छूने से पहले (अशोक लव)





तुमने तो सपनों की सम्पूर्ण थाती मुझे दी 
पर मेरा हाथ छोड़ दिया 
अभी तो मैंने उड़ने की कला सीखी ही थी 
कर्तव्यों का अथाह सागर मेरे आगे कर दिया 
कुशल तैराक की क्या बात 
मैं तो तैरना ही नहीं जानता था 
जिम्मेदारियों के पानी में डूबते-उतराते 
बस यही ख्याल आया 
कि 
आकाश को छूने से पहले 
धरती की नमी समझ लेता 
तो अच्छा था ! …   

मेरी नज़रों से गुजरते हुए अशोक लव जी की रचना कुछ ऐसे ही भाव दे गई - रश्मि प्रभा




किशोरावस्था की सपनीली रंगीन दुनिया
गडमडगड हो गई 
कुवारे कच्चे सपनों का काँच तड़क गया 
चुभ गई किरिचें मन-पंखुड़ियों पर
पिता ! क्यों छोड़ दिया तुमने अपना संबल

इतनी जल्दी 
अभी तो उतरी ही थीं आँखों में कल्पनाएँ
कैनवस बाँधा ही था
इकट्ठे क्र रहा था रंग 
तूलिका कहाँ उठा पाया था बिखर गया सब.

उतर आया पहाड़-सा बोझ कंधों पर
आ खड़ी हुई 
जीवन की पगडंडियों में एवरेसटी चुनौतियाँ
छिलते गए पाँव
होते गए खुरदरे करतल
धंसते गए गाल 
स्याह होते गए आँखों के नीचे धब्बे.

गमले में अंकुरित हो
पौधे के आकाश की ओर बढ़ने की प्रक्रिया 
आरंभ ही हुई थी
कहाँ संजो सका सपने पौधा
आकाश को छूने के.

किशोरावस्था ओर वृद्धावस्था के मध्य
रहता है लंबा अंतराल
जीवन का स्वर्ण-काल 
फिसल गया 
मेरी हथेलियों में आते-आते.

तुम छोड़ गए मेरे कंधों पर
अपने कंधों का बोझ 
इसलिए नहीं चढ़ पाया
यौवन की दहलीज पर
तुम भी नहीं छू पाए थे मेरी भांति 
यौवन की चौखट
तुम भी धकेल दिए गए थे
किशोरावस्था से वृद्धावस्था के आँगन में .

तुम्हारे रहते जानता तो पूछता—
क्यों आ जाता है हमारे हिस्से
पीढ़ी –दर-पीढ़ी इतनी जल्दी
यह बुढापा ,
क्यों रख दिया जाता है
बछड़े के कंधों पर
बैल के कंधों का बोझ .

पिता ! तुमने बता दिया होता
तो नहीं उगाता किशोर मन में 
यौवन की फसलों के
लहलहाते खेत.

अशोक लव 

शनिवार, 5 अप्रैल 2014

समाधान




कुछ शब्द तुम्हारे हैं
कुछ मेरे 
भावनाओं की धूप दिखाकर 
इसे कागज की संदूक में रख देते हैं 
एक दिन हमारे बच्चों के काम आएगी  … 

                             रश्मि प्रभा
 - अपर्णा भागवत का सफ़र, और समाधान मेरी नज़र में -



कुछ ढीले से शब्दों का अनमना लिबास
भटकती सांसें
पथराई आँखें
मुंह में बेवजह रेंग रही मीठे कडवे की सीमा रेखा पर सीली सी कडवाहट।

जाने क्या लेकिन कुछ छूटा सा लगता है।

एक अधूरा सपना
कानों में फुसफुसाए गाने के बोल सा कोई अधूरा अरमान
कहीं राह चलते उठाये रंगीन पत्थर से लिखे कुछ भूले से नाम
सूर्योदय से सूर्यास्त तक चलता सफ़र।

