बुधवार, 19 जून 2013

मेरी नज़र से कुछ मील के पत्थर - 2 )



शब्दों को ओस में भिगोकर ईश्वर ने सबकी हथेलियों में रखे .... कुछ बर्फ हो गए,कुछ नदी बन जीवन के प्रश्नों की प्यास बुझाने लगे .................. शब्दों की कुछ नदियाँ, कुछ सागर मेरी नज़र से = 


“हे भगवान! इस चप्पल को इसी समय टूटना था! अभी कितने काम पड़े हैं और आस-पास कोई मोची भी नहीं.”
”मैं हूँ ना! बोलो क्या करना है, चप्पल मरम्मत करवा दूँ या नई दिलवा दूँ?”
”तुम तो ऐसे कह रहे हो जैसे अलादीन का जिन्न तुम्हारा हुक्म बजा लाने को तैयार हो!”
”बन्दा किसी जिन्न से कम है क्या! वो देखो सामने चप्पलों की दुकान है. चलकर नयी ले लेते हैं ना!”
”सुनील! प्लीज़ तुम तो रहने ही दो, मैं ले लूंगी.”
कहती हुई अंजना बाटा की दुकान में दाखिल हो गयी और अपने लिये चप्पल पसन्द करने लगी. एक चप्पल उसे पसन्द आई, थोड़ी ऊँची हील की अच्छी चप्पल थी. उसने चप्पल पैरों में डाली और सामने लगे आईने में देखने लगी. पैरों से नज़र हटी भी नहीं थी कि उसने देखा, आईने में सुनील नाक सिकोड़े उसके पीछे ही खड़ा था.
“तुम यहाँ भी चले आए, मेरे पीछे-पीछे. मुझे पता था कि तुम्हें ये हील पसन्द नहीं आयेगी.”
”.....”
”ओफ्फोह बाबा! अब ये अपनी नाक सिकोड़ना बन्द करो. मैं वो वाली ले लेती हूँ... और सुनो, अभी मेरे पास पैसे हैं, इसलिये तुम्हें पेमेण्ट करने की ज़रूरत नहीं.”
अंजना ने टूटी चप्पल डिब्बे में बन्द करवाई और नई चप्पल पहनकर दुकान से बाहर निकल गई.

सुनील के पागलपन की ये इन्तिहाँ थी कि वो साये की तरह अंजना के साथ लगा रहता था. अब चाहे खुशी चाहे ग़म, हमेशा उसके साथ. अंजना भी याद करती थी वे दिन, जब सुनील की पोस्टिंग कोलकाता में थी. उसके बग़ैर लगता था कि वो एक कदम नहीं बढा सकती. ख़ुद को कितना बेसहारा महसूस करती थी. इतनी बड़ी दुनिया में ऐसा लगता था कि जैसे वो खो जायेगी. तब तो कई मौकों पर वो महसूस करती कि काश अभी सुनील यहाँ होता तो मेरा ये काम कितनी आसानी से हो गया होता.

और उसके उलट आज तो ये हाल है कि वो साये की तरह अंजना के पीछे रहता है. न नौकरी है उसके पास, न कोई काम. बस सारे दिन अंजना के साथ लगा रहता है. अभी उसी रोज़ की तो बात है. डॉक्टर ने मना किया था अंजना को ठण्डी चीज़ें खाने से. फिर भी बाज़ार में उसने आइसक्रीम ख़रीदी और बस एक स्कूप मुँह में डाला ही था कि न जाने कहाँ से सुनील उसके सामने आकर खड़ा हो गया और लगभग चीख़ते हुये बोला, “पकड़ लिया! अभी टौंसिल का दर्द गया नहीं और तुमने आइसक्रीम खाना शुरू कर दिया! तुमने क्या सोचा था कि मुझे पता नहीं चलेगा!”

सुनील ने यह बात इतनी ज़ोर से और अचानक कही कि अंजना के हाथ से आइसक्रीम का प्याला गिरते-गिरते बचा. उसने गुस्से और खीझ से भरकर जवाब दिया, “मेरा दर्द ख़तम हो गया है तभी तो खा रही हूँ और डॉक्टर के कहने से क्या होता है. दो चम्मच आइसक्रीम खाने से मैं मर नहीं जाउंगी!”
”ठीक है! मैं बेकार ही तुम्हारे और आइसक्रीम के बीच आया. खा लो. कहो तो एक बड़ा सा बटर-स्कॉच और मंगवा दूँ. तुम्हारा फेवरिट फ्लेवर!!”
”अब ताने मत मारो. लो मैं नहीं खाती.”

और जब तक सुनील कुछ जवाब देता, उसने पूरा कप गार्बेज-बिन में डाल दिया. आस-पास खड़े लोग अजीब सी नज़रों से उसे देख रहे थे, मगर तब तक वो दुकान से निकल गयी.
घर लौटते समय, उसने बिजली की दुकान से बल्ब खरीदा.
“ये बल्ब क्यों ख़रीद रही हो तुम?”
”आज रात आलू-बल्ब की सब्जी बनाऊँगी.... बालकनी का बल्ब फ्यूज़ हो रखा है चार दिन से. स्ट्रीट लाइट की रोशनी से कब तक काम चलाऊँ. वहाँ बैठकर पढाई भी नहीं कर पाती.”
“अरे हाँ! मैं भी जब तुम्हें दूर से देखने की कोशिश करता हूँ तो तुम्हारा चेहरा साफ़ नज़र नहीं आता. सी.एफ.एल. ले लो ना, बिजली भी बचाए और चेहरा साफ़ नज़र आये!”
“अगली बार!”

अंजना घर के दरवाज़े तक पहुँच गयी. उसने कंधे की ओट से सुनील को देखा और ‘बाय’ कहकर अंदर चली गयी. उसे लगा सुनील उसे देख रहा होगा छिपकर, इसलिए सबसे पहले वह बालकनी में बल्ब लगाने लगी. ऊंचे वाले स्टूल को उसने होल्डर के नीचे फर्श पर रखा और संभलकर स्टूल पर चढ़ गयी. पंजे उचकाकर जैसे ही वो बल्ब होल्डर में लगाने लगी कि उसका बैलेंस बिगड गया, उसकी साँस रुक गयी और धडाम से ज़मीन पर गिरने ही वाली थी कि सुनील की बाहों ने उसे थाम लिया.

“तुम्हें क्या लगा था कि मैं दरवाज़े से लौट गया. मैं तुम्हारे पीछे-पीछे दबे पाँव अंदर आ गया था, मुझे पता था कि तुम फिसलने वाली हो. और मैं तुम्हें कैसे गिरने देता!”
“ओह सुनील! तुम्हें गुज़रे, कितने साल हो गए. अब तो मैंने हिसाब रखना भी बंद कर दिया. तुम्हारे दोनों बच्चों को बड़ा करना, उन्हें पढ़ा लिखाकर उनके पैरों पर खडा होने के काबिल बनाना, उनकी शादी, उनका घर बसाना... और अब अकेले कितने काम करने पड़ते हैं मुझे.”
“मैं जानता हूँ, देखता जो रहता हूँ तुम्हें. तुम्हारे साथ-साथ, तुम्हारे पीछे-पीछे!”
“लोग कहते हैं कि अंजना इतनी हिम्मत कैसे जुटा लेती है तू. अकेली औरत और इतनी बड़ी दुनिया... तुम्हें पता है, कहाँ से जुटाती हूँ मैं ये हौसला और हिम्मत?”
“कहाँ से!”
“तुमसे... जब तुम कोलकाता में थे, तब मुझे लगता था कि मैं अकेली हूँ, तुम नहीं मेरे साथ. लेकिन अब तो लगता है कि मैं एक मिनट को भी अकेली नहीं.”
“कभी डर नहीं लगता तुम्हें!”
नहीं. डर लगते ही कानों में तुम्हारी आवाज़ गूंजने लगती है. मैं हूँ ना!”

सलिल वर्मा 

चला बिहारी ब्लॉगर बनने





बनूं तो क्या बनूं और आखिर क्यों बनूं?
बना इंसान तो नाहक मैं मारा जाऊंगा।

बना राम तो बनवास चला जाऊंगा
लक्ष्मण बन गया तो शक्ति सह पाऊंगा?
सीता बनी तो अग्नि परीक्षा होगी।
कैकेयी बनी तो भरत विमुख हो जायेगा
बना दशरथ तो पुत्र शोक सहना होगा।
उर्मिला बनी तो राह ताकनी होगी
रावण बना तो दसशीश बन पाऊंगा?

बनूं तो क्या बनूं और आखिर क्यों बनूं?
बना इंसान तो नाहक मैं मारा जाऊंगा।

कृष्‍ण बना तो महाभारत रचना होगा।
धृतराष्‍ट्र बना तो अंधा हो जाऊंगा।
गांधारी बनी तो पट्टियां बांधनी होंगी
कुन्ती बनी तो करन पाना होगा।
करण बना तो सारथी सूत कहलाऊंगा
भीष्‍म बना तो शर सेज ही पाऊंगा
बना अर्जुन तो स्वजन हत पाऊंगा?

बनूं तो क्या बनूं और आखिर क्यों बनूं?
बना इंसान तो नाहक मैं मारा जाऊंगा।


बना बुद्ध तो यातना सह पाऊंगा?
यशोधरा बनी तो राहुल पालना होगा।
लक्ष्मी बनी तो तलवार उठानी होगी।
आजाद बना तो खुद को मारना होगा।
बना भगत जो फांसी चढ़ पाऊंगा?
और जो बना गांधी गोली झेल पाऊंगा?

बनूं तो क्या बनूं और आखिर क्यों बनूं?
बना इंसान तो नाहक मैं मारा जाऊंगा।

रमाकांत सिंह 

ज़रूरत





मै क्या हू .....?
मै क्या सोचती हू ?
मै क्या चाहती हू ?
खुद नहीं जानती ........
क्या पाना ,क्या खोना
मेरे लिए सब एक सा है ..
क्यूकि इस दिल से उम्मीद ....
शब्द ही मिट चुका है|
कभी सोचू.........ऐसा करू ,
कभी सोचू ...मै वैसा करू
ऐसे और वैसे के चक्रव्हिहू में ,
कभी कुछ नहीं किया |
कभी सोचू अपने लिए
थोडा सा तो जी लू
फिर सोचा .....वो क्या कहेगा
ये क्या कहेगा . ..सब क्या कहेगे
इसी सोच में , अपने लिए जीना ही छोड़ दिया |
कभी देश की हालत पे गंभीर हो लेती हू ,
पर दूसरे ही पल ...सब लोगो संग हस देती हू
ये सोच की ...सिर्फ मेरे सोचने भर से क्या होगा ,
मै क्या बोलू और क्या ना बोलू ..
कभी सोचा ही नहीं .....
मै क्या हू .....?

अंजू चौधरी 

अपनों का साथ



मेरी यात्रा जारी है .... अगले मोड़ पर और हैं नायाब पत्थर तराशे हुए = इंतज़ार कीजिये 

रविवार, 16 जून 2013

मेरी नज़र से कुछ मील के पत्थर - 1 )



शब्दों को ओस में भिगोकर ईश्वर ने सबकी हथेलियों में रखे .... कुछ बर्फ हो गए,कुछ नदी बन जीवन के प्रश्नों की प्यास बुझाने लगे .................. शब्दों की कुछ नदियाँ, कुछ सागर मेरी नज़र से = 


कुछ मेरी कलम से kuch meri kalam se **: वर्जित यादें



कुछ लफ्ज़ ज़िन्दगी के
सिर्फ खुद से ही पढ़े जाते हैं
वही लफ्ज़ जो दिल की गहराइयों में
दबे गए कभी सोच कर 
कभी भूल से 
जैसे ...........
कुछ भूली हुई सभ्यताएं
जो  नजर आती है 
सिर्फ जमीनों के खोदने से
ठीक वैसे ही
"कुछ यादें  "जो दबी हैं
ज़िन्दगी के उन पन्नो में
जो वर्जित है सच जानने से पहले
दुनिया की नजरों में आना
और वो पन्ने पढ़े हैं सिर्फ उन्ही ने
जो जानते हैं  कि
" कहाँ क्या दफ़न हुआ था ?"

रंजू भाटिया 

कुछ मेरी कलम से 




एक अंगारा उठाया था कर्तव्यों का
जलती हुई जिन्दगी की आग से,
हथेली में रख फोड़ा उसे
फिर बिखेर दिया जमीन पर...
अपनी ही राह में, जिस पर चलना था मुझे
टुकड़े टुकड़े दहकती साँसों के साथ और
जल उठी पूरी धरा इन पैरों के तले...
चलता रहा मैं जुनूनी आवाज़ लगाता
या हुसैन या अली की!!!
ज्यूँ कि उठाया हो ताजिया मर्यादाओं का
पीटता मैं अपनी छाती मगर
तलवे अहसासते उस जलन में गुदगुदी
तेरी नियामतों की,
आँख मुस्कराने के लिए बहा देती
दो बूँद आँसूं..
ले लो तुम उन्हें
चरणामृत समझ
अँजुरी में अपनी
और उतार लो कंठ से
कह उठूँ मैं तुम्हें
हे नीलकंठ मेरे!!
-सोच है इस बार
कि अब ये प्रीत अमर हो जाये मेरी!!