इन्हीं दो किनारों के बीच कहीं अपने ही खोये हिस्से की तलाश में -

एक बार किताबें छोड़
खुदके अन्दर ही तलाशती हूँ मैं वो अथाह गहराई
टटोलती हूँ मकसदों और संभावनाओं का कसैला पानी
शायद मिल जाऊं मैं पूरी की पूरी मेरे ही अक्स के मकसद को।

और पाती हूँ भीतर ही कहीं दबे पड़े हैं जवाब सारे।


दिन से रात, रात से दिन
धरती से नीलाम्बर, और आसमां से वापस
रोज़ अपने ही किनारे से क्षितिज तक का चलना एक तरफ़ा
सफ़र सुहाना है, और  संतुष्ट हूँ मैं।

अपर्णा आर भागवत
http://aparna-insearchofself.blogspot.in/

बुधवार, 2 अप्रैल 2014

कुछ देर तो ठहरो …




कुछ रचनाएँ रोककर
सोचने पर मजबूर करती हैं 
कि शब्द यूँ हीं नहीं रचे गए 
मन की कोठरी में कभी अँधेरा हुआ होगा 
कभी उजाला 
कभी प्यास लगी होगी 
कभी मरीचिका से मुलाकात हुई होगी 
....... 
थोडा ठहरो 
आराम करो 
वृक्ष की पत्तियों पर एक नज़र ही डालो 
और क्षणभर के लिए सोचो 
जलती धूप का सामना करके 
ये तुम्हें छाँव दे रही हैं 
बहुत कुछ ये पत्तियाँ कह जाएँगी 
कुछ देर तो ठहरो  …

                         आज मेरी नज़र में तासीर है कनुप्रिया गुप्ता के ब्लॉग 'परवाज़' का - 

फ़ोन की लम्बी लम्बी  बातें कभी वो सुकून नहीं दे  सकती जो चिट्ठी के चंद शब्द देते हैं .तुम्हे कभी लिखने का शौक नहीं था और पढने का भी नहीं तो मेरी न जाने कितनी चिट्ठियां मन की मन में रह गई न उन्हें कागज़ मिले न स्याही .तुम्हारे छोटे छोटे मेसेज भी मैं कितनी बार पढ़ती थी तुमने सोचा भी न होगा ,ये लिखते  टाइम तुमने ये सोचा होगा ,ये गाना अपने मन में गुनगुनाया होगा शायद  परिचित सी मुस्कराहट तुम्हारे होठों पर होगी जब वो सब यादें आती है तो बड़ा सुकून सा मिलता है ..और एक ही कसक रह जाती है काश तुमने कुछ चिट्ठियां भी लिखी होती मुझे तो ये सूरज जो कभी कभी अकेले डूब जाता है,ये चाँद जो रात में हमें मुस्कुराते न देखकर उदास हो जाता है तुम्हारे पास होने पर भी जब तुम्हारी यादें आ कर मेरे सरहाने बेठ जाती हैं इन सबको आसरा मिल जाता ..ये अकेलापन भी इतना अकेला न महसूस करता ....अब तो सोचती हु तुमने न लिखी तो में कुछ चिट्ठियां लिख लू  पर जिस तरह  तुम खो रहे हो दुनिया की भीड़ में तुम्हारे दिल का सही सही पता भी खोने लगा है  तुम तक पहुँच भी  गई गई तो जानती हु  तुम पढोगे नहीं .....पर फिर भी मेरी विरासत रहेगी किसी प्यार करने वाले के लिए ..

तुम्हे चिट्ठियां लिखने की तमन्ना होती है कई बार
पर तुम्हारे दिल की तरह तुम्हारे घर  का पता भी
पिछली  राहों पर छोड़ दिया कहीं भटकता सा 
अब बस कुछ छोटी छोटी यादों की चिड़िया हैं 
जो अकेले  में कंधे पर आ बैठती  है 
उनके साथ तुम्हारा नाम आ जाता है होठों पर
और कुछ देर उन चिड़ियों के साथ खेलकर 
तुम्हारा नाम भी फुर्र हो जाता है 
अगली बार फिर मिलने का वादा करके......
पर सब जानते है कुछ चिट्ठियां कभी लिखी नहीं जाती
कुछ नाम कभी ढाले नहीं जाते शब्दों में  
कुछ लोग बस याद बनने के लिए ही आते है जिंदगी में 
और कुछ वादें अधूरे ही रहे तो अच्छा है.....