-समीर लाल ’समीर’



ज़ख़्मी जुबान  
मिटटी में नाम लिखती है 
कोई जंजीरों की कड़ियाँ तोड़ता  है
दर्द की नज़्म लौट आती है समंदर से
दरख्त फूल छिड़क कर 
मुहब्बत का ऐलान करते हैं 
मैं रेत से एक बुत तैयार करती  हूँ 
और हवाओं से कुछ सुर्ख रंग चुराकर
रख देती हूँ उसकी हथेली पे 
मुझे उम्मीद है 
इस बार उसकी आँखों  से 
आंसू जरुर बहेंगे ....!!

हरकीरत हीर .

हरकीरत ' हीर'

.



सुनो 
मत खाना तरस मुझ पर 
नहीं करना मेरे हक़ की बात 
न चाहिए कोई आरक्षण 
नहीं चाहिए कोई सीट बस ,ट्रेन या सफ़र में 
मैंने तुमसे कब ये सब माँगा ?
जानते हो क्यों नहीं माँगा 
क्योंकि 
तुम कभी नहीं कर सकते मेरी बराबरी 
तुम कभी नहीं पहुँच सकते मेरी ऊँचाईयों पर 
तुम कभी नहीं छू सकते शिखर हिमालय का 
तो कैसे कहते हो 
औरत मांगती है अपना हिस्सा बराबरी का 
अरे रे रे ..............
फ़िलहाल तो 
तुम डरते हो अन्दर से 
ये जानती हूँ मैं 
इसलिए आरक्षण , कोटे की लोलीपोप देकर 
अपने कर्त्तव्य की इतिश्री करते हो 
जबकि मैं जानती हूँ 
तुम मेरे बराबर हो ही नहीं सकते 
क्योंकि 
हूँ मैं ओत-प्रोत मातृत्व की महक से 
जनती हूँ जीवन को ......जननी हूँ मैं 
और जानते हो 
सिर्फ जनते समय की पीड़ा का 
क्षणांश भी तुम सह नहीं सकते 
जबकि जनने से पहले 
नौ महीने किसी तपते रेगिस्तान में 
नंगे पाँव चलती मैं स्त्री 
कभी दिखती हूँ तुम्हें थकान भरी 
ओज होता है तब भी मेरे मुख पर 
और सुनो ये ओज न केवल उस गर्भिणी 
गृहणी के बल्कि नौकरीपेशा के भी 
कामवाली बाई के भी 
वो सड़क पर कड़ी धूप  में 
वाहनों को दिशा देती स्त्री में भी 
वो सड़क पर पत्थर तोडती 
एक बच्चे को गोद में समेटती 
और दूजे को कोख में समेटती स्त्री में भी होता है 
और सुनना ज़रा 
उस आसमान में उड़ने वाली 
सबकी आवभगत करने वाली में भी होता है 
अच्छा न केवल इतने पर ही 
उसके इम्तहान ख़त्म नहीं होते 
इसके साथ निभाती है वो 
घर परिवार और बच्चों की जिम्मेदारी भी 
पूरी निष्ठां और ईमानदारी से 
जरूरी तो नहीं न 
हर किसी को उपलब्ध हों वो सहूलियतें 
जो एक संपन्न घर में रहने वाली को होती हैं 
कितनी तो रोज बस ट्रेन की धक्कामुक्की में  सफ़र कर 
अपने गंतव्य पर पहुँचती हैं 
कोई सब्जी बेचती है तो कोई होटल में 
काम करती है तो कोई 
दफ्तर में तो कोई कारपोरेट ऑफिस में 
जहाँ उसे हर वक्त मुस्तैद भी रहना पड़ता है 
और फिर वहां से निकलते ही 
घर परिवार की जिम्मेदारियों में 
उलझना होता है 
जहाँ कोई अपने बुजुर्गों की सेवा में संलग्न होती है 
तो कोई अपने निखट्टू पति की शराब का 
प्रबंध कर रही होती है 
तो कोई अपने बच्चों के अगले दिन की 
तैयारियों में उलझी होती है 
और इस तरह अपने नौ महीने का 
सफ़र पूरा करती है 
माँ बनना आसान नहीं होता 
माँ बनने के बाद संपूर्ण नारी बनना आसान नहीं होता 
तो सोचना ज़रा 
कैसे कर सकते हो तुम मेरी बराबरी 
कैसे दे सकते हो तुम मुझे आरक्षण 
कैसे दे सकते हो कोटे में कुछ सीटें 
और कर सकते हो इतिश्री अपने कर्त्तव्य की 
जबकि तुम्हारा मेरा तो कोई मेल हो ही नहीं सकता 
मैंने तुमसे कभी ये सब नहीं चाहा 
चाहा तो बस इतना 
मुझे भी समझा जाए इंसान 
मुझे भी जीने दिया जाए 
अपनी इच्छाओं आकांक्षाओं के साथ 
बराबरी करनी हो तो 
आना मेरी ऊँचाई तक 
मेरी जीवटता तक 
मेरी कर्मठता तक 
मेरी धारण करने की क्षमता तक 
जब कर सको इतना 
तब कहना बराबर का दर्जा है हमारा 
जानना हो तो इतना जान लो 
स्त्री हूँ .........कठपुतली नहीं 
जो तुम्हारे इशारों पर नाचती जाऊं 
और तुम्हारी दी हुयी भीख को स्वीकारती जाऊं 
आप्लावित हूँ अपने ओज से , दर्प से 
इसलिए नही स्वीकारती दी हुयी भीख अब कटोरे में 
जीती हूँ अब सिर्फ अपनी शर्तों पर
और उजागर कर देती हूँ स्त्री के सब रहस्य बेबाकी से 
फिर चाहे वो समाजिक हों या शारीरिक संरचना के 
तोड देती हूँ सारे बंधन तुम्हारी बाँधी
वर्जनाओं के , सीमाओं के 
और कर देती हूँ तुम्हें बेनकाब
इसलिय नवाजी जाती हूँ "बेबाक महिला " के खिताब से 
और यदि इसे तुम मेरी बेबाकी समझते हो तो 
गर्व है मुझे अपनी बेबाकी पर 
क्योंकि 
ये क्षमता सिर्फ मुझमे ही है 
जो कर्तव्यपथ पर चलते हुए 
दसों दिशाओं को अपने ओज से नहला सके 
और अपना अस्तित्व रुपी कँवल भी खिला सके 

वंदना गुप्ता 

ज़ख्म…जो फूलों ने दिये



रास्ते लम्बे हैं ... कई शहर,कई गाँव .............. अभी तो कई मील के पत्थर हैं - धीरे धीरे मिलते हैं,बस साथ रहिये 

बृहस्पतिवार, 13 जून 2013

कौन बोलेगा गुमनामी की सूनामी में !!!





ज़िन्दगी आधुनिक हो गई है, पर फिर भी वही सिसकियाँ हवाओं में है . अजीबोगरीब माहौल,संगीत,परिधान,बोली ...... घर घर लगता ही नहीं, एक रुआब सा निकलता है गाड़ी में,देखता है बालकनी से . चेहरे अपने,पर अजनबी ....... हम तरक्की कर रहे हैं या खंडहर बनाते जा रहे हैं प्रकृति के कण-कण को ?
प्रश्न हाहाकार कर रहा है,  - कौन बोलेगा गुमनामी की सूनामी में !!!



                       
              

परिचय लिखने का शौक तो बचपन से था, ब्लॉग ने मेरी भावनाओं को आप तक पहुचाने की राह आसान कर दी. काफी भावुक और संवेदनशील हूँ. कभी अपने भीतर तो कभी अपने आस-पास जो घटित होते देखती हूँ, तो मन कुछ कहता है, बस उसे ही एक रचना का रूप दे देती हूँ. आपके आशीर्वाद और सराहना की आस रखती हूँ...

मिथ्या दंभ में चूर
स्वयं को श्रेष्ठ घोषित कर
कोई श्रेष्ठ नहीं हो जाता
निर्लज्जता का प्रदर्शन
निशानी है बुद्धुत्व की
सूर्य को क्या जरुरत
दीपक के प्रकाश की
वह तो स्वयं प्रकाशित है
फ़िर, प्रतिस्पर्धा कैसी?
है हिम्मत ....?
तो बन जाओ उसकी तरह
छूकर दिखाओ ऊँचाइयों को
जगमगाओ उसकी तरह
जिस दिन ऐसा होगा
स्वयं झुक जाओगे
फलाच्छादित वृक्ष जैसे
चमकोगे आकाश में
तारों बीच चाँद की तरह
कीर्ति जगमगाएगी
"युगे युगे" दसों दिशाओं में 
यही है मृत्यु लोक में
वैतरणी से तरने का मार्ग....


संजय कुमार चौरसिया

परिचय - बचपन से लेकर आज तक जीवन के हर पहलु को बहुत ही करीब से देखा है मैंने ! " जीवन की आपाधापी " में ही ये वक़्त गुजर जाता है ! मेरे एक अजीज हैं , जिन्होंने मुझे लिखने के लिए प्रेरित किया ! मैं शिवपुरी मध्य-प्रदेश का रहने वाला हूँ ! पिछले 16 वर्षों से शेयर मार्केट में कार्यरत हूँ ! 3 साल से लिखने की और सीखने की कोशिश कर रहा हूँ ! मार्ग-दर्शन होंसला बढ़ाता है ! मोबाईल no. 09993228299 मेरा इ-मेल पता है ! sanjaystock07@gmail.com


अभी पिछले दो हफ्ते पहले की बात है , हमारे शहर ग्वालियर में एक नौंवी कक्षा की होनहार स्कूल छात्रा ने अपने ही पिता की बन्दूक से अपने आप को गोली मारकर आत्महत्या कर ली , इस दिल दहला देने वाली घटना को जिसने सुना दंग रह गया , आखिर क्यों उसने ऐसा किया ?  जब कारण मालूम चला तो लोगों के होश उड़ गए .. कारण था उस छात्रा का परीक्षा में गणित का पेपर बिगड़ना .. क्या इतनी छोटी सी बात पर आत्महत्या कर लेना सही था ...?  मैं तो कहता हूँ कि , किसी भी बात पर आत्महत्या कर लेना सबसे बड़ी बुजदिली की निशानी है ! आत्महत्या किसी भी समस्या का समाधान नहीं है अपितु इससे अनेकों प्रश्न हमारे सामने उत्पन्न होते हैं ! फिर भी इस तरह के मामले हम हर साल सुनते और देखते हैं ! इस तरह के अनेकों मामले हमारे सामने कई बार आये हैं ! जब किसी छात्र -छात्रा ने परीक्षा में फ़ैल होने पर अपने गले में फाँसी का फंदा डालकर अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली ?  जरा जरा सी बात पर बच्चों का इतनी जल्दी आप खो देना अपनी जान लेने की कोशिश करना .? आखिर क्यों .? क्या गुजरती होगी ऐसे माता - पिता के दिल पर जब वो अपने ही बच्चों की लाश अपने कन्धों पर ढोते होंगे , जिन कन्धों पर बैठाकर उनको उज्जवल भविष्य के सपने दिखाए ? क्या इसी दिन के लिए माता-पिता अपना पेट काटकर अपने बच्चों के सुनहरे भविष्य का सपना देखते हैं ! अब इस तरह के मामलों में हम किसको दोष दें  ?  कौन है इसके लिए जिम्मेदार ? शायद हम सभी जिम्मेदार हैं इस तरह के हादसों के लिए ! एक कारण ... माता - पिता द्वारा बच्चों पर अधिक प्रेशर का डालना कि,  हर हाल में , किसी भी कीमत पर अच्छे नंबरों से पास होना ही पड़ेगा, फिर चाहे इसके लिए तुम्हें २४  घंटे ही क्यों ना पढ़ना पड़े ? हमें तुमसे बहुत उम्मीदें हैं इत्यादि ! स्कूल का प्रेशर हमेशा होनहार बच्चों पर रहता है,  क्योंकि स्कूल की रेपुटेशन का सवाल होता है जहाँ टीचर्स बच्चों पर कुछ ज्यादा ही दबाब बनाते हैं ! या फिर बच्चे स्वयं इसके लिए जिम्मेदार है जो जरा जरा सी बातों पर अपनी सुध-बुध खो देते हैं ! एक दुसरे से आगे निकलने की होड़ जिसके लिए कुछ भी कर गुजरें ! सच कहूँ तो जिम्मेदार हम सभी हैं और हम सभी को इसकी जिम्मेदारी लेनी भी होगी ! क्योंकि किसी की एक गलती हमसे हमारी खुशियाँ छीन सकती हैं ! फिर भी सच तो ये है कि बच्चे तो बच्चे होते हैं उनमें बचपना भी बहुत होता है और लम्बे समय तक ये उनके साथ भी रहता है ! बच्चों में ज्ञान की कमी होती है , उन्हें सही गलत का अनुमान नहीं होता , कौन सी बात उनके मन में कब घर कर जाये इसका अनुमान हम लोग नहीं लगा सकते ! फिर भी बच्चों की उम्र के इस पड़ाव में उन्हें माता-पिता के साथ की आवश्यकता हमेशा होती है ! इस उम्र में बच्चों की सोच उनके हाव-भाव , व्यवहार में तेजी से परिवर्तन होता है ! कुछ बच्चे वक़्त के साथ ढल जाते हैं और सही गलत का अनुमान लगा लेते हैं फिर भी सभी बच्चों को उचित मार्ग-दर्शन की आवश्यकता होती है ! जब से हमने अपने आप को जरूरत से ज्यादा व्यस्त कर लिया है तब से हम लोगों का ध्यान अपने बच्चों से और उनकी दिनचर्या , क्रिया-कलाप , व्यवहार से पूरी तरह हट गया है और आज अधिकांश परिवारों में  यही स्थिति है ! बच्चों के लिए माता-पिता का प्यार , स्नेह , मार्ग-दर्शन , उनके लिए समय निकालना किसी संजीवनी बूटी से कम नहीं है ! अगर बच्चों के लिए माता-पिता के पास समय नहीं है तो इस तरह की  स्थिति उनके साथ भी निर्मित हो सकती है ! खास तौर पर होनहार बच्चे इस तरह की वारदात को ज्यादा अंजाम देते हैं ! क्योंकि वो इस बात को बहुत गहराई से सोचते हैं और असफल होने पर उन्हें शर्मिंदगी महसूस होगी ! बस यहीं वो गलती कर जाते हैं  ! माता-पिता जब बच्चों को ज्यादा होशियार समझने लगते हैं तो उनका भी ध्यान बच्चों से उनकी दिनचर्या से हट जाता है और वो बड़ी बेफिक्री महसूस करते हैं ! यदि आप ऐसा कर रहे हैं तो आप अलर्ट हो जाइये !
मैं सभी होनहार बच्चों से गुजारिश करूंगा कि , हमारा जीवन बहुत ही अनमोल है और ये जीवन हमें एक बार ही मिलता है ! हमें कभी भी छोटी - छोटी असफलताओं से निराश नहीं होना चाहिए और छोटी - छोटी सफलता पर किसी भी तरह का घमंड नहीं करना चाहिए ! क्योंकि ये दोनों स्थिति हमारे लिए हितकर नहीं हैं ! क्योंकि जान है तो जहान है और हम जिन्दा रह कर ही इतिहास बना सकते हैं ! सभी माता - पिता से गुजारिश है , कृपया अपने बच्चों को अपना समय दीजिये और जीवन उपयोगी बातों से उन्हें अवगत करायें ! 
विशेष ......>> जिन घरों में नन्हें - मुन्हें बच्चें हैं उन घरों में कृपया अपनों की ही मौत का सामान ना रखें जिन्हें हम हथियार कहतें हैं क्योंकि जब गोली चलती है तो वो ये नहीं देखती की कौन अपना है कौन पराया वो सिर्फ खुशियाँ छीनती है ..... इसलिए कहता हूँ कि , ... ये सवाल आपकी अपनी खुशियों का है 