 हमें नहीं चाहिए इतिहास की उन किताबों में नाम
जिनमें त्याग की देवी बनाकर स्त्री-गुण गाए जाए
त्याग हमारा स्त्रिय गुण है जो उभरकर आ ही जाता है 
पर इसे बंधन बनाकर हम पर थोपने का प्रपंच बंद करो......

नहीं चाहिए तुम्हारी झूठी अहमतुष्टि के लिए अपनी आत्मा से प्रतिपल धिक्कार....
तुम अपने आहत अहम के साथ जी सकते हो पर हम बिखरी आत्मा के साथ नही....
तुम अगर नर हो तो हमारे जीवन में नारायण का किरदार निभाना बंद करो....

ये सारे घटनाक्रम जो कल इतिहास में लिखे जाने हैं
लिखे जाएंगे तुन्हारे अनुयायियों द्वारा, तुम्हारे गुणगान के लिए
हमेशा की तरह किसी द्रोपदी को महाभारत का कारण सिद्ध करते हुए...
या किसी सीता पर किए गए अविश्वास को धर्म का चोगा पहनाते हुए...

तुमहारे इतिहास के पदानुक्रम में हमें ऊपर या नीचे
कहीं कोई स्थान नहीं चाहिए
हम अपने हिस्से के पन्ने स्वयं लिख लेंगे .....
हो सकता है उन्हें धर्मग्रंथ का मान न मिले
पर तुम्हारे इतिहास में मानखंड़न से बेहतर है
अपनी क्षणिकाओं में सम्मान के साथ लिखा जाना.....

शनिवार, 29 मार्च 2014

ज्ञातव्य




वन्दना अवस्थी दुबे, जो कहती हैं अपने बारे में 
कुछ खास नहीं....वक्त के साथ चलने की कोशिश कर रही हूं.........वक़्त के साथ चलने का ही एक अनुभव है कहानी - ज्ञातव्य  .... 