अमित श्रीवास्तव 

परिचय - "शब्द भीतर रहते हैं तो सालते रहते हैं, मुक्त होते हैं तो साहित्य बनते हैं"। मन की बाते लिखना पुराना स्वेटर उधेड़ना जैसा है,उधेड़ना तो अच्छा भी लगता है और आसान भी, पर उधेड़े हुए मन को दुबारा बुनना बहुत मुश्किल शायद...।


चाय कैसी बनी है ,सवेरे का पहला सवाल ? मेरा सच भरा जवाब , थोड़ी मीठी ज्यादा है । उधर से आवाज़ आई , चीनी तो रोज़ ही इतनी डालती हूँ ,आज ज्यादा मीठी क्यों लग रही है ! क्या कहूँ ,रोज़ झूठ बोल देता था , आज सच बोल दिया ।

अच्छी चाय पीनी है तो बनालो अपने आप और मुझे भी पिलाओ और सिखाओ अच्छी चाय कैसे बनती है , तमतमाया हुआ डायलाग था यह, उधर से । हो गई मेरे दिन की शुरुआत 'एक कप सच' के साथ ।

फूल लेकर उतर रहा था ,सीढियों से नीचे कि , आवाज़ सुनाई पड़ी ,हाथ तो धो लिए थे ,फूल तोड़ने से पहले ? मैंने सच कह दिया , नहीं ,हाथ तो नहीं धोये थे क्योंकि हाथ तो मेरे गंदे हुए ही नहीं अभी सवेरे से, सो हाथों को क्यों धोना । ठीक है फिर फूलों को भगवान् के पास मत रखियेगा ,मै दूसरे  तोड़ लाऊँगी ,आप के बस का कुछ नहीं । वही अगर रोज़ की तरह झूठ बोलकर 'हाँ' बोल दिया होता तो सब ठीक होता । परन्तु मेरी तो आज मति मारी गई थी जो सच बोलने का संकल्प ले रखा था।

आफिस के लिए निकलते निकलते फरमान मिला ,शाम को जल्दी आइयेगा ,रजनी ( उनकी एक सहेली ) के यहाँ चलना हैं ,उनकी बेटी का सेलेक्शन हो गया है एम.बी.ए. के लिए ,सो बधाई देने के लिए । मैंने सच कह दिया ,मैं नहीं आ पाउँगा एक मीटिंग है ( वैसे रोज की तरह कह सकता था कोशिश करूंगा ,यह जानते हुए भी कि आ नहीं सकूँगा ) ,नतीजा बिना हाय बाय के विदाई और गेट का एक जोर की आवाज़ के साथ बंद होना ....भड़ाक ...।

आफिस झुंझलाते हुए पहुंचा ( जब भी मन से 'हाय बाय' नहीं मिलती तब आफिस जाने में रास्ते भर मन खिन्न रहता है ) । वहां तमाम लोग प्रतीक्षा कर रहे थे । किसी को अपने बिजली के बिल के गलत होने की शिकायत थी , कोई बिजली चोरी में पकड़ा गया था ,कोई नया कनेक्शन न मिलने की शिकायत कर रहा था । सभी को सुनने के बाद मैंने सच सच बता दिया कि  उनका काम तत्काल हो सकने वाला नहीं है और गलत काम में जयादा मदद भी नहीं हो सकती ( अक्सर ऐसे मौकों पर मैं झूठी दिलासा देकर टाल  जाता हूँ कि  देखेंगे ,कोशिश करेंगे ) ।मेरा जवाब सुनते ही ज्यादातर लोग भड़क गए । कोई किसी माननीय विधायक से बात करने को कहता ,कोई किसी मंत्री जी के हवाले से जोर डालने लगता ,कोई कहता आप तो बिलकुल सुनते ही नहीं किसी की, और साफ़ साफ़ मना कैसे कर देते हैं आप । न करना हो, न करिए परन्तु ऐसे सच में कोई इनकार नहीं करता । अनेक लोगों ने अपने मोबाइल से तमाम सिफारिशी लोगों से बात भी कराई । जब मैंने सच सच बयान करते हुए उनके काम न हो पाने के सही वैधानिक कारण बताये ,तब उधर से उसी फोन पर मुझसे कहा गया ,अरे न हो पाए तो न करना पर इन्हें मना मत करिए । कुछ आश्वासन देकर टाल  दीजिये ,यह  सब नेता जी के क्षेत्र के आदमी हैं।

इतना सब होते होते २ घंटे व्यतीत हो गए । तभी मेरी एक स्टाफ आई और आते ही बोली ,सारी सर , आज मैं लेट हो गई , असल में बच्चों के स्कूल में पी टी एम थी । मैंने कहा , आप तो रोज लेट आती हैं ( अमूमन मैं चुप रहता हूँ और तुरंत तो कभी नहीं डांटता अपने स्टाफ को ), इतना सुनते ही वह अपना मुंह लटकाए हुए वहां से ऐसे चली गई ,जैसे कोई महिला मेक अप करा कर पार्लर से निकले और आप उससे कह दो ,कुछ दिनों से बीमार चल रही हो क्या !