"अरे वाह साहब! ऐसा कैसे हो सकता है भला!! इतनी रात तो आपको यहीं हो गई, और अब आप घर जाके खाना क्यों खायेंगे?"
’देखिये शर्मा जी, खाना तो घर में बना ही होगा। फिर वो बरबाद होगा।’
’लेकिन यहां भी तो खाना तैयार ही है। खाना तो अब आप यहीं खायेंगे।’
पापा पुरोहित जी को आग्रह्पूर्वक रोक रहे थे। हद करते हैं पापा! रात के दस बज रहे हैं, और अब यदि पुरोहित जी खाना खायेंगे तो नये सिरे से तैयारी नहीं करनी होगी? और फिर इतनी ठंड!! पता नहीं पापा क्यों मां से बिना पूछे ही क्यों लोगो को आये दिन खाने पर जबरन रोक लेते हैं! ये पुरोहित जी तो आये दिन! कहा नहीं कि जल्दी से खाने पर बैठ जाते हैं! अगर वे ही सख्ती से मना कर दें तो......
’राजू......ओ राजू........’
’ऐ राजू भैया, सो गये क्या?’
’हां’
’अच्छा!! हां कह रहे हो और सो भी गये हो? पापा बुला रहे हैं, सुनाई नहीं दे रहा?’
’तुम सुन रही हो ना! तो बस तुम्हीं चली जाओ। मैं तो तंग आ गया पापा की इन आदतों से।’
सर्दियों में रज़ाई छोडना बडा कठिन काम होता है, शायद इसीलिये राजू भैया बिस्तर में घुसने के बाद अब उठना नहीं चाह रहे थे।
’ राजू..... अन्नू कोई सुन रहे हो.....?’
’ आई पापा........ ।’ आखिरकार उठना मुझे ही पडा था।
’अन्नू बेटा ज़रा जल्दी से पुरोहित अंकल के लिये खाना तो लगा दो।’
इतना गुस्सा आया था पुरोहित जी पर! मना करने के लिये मुंह में ज़ुबान ही नहीं है जैसे! लेकिन कर क्या सकती थी? बस मन में ही भुनभुनाती अंदर चली आई। मां रसोई में सब समेटने के बाद अब पापा के आदेश पर असमंजस में बैठी थी।इन पुरोहित जी के किस्मत तो देखो... केवल एक कटोरी पालक की सब्जी बची है! और कुछ भी नहीं! घर की बात हो तो अलग, अब किसी गैर को केवल पालक रोटी तो नहीं दी जा सकती न!! दही भी खत्म।
’मम्मा...जो है वही दे दो। कुछ बनाना मत।’
’ नहीं बेटा ऐसा खाना दूंगी तो अपनी ही तो नाक कटेगी। चार जगह कहते फिरेंगे......’
’मतलब बनाओगी?? तुम लोगों की इसी मेहमान नवाज़ी से तो......’
पैर पटकती कमरे में आ गई।
’अन्नू, क्या आदेश हुआ पापा का?’
’होगा क्या? वही खाना खिलाओ।’ हमेशा ही ज्यों-ज्यों रात गहराती जाती है, त्यों-त्यों पापा का खाना खिलाने का विचार भी गहराता जाता है। सोचते नहीं कि बच्चों को दिक्कत होगी। अरे तुम्हें क्या हो गया? आंखे फाड-फाड के क्या देख रहे हो?’
’तुम्हारे वश का तो कुछ है नहीं, सिवाय चिडचिडाने के अच्छा हो कि तुम मम्मी की मदद करो।’
’तुम्हारे पापा भी हद करते हैं....’ मम्मी भी कमरे में आ गईं थीं।
’तो क्या हुआ मम्मा... पापा का होटल तो हमेशा ही खुला रहता है, तुम्हारे जैसा बिना मुंह का कुक जो है उनके पास।’ राजू भैया रज़ाई में घुसे-घुसे भाषण दे रहे थे। उनका क्या! ऐसे रज़ाई में घुस कर तो मैं भी बढिया भाषण दे सकती हूं। मेरी जगह रसोई में मम्मी के साथ काम करवायें तो जानूं! देर होती देख पापा भी अंदर आ गये थे-
’क्यों खाना नहीं है क्या?’
’ये अब पूछ रहे हैं आप? मान लीजिये खाना नहीं है, तब? किसी को ज़बर्दस्ती रोकने की क्या ज़रूरत है?’
’तुम लोग तो बस बहस करने लगते हो। मैं उन्हें ज़बर्दस्ती क्यों रोकूंगा भला? मैंने तो बस एक बार कहा था( वाह पापा!! क्या झूठ बोला है!)।
’चलो... अब मैं कुछ बनाती हूं।’ ’अरे तुम कुछ बनाओ मत, जो है सो दे दो’ कह कर पापा फिर चले गये। मम्मी आटा गूंध रहीं थीं, मालूम है, पूडियां बनेंगीं इतनी रात को गरमागरम पूडियां खाने के बाद कोई क्यों ना रुके? ज़रूरत है तो बस रोकने की। एक बार ठंडा खाना परोस तो दें....लेकिन नहीं अपनी नाक बचाये रखने के लिये सब करना होगा। अभी सब्जी भी बनेगी....ये मम्मी-पापा भी ना! दिल खोल कर खर्च करेंगे, और फिर घर के बेहिसाब खर्चों के लिये रोयेंगे भी। जब देखो तब मेहमान-नवाज़ी.... आज वैसे भी महीने की पच्चीस तारीख है। महीने का अंत तो वैसे भी बहुत तंग होता है किसी भी ऐसे व्यक्ति के लिये, जो शुद्ध वेतन में शाही तरीके से रहना चाहता हो। हमारा घर भी उन्हीं में शुमार है।
ठंडे पानी से हाथ धोते ही सारा शरीर कांपने लगा था, मेरे हर एक कंपन में से पुरोहित जी के लिये चुनिंदा गालियां निकल रहीं थीं। आनन-फानन मम्मी ने शानदार डिनर तैयार कर दिया था। खाना खिलाते-खिलाते साढे ग्यारह हो गये थे।
अपनी पोजीशन बनाये रखने के लिये इस तरह खर्चक रना मुझे और राजू भैया दोनों को ही सख्त नापसंद था। खर्च करते समय तो ये दोनों ही बिना सोचे-समझे खर्च करते हैं फिर बजट गडबडा जाने पर एक दूसरे को दोष देते हैं। खैर...... फिर भी घर की गाडी चलती रहती है। लेकिन इधर मैं और भैया दोनों ही पापा के खर्च करने के तरीके से नाखुश थे, लिहाजा पापा ने भैया को घर चलाने की ज़िम्मेदारी सौंप दी है। राजू भैया ने भी चैलेंज किया है कि वे इतने ही पैसों में बेहतर व्यवस्था करेंगे।
बडी ज़िम्मेदारी थी....अब दिन के खाली समय में हम दोनों महीने के हिसाब का ही जोड बिठाते रहते।
’देख अन्नू, ये पापा की तनख्वाह के अट्ठारह हज़ार रुपये हैं.... और ये हैं दूध, बिजली, राशन सब्जी, फल, धोबी, पेपर, बाई, टेलीफोन के बिल.......’
’हूं.....’ मैं पत्रिका से सिर नहीं हटना चाह रही थी....
’ अब हिसाब की शुरुआत कैसे करें?’
’हूं......’
’क्या हूं-हूं लगा रखी है। मैं यहां सिर खपा रहा हूं और तुम..... चलो इधर।’
किसी प्रकार बजट बना। सारे खर्चे निकालने के बाद केवल दो हज़ार रुपये हमारी बचत में थे, जिनसे कोई भी फुटकर खर्च होना था।यानि हम लोगों का जेबखर्च नदारद!! दूसरे खर्चे ज़्यादा ज़रूरी हैं!!
राजू भैया इस लम्बे-चौडे खर्चे को देख कर बडे दुखी थे।
’यार अन्नू ,मुझे तो कुछ रुपये चाहिये ही। एकदम खाली जेब कैसे रह सकता हूं?’
’तो तुम सौ रुपये ले लो। लेकिन तब सौ ही मैं भी लूंगी। मेरे खर्चे नहीं हैं क्या?’
उसी शाम भैया ने अपना फरमान ज़ारी किया था,खर्चों में कटौती बावत। नया बजट!एसा बजट तो वित्त-मंत्रालय भी पेश नहीं करता होगा! कोई उधारी नहीं...सब कैश पर। हर आदेश पर मम्मी-पापा ने सिर हिला के सहमति जताई। सारी कटौतियां शिरोधार्य कीं।
महीना थोडी सी तंगी के साथ गुज़रा था। अब हमारे यहां आये दिन मिठाई-पार्टियां नहीं होती थीं। आने-जाने वालों को चाय-चिप्स में ही प्रसन्न होना पडता था। इससे हमें एक बडा फायदा ये हुआ कि केवल प्लेट से प्रेम रखने वालों का आना-जाना एकदम कम हो गया। पापा भी अब ज़रूरी होने पर ही लोगों को खाने पर रोकते थे, वो भी हमलोगों को बताकर। लेकिन खर्च हमारे पास आ जाने के कारण हम लोगों की हालत खस्ता हो गई थी। कारण? अब हम किसी भी चीज़ की ज़िद कर ही नहीं सकते थे!! पूरा खर्च हमारे पास था। यदि कहते भी तो पापा बडे आराम से कह देते पैसे तो तुम्हारे पास ही हैं, जो चाहो ले लो। लेकिन बजट था कि कुछ अतिरिक्त खर्च की अनुमति ही नहीं देता था। इसी बीच राजू भैया का एम।ई। के लिये सेलेक्शन हो गया। बहुत खुश थे भैया। दो साल बाद शानदार नौकरी..... पापा-मम्मी ने उनसे नये कपडे बनवा लेने को कहा था। चलो इसी बहाने मेरा भी एक सूट तो बन ही जायेगा...
राजू भैया अपना सामान लगा रहे थे, और मैं सोच रही थी कि कल उन्हें जाना है और अभी तक वे नये कपडे तो लाये ही नहीं। तभी उन्होंने मदद के लिये मुझे बुलाया- दौड के पहुंची, देख कर दंग रह गई कि कहीं भी जाने से पहले हमेशा नये कपडे खरीदने वाले राजू भैया, आज सारे पुराने कपडे खुद से प्रेस करके लगा रहे हैं।
’भैया नये कपडे क्यों नहीं लाये?’
नहीं यार! अभी ज़रूरत ही नहीं थी। ’
क्या कह रहे हो भैया? तुम और ये पुराने कपडे???
’ अन्नू, हम लोग कर्ज़ से लदे रहने के लिये हमेशा मम्मी-पापा को दोष देते थे, अपने आपको, अपनी आदतों को देखते तक नहीं थे। अपनी इस तनख्वाह में पापा घर चलाते या हमारी बडी-बडी फ़रमाइशे पूरी करते! उधार कपडे और अन्य सामान शायद वे इसीलिये लेते थे ताकि हमारी ज़रूरतें पूरी होती रहें। हमलोगों को अपनी चादर की लम्बाई तो अब मालूम हुई है,जब्कि खुद ओढ कर देखी। और पहली बार मैने जाना कि राजू भैया इतने गंभीर भी हो सकते हैं। शायद बडे हो गये हैं।