शाम को बॉस ने पूछा और अमित क्या चल रहा है ,फील्ड में लोग खुश तो हैं मेरी (बास की ) वर्किंग से । मैंने छूटते ही सच कह दिया , नहीं सर , आप थोड़ा हार्श कम हुआ करिए , नहीं तो किसी दिन कोई आफिसर रीटेलियेट कर सकता है ,तब आपकी पोजीशन आकवर्ड हो जाएगी । इतना सुनकर बॉस का चेहरा लाल हो गया और मुझसे बोले ,चलो ठीक है अब घर चला जाए । शायद उन्हें भी मेरा सच जंचा नहीं ।

अभी अभी आवाज़ आ रही है , ब्लागिंग कर रहे हैं क्या ,पहले खाना खा लीजिये ,मैं वेट कर रही हूँ । मैं जोर से झूठ बोल रहा हूँ ,नहीं आफिस की मेल देख रहा हूँ । सच का साथ छोड़ कर झूठ बोलकर अगले दिन की अच्छी शुरूआत करने की तैयारी आज की रात से कर रहा हूँ ।

यह सच है कि सच में सच बोलना सबसे बड़ा झूठ है ।    


मानव 'मन': अनकहे लफ्ज़ मानव मेहता 'मन' 


परिचय - ज़िक्र करूँ क्या मैं अपने बारे में, मुझे खुद नहीं मालूम मेरी औकात क्या है.."


कुछ अनकहे लफ्ज़-
टांगे हैं तेरे नाम,
इक नज़्म की खूंटी पर...
और वो नज़्म-
तपती दोपहर में...
नंगे पाँव-
दौड़ जाती है तेरी तरफ ...!!

गर मिले वो तुझको,
तो उतार लेना वो लफ्ज़-
अपने जहन के किसी कोने में
महफूज कर लेना....!!

और मेरी उस नज़्म के पांव के छालों पर,
लगा देना तुम अपनी मोहब्बत का लेप.....!!


परिचय - वाराणसी में पला-बढ़ा, दिल्ली में अध्यापन कार्य में संलग्न हूँ। जब कभी मैं दिल के गहराई में कुछ महसूस करता हूँ तो उसे कविता के रूप में पिरो देता हूँ। अभिनय भी मेरा शौक है।


चलो मान लिया
कि तुम नहीं
दृष्टिहीन हो,
पर फायदा क्या 
जब तुम्हारे अंदर
दृष्टि ही न हो

*************
बिछा रखा था
जिसके लिये
हर राह में आईना
आस टूटने लगी है
अब तक तो वो
आई ना

***************
ओ री सखी !
अब तो शुरू कर दे
सजना
आ ही रहे होंगे
तुम्हारे
सजना

लाल स्कार्फ वाली लड़की - my dreams 'n' expressions ...  अनुलता 


परिचय - मैं हूँ अनु..अनुलता राज नायर. दो बेटों की माँ हूँ. केमेस्ट्री में एम.एस.सी किया है.पढ़ना बहुत पसंद है.विद्यार्थी जीवन में पढाकू किस्म की थी सो तब कविता सूझती न थी.... फिर कुछ यूँ हुआ कि ज़िन्दगी ज़रा ठहरी और वक्त मिला भावनाओं को शब्दों में अभिव्यक्त करने का.. !! कभी सुकून मिला तो दिल गुनगुनाया..या कभी दर्द हुआ तो मन कसमसाया...और जो दिल में आया उसको ढाल दिया शब्दों में....अनजाने ही बन गयी कविता.. अब कुछ सालों से लेखन कर रही हूँ .......



वो देखता रहता उस पनीली आँखों वाली लडकी को,रेत के घरौंदे बनाते और बिगाड़ते.....उसे मोहब्बत हो चली थी थी इस अनजान,अजीब सी लडकी से...जो अक्सर लाल स्कार्फ बांधे रहती.....कभी कभी काला भी...

बरसों से समंदर किनारे रहते रहते इस मछुआरे को पहले कभी न इश्क हुआ था न कभी  ऐसी कोई लडकी दिखी थी.जाने कहाँ से आयी थी वो लडकी इस वीरान से टापू में....देखने में भली लगती थी मगर कुछ विक्षिप्त सी,खुद से बेपरवाह सी...(जाने लहरें उसे बहा कर लाई हैं  या किसी मछली के पेट से निकली राजकुमारी है वो...मछुआरा अपनी सोच के साथ बहा चला जाता था..)
लडकी को देखते रहना हर शाम का नियम था उसका.वो बिना कुछ कहे लड़की को समझने की नाकाम कोशिश करता था.
एक रोज़ वो लडकी के करीब पहुंचा....लडकी भी उसकी उपस्थिति से अभ्यस्त हो चुकी थी सो उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं की....बस अपना घरौंदा बनाती रही.....तोड़ देने के लिए...
तुम इतने  सुन्दर घरौंदे  क्यूँ बनाती हो ???और फिर उन्हें यूँ रेत में मिला देती हो?? 
कोई मिटाने के लिए भी बनाता है भला?? और ये लाल काला स्कार्फ क्यूँ बदलती हो??? एक साथ सारे सवाल दाग दिए उसने,मानों कहीं एक सवाल के बाद लडकी कोई रोक न लगा दे उसके बोलने पर. 