वंदना अवस्थी दुबे 
http://wwwvandanaadubey.blogspot.in/

मंगलवार, 25 मार्च 2014

आखिरकार



अपर्णा अनेकवर्णा की रचना आखिरकार 
कई मन की दीवारों पर 
बारिश की नमी से उभरे होते हैं 
एक नई भोर की तलाश में 
जिसमें हो हौसलों की गर्मी 
और उम्मीदों से भरी एक राह 
…………… अपनी नज़र से पढ़के देखिये, सच है न ? 

                   रश्मि प्रभा 


आखिरकार,
चाम-गाथा को सामने आना ही पड़ा
बस मुझे एक क़दम ही तो भरना था
खुद से ही बाहर निकल आना था..
ठीक जैसे ८० के दशक के सिनेमा में..
खुद का ही होता था आमना-सामना

* मैंने तुम में एक
रजोनिवृति के समीपाई..
खिचड़ी बालों से ढकी कनपटी वाली
स्थूल.. भिन्नाई... ४०-साला औरत दिखी..
अनमनी सी.. अपने आस-पास से गुज़रती
दुनिया को देखती रहती है..
अपनी सारी ऊर्जा बटोरती है...
कि झेल जाए एक और किशोर हंगामा..
जिसका साथी हमेशा दूर.. काम में मशगूल..
मुझ पर ऊपर से नीचे अपनी उदास दृष्टि फेरती है..

** मुझे दिखती है एक ४०-साला औरत..
अपनी स्थूलता में भी गर्वीली खड़ी
खिचड़ी बालों से ढकी कनपटी.. रजोनिवृत्ति के समीपाई
अपनी दैहिकता को भरपूर जीती हुयी
सहज.. पूरी तरह से झेंप से परे..
हाथ बढ़ाती है जीवन की तीव्र ऊर्जावान धारा की ओर..
और चुन लेती है उसमें से..
जो चाहिए उसे.. बस उतना ही..
बग़ावत पर आमदा किशोर उसका
बन भीरु लौट आता है..
साथी सदा आस-पास ही मिलता है
पूरा साथ निभाता है...

*** हम दोनों..
अलग खड़ी फिर भी जुडी हैं
उदास मुरझायी सी मोटी औरत
अपनी नाकामियों से भारी सांस ले रही है..
और वो दूजी.. आत्मविश्वास से सजी
अपनी ज़रूरतों के प्रति सजग..
हम दोनों आगे बढ़ती हैं..
हो जाती हैं आलिंगनबद्ध
उस विच्छेद के बाद का ये मिलना
अपने आप में सम्पूर्ण है..

खुद को आईने में निहारती हूँ
तो पाती हूँ.. कनपटी अब भी सफ़ेद है
पर बंधे हैं केश एक सुरुचिपूर्ण विन्यास में..
वेशभूषा एक खुशनुमा पोशाक की है...
ये बदलाव बस ऊपरी नहीं है वरन
ये भीतर से ही उभर रहा है
कभी क़दमों में उत्साह बन के
कभी आँखों में ख़ुशी बन के..
अब झुर्रियां भी किसे गिनना है यहाँ भला..
देखिये मैं अब कितनी ही शांत हूँ..
एक साथ मिलकर हमने
एक नयी 'मैं' रच डाली है....    

शनिवार, 22 मार्च 2014

माया मृग



समय बलवान होता है 
बेटा बड़ा हो जाता है 
दुनियादारी का बादशाह 
और पिता 
जो उसके ऊँचे कद की दुआ माँगता है 
उसकी माँ के साथ 
वह माँ को देखता है 
माँ इशारे से चुप होने को कहती है 
बढ़ता जाता है सन्नाटा 
बेटे को फुर्सत कहाँ जो वक़्त दे 
बात करे  !!!
बेटा जब एक सी बंदूक हर बार माँगता था 
पिता  .... खरीद लाते थे 
पिता चश्मे के बगैर जब चश्मा माँगते हैं 
बेटा नहीं  सुनता - वक़्त जो नहीं होता 
                                            … जीवन के एक सच के साथ माया मृग 


बड़ा होता बेटा
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बड़ा हो रहा है बेटा
छोटे होते जा रहे हैं उसके संवाद पिता से......

बेटा जानता है पिता अंतिम व्‍यक्ति नहीं हैं
जिन्‍हें पता है दुनिया के सारे सच....

वह जानता है, 
पिता ने बहुत छोटे दायरों में गंवा दी उम्र
जबकि जिया जा सकता था
बड़े बड़े तरीकों से....

बेटे के तरीके नापसंद करने जितनी छूट नहीं
पिता को
पिता के तरीके पसंद किया जाना जरुरी नहीं
बेटे को....

स्‍वतंत्रता के लिए लड़ा नहीं जो कभी
जानता है स्‍वतंत्रता से जीना अपने में
नहीं जानता वे गुलाम दिन
जिनमें पिता ने काता एक एक सूत
इस दिन को बुनने के लिए.....

देह से लेकर जीवन तक बुनने वाली मां
हर पल खड़ी होती है
बेटे के बराबर जाकर
देखती है उसके कन्‍धे से निकलता निकलता
सिर से ऊपर निकल गया बेटा.....

बेटा जानता है बड़े रास्‍ते, बड़ी गलियां
बड़ी दुकानें और बड़े लोगों को
छोटी छोटी बातें अक्‍सर छूट जाती हैं
कि जैसे घर से निकलते हुए मां को प्‍यार करना.....

बड़ा हो रहा है बेटा
छोटी छोटी शिकायतें क्‍या करना उससे
पिता समझाते हैं मां को
मां समझाती है पिता को.....

रविवार, 16 मार्च 2014

दर्पण साह



एक संदूक - बेनाम हो
या रख दो कोई नाम
उस नाम से परे -
वह यादों को संजोता है !
बंद वह दिखाई देता है
एक कोने में ठिठका सा लगता है
पर उसकी यात्रा वर्त्तमान सी होती है !
एक नहीं अनगिनत एहसास
लेते हैं ज़िन्दगी से भरपूर साँसें
भरते हैं कभी सिसकियाँ
और कभी बेसाख्ता खिलखिलाहटें
जीने के क्रम में
कितने नाम लिखे होते हैं उसके भीतर
स्वतः या  ……… जानते हुए
……
माँ जो ज़िन्दगी उपहार में देती है
उसके कई अक्स संदूक में सहेजकर रखे होते हैं !

                       ……… खोलते हैं एक संदूक बेपरवाह लगते दर्पण साह की, जिनकी परवाह संदूक में पडी है - कई एहसासों के साथ -

संदूक


आज...
फ़िर,
....
....
उस,
कोने में पड़े,
धूल लगे 'संदूक' को,
हाथों से झाड़ा...