बिना अपना चेहरा उठाये वो लड़की  बोली ,जब मैं घरौंदे बनाती हूँ तब प्रेम में होती हूँ और तब ये लाल स्कार्फ पहन लेती हूँ,घर के बनते ही मैं नफरत हो जाती हूँ और काला स्कार्फ पहन लेती हूँ और फिर मुझे घरौंदा तोडना अच्छा लगता है.
उसकी आवाज़ जैसे किसी शंख के भीतर से निकली ध्वनि हो.... 
खुद को सम्मोहित होने से रोकते हुए लड़के ने कहा- 
तो तुम्हारे भीतर दो व्यक्तित्व हैं...एक भला एक बुरा !! आखिर कैसे जी लेती हो ये दोहरा जीवन?
लड़की ने पहली दफा पलकें ऊपर उठायी......सागर की गहराई मानों कम पड़ गयी उसकी आखों के आगे...और चेहरे की लुनाई मानों कोई तराशा हुआ सीप....
सच कहा तुमने मछुआरे....थक गयी हूँ ये दोहरा जीवन जीते जीते....कहो क्या तुम जियोगे मेरा एक जीवन???
लड़के की हाँ और न को सुने बिना ही उसने काला स्कार्फ लड़के की गर्दन में लपेट दिया और कहा अब इस घरोंदे को तुम तोड़ो.....मेरे भीतर की बुरे को तुम जियो..... 
भीगी आँखों से लड़के ने घरौंदा तोड़ दिया और लड़की के गालों पर भी लुढ़क आये आँसू......
इसके पहले कभी एक सीप में दो मोती उसने न सुने न देखे थे  .
अब तो ये नियम बन गया...लडकी साहिल से दूर सुन्दर घरौंदा बनाती,लहरों से बचाती और फिर खुद लड़के से तोड़ डालने को कहती फिर जाने क्यूँ उन दोनों की आँखों से आँसू निकल आते...
लडकी के साथ एक सुन्दर सपनों का घर बनाने का ख्वाब देखने वाले लड़के के लिए ये एक यातना से कम न था,मगर बावली लडकी से इश्क की कीमत तो उसको चुकानी ही थी.
लड़का कहता तुम्हें घर तोडना ही है तो साहिल के नज़दीक क्यूँ नहीं बनाती,लहरें खुद-ब-खुद बहा ले जायेंगी,मगर लडकी कहाँ सुनती,कहती तुम तो हो तोड़ने के लिए,सागर की लहर ही तो हो न तुम......और उसका ये अनोखा क्रूर खेल चलता रहता.
लड़का थक गया उसे मनाते,समझाते......मगर वो नहीं मानी...लड़के ने खुद ही सोच लिया कि शायद किसी पहले प्यार की नाकामी ने ही उसको पागल बना दिया होगा,और अब उसके दिल में प्यार के लिए कोई गुंजाइश न थी....हाँ,मगर वो हर शाम सागर किनारे  इंतज़ार करती मछुआरे का और उसकी कश्ती किनारे लगते ही वो घरौंदा बनाने जुट जाती.
उस शाम सूरज ढल गया,मछुआरा नहीं लौटा.लड़की साहिल पर इंतज़ार करती रही और तारे निकल आये मगर कोई कश्ती किनारे नहीं लगी.
उस रोज़ समंदर लील गया था लड़के को...कौन जाने लहरों ने उसे डुबोया या उसने खुद जल समाधी ली !!
लड़की तो पहले ही बावली थी....
वो अब भी घरौंदे बनाती थी साहिल से दूर.......मगर घरौंदा बनते ही एक लहर जाने कहाँ से अपने तटबंध तोड़ती वहां तक आती और साथ ले जाती घरौंदा,और लड़की के दो बूँद आँसू भी. 
लोग कहते हैं इसके पहले न समंदर इतना खारा था न ही सीप के भीतर मोती निकला करते थे.

मंगलवार, 14 मई 2013

दिया बन जल रहा हूँ रात के किनारे पर ....




दिशाएँ अनगिनत 
पर रुकावट भी सहस्त्र 
ईश्वर देता है 
पर प्रयास का अर्घ्य भी माँगता है 
कोई इसे हां मान लेता है 
कोई जीत की आहटें पाता है 
दुनिया दो है ....... एक प्रत्यक्ष 
दूसरा अप्रत्यक्ष - जिसमें प्रवेश निशेध नहीं 
बस सामर्थ्य और विश्वास की ज़रूरत है ....

                 रश्मि प्रभा 


दिया बन जल रहा हूँ
रात के किनारे पर 
पर एक परिधि है मेरी  
जहाँ तक पहुँच कर 
रुक जाता हूँ 
थम जाता हूँ 
और तिमिर आकाश का विस्तार 
मुझे संघर्ष करने को 
मजबूर कर रहा होता है

मैंने आँखें खोल रखी हैं 
मगर कहाँ कुछ दिखता है 
एक सीमा के बाहर

दो अलग अलग दुनिया हैं 
मेरे लिए  
एक दृश्य 
एक अदृश्य ....
(जिसका अपना अस्तित्व है)
मैं किसे अपना जानूँ  
किसे सच मानूँ

जहाँ एक ओर 
शून्य विस्तार पाता जा रहा है 
वहीं मेरी दृष्टि 
(शायद शून्य से भी अधिक विस्तृत)
सीमाओं में सिमटी जा रही है

मैं किसे सच मानूँ 
उस शून्य को 
या फिर अपनी दृष्टि को ?

मैं आज भी ...
दिया बन जल रहा हूँ 
रात के किनारे पर 


शिवनाथ कुमार

शनिवार, 9 फरवरी 2013

जैसे.. फासले से


बाह्य बोल रहा है - निरंतर 
अन्दर की ख़ामोशी चट्टान हो गई है 
तुम किससे मिलना चाहते हो 
उससे जो उदासीन है दर्द से 
या उससे जिसके भीतर दर्द ने पनाह ले ली है गहरे रिश्ते की तरह ...
उदासीनता तुम्हें हास्यास्पद लगेगी 
पर जिस दिन तुम चट्टान से टेक लगाओगे 
तुम्हें तुम्हारे खोये आंसू मिल जायेंगे !

                 रश्मि प्रभा 


हारे हुए ख्वाब की
प्रतिध्वनि के बीच
तुम आते हो जब...
खसलत की बेदिली में 
गल्प का अम्बार लिए
अश्कों की कतारों में  
लिख जाते हो  
मेरा आदिम सच  ?
खुली हवा के  
बंधे पांव से पूछो 
कब घूमना हुआ ?
हम दोनों के
परिमोक्ष के साथ
तुम आते हो जब... 
पोर-पोर में रचे
ऐतबार के साथ
छोड़ जाते हो 
अपनी असीमता ?
 फिजाओं में बहकते
शुष्क सन्नाटों के बीच  
 अनछुए पल
वापस करने को  
तुम आते हो जब..
बंद दरवाजों की
सांकल बजाते
अपने-पराये की
तर्क-समीक्षाओं से
अलग-थलग
तब सहेजकर रखी जाती है
यातनाएं
जैसे ..करीने से
रखा जाता है स्पर्श
जैसे.. फासले से  
रखी जाती है आग
जैसे.. सुकून से
रखा जाता है शोर                                                       

 राहुल 
http://rahul-dilse-2.blogspot.in/
[IMG_1766.JPG]

शुक्रवार, 1 फरवरी 2013

डॉ. सरोज गुप्ता - http://facebook.com/saroj.delhi50




पढ़ती हूँ .... चलती जाती हूँ इस पन्ने से उस पन्ने तक 
कुछ पन्ने थाम लेते हैं ऊँगली 
अपनी बौद्धिक सोच के किनारे देते हैं 
सोच की प्यास बुझाने का अद्भुत जल 
..........
आइये इस जल को साझा कर लें ....

                 रश्मि प्रभा 

मान लूँ ?

यह मेरा है कंकाल ?
कैसे मान लूँ ?
खिलाया मैंने इसे माल ,
चल भेड चाल ,
उतारी सबकी खाल ,
तब किया था ऊंचा ,
कहीं जाकर अपना भाल !
यह मेरा नहीं कंकाल !

यह मेरा नहीं कंकाल !
पिटो कितने गाल, 
नहीं गलेगी दाल ,
यह तुम्हारी बेढम चाल ,
नहीं निकलेगा कोई सुर ,
लगा लो कितने गुरु -गुर ,
मिट जाएगा एक दिन 
यह अकडा,सुकडा,लंगडा,
मानव का बिगड़ा असली रूप ,
तू बहुत लगे कुरूप ,
बोल सच -
तू है क्या बहरूपिया ?
तू ही मेरा सच ,
मेरा ही कंकाल !

========================

कही यह इंसान तो नहीं ?

इसकी खुरदुरी हथेलियाँ 
बताती है कि
यह एक कामगार है !
कामगार सृजनहार होता है 
इसकी हथेली में कैद हैं 
चमकीली सीपियाँ 
कही यह रचनाकार तो नहीं ?

रोज -रोज गढ़ता है नया 
फिर उसे मिटाता है !
मिट्टी को मिटटी में मिलाता है 
कही यह कुम्हार तो नहीं ?

इसकी हथेली की 
मोटी -मोटी लकीरें 
लोहे की छड जैसी 
हो गयी हैं 
लोहा लोहे को काटता है 
यह भी काटेगा 
सदियों से जकड़ी जंजीरें 
कही यह लुहार तो नहीं ?

रुखी-सूखी हथेलियों से 
उठायी बोझों की टोकरियाँ 
भूख की आग से जल रही हैं 
पेट की आंतडियां 
सिकुड़ कर हो गयी 
जैसे गली संकरी 
चराते हुए बकरियां 
दीमक ने खा ली है पसलियाँ 
कही यह इंसान तो नहीं ?

======================

इरेजर 
~~~~
रात 
मौत से 
मिलने गई रेखाएं ! 
लाल खून से 
भरी थी सारी शिराएँ !
सहलाने को 
इनकी सिसकती आहें 
जल रही थी 
करोड़ो मोमबतियां !
मौत ने थमा इरेजर 
रेखाओं को ,
नो एंट्री का बोर्ड लगा दिया !
दुनिया में जितनी भी है पैंट्री, 
भूख कभी नहीं मिटेगी 
स्वार्थ लोलुपता 
अगर बढती रहेगी इस जेन्ट्री में !

शनिवार, 26 जनवरी 2013

भारतवर्ष





वो किस राह का भटका पथिक है ?
मेगस्थिनिस बन बैठा है
चन्द्रगुप्त के दरबार में
लिखता चुटकुले
दैनिक अखबार में |
सिन्कदर नहीं रहा
नहीं रहा विश्वविजयी बनने का ख़्वाब
चाणक्य का पैर
घांस में फंसता है
हंसता है महमूद गज़नी
घांस उखाड़कर घर उजाड़कर
घोड़ों को पछाड़कर
समुद्रगुप्त अश्वमेध में हिनहिनाता है
विक्रमादित्य फ़ा हाइन संग
बेताल पकड़ने जाता है |
वैदिक मंत्रो से गूँज उठा है आकाश
नींद नहीं आती है शूद्र को
नहीं जानता वो अग्नि को इंद्र को
उसे बारिश चाहिए
पेट की आग बुझाने को |
सच है-
कुछ भी तो नहीं बदला
पांच हज़ार वर्षों में !
वर्षा नहीं हुई इस साल
बिम्बिसार अस्सी हज़ार ग्रामिकों संग
सभा में बैठा है

पास बैठा है अजातशत्रु
पटना के गोलघर पर
कोसल की ओर नज़र गड़ाए |
कासी में मारे गए
कलिंग में मारे गए
एक लाख लोग
उतने ही तक्षशिला में
केवल अशोक लौटा है युद्ध से
केवल अशोक लड़ रहा था
सौ चूहे मार कर
बिल्ली लौटी है हज से
मेरा कुसूर क्या है ?-
चोर पूछता है जज से |
नालंदा में रोशनी है
ग़ौरी देख रहा है
मुह्हमद बिन बख्तियार खिलजी को
लूटते हुए नालंदा
क्लास बंक करके
ह्वेन सांग रो रहा है
सो रहा है महायान
जाग रहा है कुबलाई ख़ान |
पल्लव और चालुक्य लड़ रहें हैं
जीत रहा है चोल
मदुरै की संगम सभा में कवि
आंसू बहाता है
राजराज चोल लंका तट पर
वानर सेना संग नहाता है |

इब्न बतूता दौड़ा चला आ रहा है
पश्चिम से
मार्को पोलो दक्षिण से
उत्तर से नहीं आता कोई उत्तर
आता है जहाँगीर कश्मीर से
गुरु अर्जुन देव को
मौत के घात उतारकर |
नहीं रही
नहीं रही सभ्यता
सिन्धु – सताद्रू घाटी में
अमृतसर के स्वर्ण मंदिर से
चीखता है भिंडरावाले
गूँज रहा है इन्द्रप्रस्थ
सौराष्ट्र
इल्तुतमिश भाला लेकर आता है
मल्ल देश के आखिरी पड़ाव तक
चंगेज़ ख़ान की प्रतीक्षा में |
कोई नहीं रोकने आता
तैमूर लंग को |
बहुत लम्बी रात है
सोमनाथ के बरामदे में
कटा हुआ हाथ है |
लड़ रहें हैं राजपूत वीर
आपस में
रानियाँ सती होने को
चूल्हा जलाती हैं |
चमक रहा है ताजमहल
धुल रहा है मजदूरों का ख़ून

धुल रहा है
कन्नौज
मथुरा
कांगरा |
कृषि कर हटाकर
तुगलक रोता है-
“पानी की किल्लत है
झूठ है
झूठ है सब
केवल राम नाम सत् है”
वास्को डि गामा ढूंढ रहा है
कहाँ है ?
कहाँ है भारतवर्ष ?

सौरभ राय 'भगीरथ'
http://souravroy.com/