धूल...
...आंखों में चुभ गई .

संदूक का,
कोई 'नाम' नहीं होता.

पर,
इस संदूक में,
एक खुरचा सा 'नाम' था .
....
....
सफ़ेद पेंट से लिखा .

तुम्हारा था?
या मेरा?
पढ़ा नही जाता है अब .

खोल के देखा उसे,
ऊपर से ही,
बेतरतीब पड़ी थी...
'ज़िन्दगी'।

मुझे याद है,
माँ ने,
जन्म दिन में,
'उपहार' में दी थी।

पहली बार देखी थी,
तो लगता था,
कितनी छोटी है !

पर,
आज भी ,
जब पहन के देखता हूँ,
बड़ी ही लगती है,

शायद...
...कभी फिट आ जाए।

नीचे उसके,
तह करके,
सलीके से,
रखा हुआ है...
...'बचपन' ।

उसकी जेबों में देखा,
अब भी,
तितलियों के पंख,
कागज़ के रंग,
कुछ कंचे ,
उलझा हुआ मंझा,
और...
....
....
और न जाने क्या क्या ?

कपड़े,
छोटे होते थे बचपन में,
....
....
....जेब बड़ी.

कितने ज़तन से,
...मेरे पिताजी ने,
मुझे,
ये
'इमानदारी',
सी के दी थी ।
बिल्कुल मेरे नाप की ।
बड़े लंबे समय तक पहनी।
और,
कई बार,
लगाये इसमे पायबंद ,
कभी 'मुफलिसी' के,
और कभी,
'बेचारगी' के .

पर,
इसकी सिलाई,
....
....
उधड गई थी, एक दिन.
...जब,
'भूख' का खूंटा लगा इसमे.

उसको हटाया,
तो नीचे...
पड़ी हुई थी,
'जवानी'.

उसका रंग उड़ गया था,
समय के साथ साथ।
'गुलाबी' हुआ करती थी ये .

अब पता नहीं ,
कौनसा,
नया रंग हो गया है?

बगल में ही,
पड़ी हुई थी,
'आवारगी'.

....उसमें से,
अब भी,
'शराब' की बू आती है।

४-५,
सफ़ेद,
गोल,
'खुशियों' की 'गोलियाँ',
डाली तो थीं,
संदूक में.

पर वो खुशियाँ...
....
....
.... उड़ गई शायद।

याद है...
जब तुम्हारे साथ,
मेले में गया था ?

एक जोड़ी,
'वफाएं' खरीद ली थी।
तुम्हारे ऊपर तो पता नहीं,
पर,
मुझपे...
.....
.....
ये अच्छी नही लगती।

और फ़िर...
इनका 'फैशन' भी,
...नहीं रहा अब .

...और ये,
शायद...
'मुस्कान' है।

तुम,
कहती थी न...
जब मैं इसे पहनता हूँ,
तो अच्छा लगता हूँ।
इसमें भी,
दाग लग गए थे,
दूसरे कपडों के।
हाँ...
....
....
इसको.....
'जमाने'
और
'जिम्मेदारियों'
के बीच रख दिया था ना ।

तब से पेहेनना छोड़ दी।

अरे...
ये रहा 'तुम्हारा प्यार'।
'वेल्लेनटें डे ' में,
दिया था तुमने।

दो ही महीने चला था,
हर धुलाई में,
सिकुड़ जाता था।
भाभी ने बताया भी था,
"इसके लिए,
खारा पानी ख़राब होता है."

पर आखें,
आँखें  ये न जानती थी।

चलो,
बंद कर देता हूँ,
सोच के...
जैसे ही संदूक रखा,
देखा,
'यादें' तो बाहर ही छूट गई,
बिल्कुल साफ़,
नाप भी बिल्कुल सही.

लगता था,
जैसे,
आज के लिए ही खरीदी थी,
उस 'वक्त' के बजाज से
कुछ लम्हों की कौडियाँ देकर .

चलो,
आज...
फ़िर,
....
....
इसे ही,
पहन लेता हूँ .