सोमवार, 8 अक्तूबर 2012

एक अनमोल तोहफा - पिता का ख़त पुत्री को - (प्रथम भाग )


 सतीश सक्सेना 

आधुनिकतावाद की और भागते भारतीय समाज में, पाश्चत्य सभ्यता की जो बुराइयाँ आईं, हम भारतीयों के लिए , बेहद तकलीफ देह रहीं ! और आग में घी डालने का कार्य किया, पैसा कमाने की होड़ में लगे इन टेलीविजन चैनलों ने! चटखारे लेकर, सास के बारे में एक्सपर्ट कमेंट्स देती तेजतर्रार बहू, लगभग हर चैनल पर नज़र आने लगी और फलस्वरूप तथाकथित शिक्षित विवाहित भारतीय महिलाएं यह भूल गईं कि इस टीवी चैनल का आनंद, उनकी ही तरह उसकी भाभी भी ले रही है , और इस तरह भारतीय महिलाओं के लिए नए संस्कार हर घर में पनपने लगे ! और हमारी विवाहित पुत्रियाँ यह भूलती जा रही हैं कि वह एक दिन इसी घर में सास एवं मां का दर्जा भी पाएँगी ! 

भले ही कोई पुरूष या महिला नकार दे, पर क्या यह सच नहीं है कि किसी घर ( मायका या ससुराल ) में, माँ को वो सम्मान नही मिलता जिसकी वो पूरी हकदार है ! और जननी का सम्मान गिराने का अपराध सिर्फ़ भावी जननी ( बेटी ) ने किया और असहाय पिता (सहयोगी पति ) कुछ न कर पाया !

हर स्थान पर पुत्री यह भूल गई कि सास भी एक पुत्री है और मेरी भी कहीं मां है, जिस बहू ने सास का मजाक उड़ाया उसे उस समय यह याद ही नही आया कि मेरी मां के साथ भी यह हो सकता है, और जब मां के साथ वही हुआ तो वो लड़की ( एक बहू) असहाय सी, अपनी भाभी का या तो मुंह देखती रही या उसको गाली दे कर अपना मन शांत किया !

नारी जागरण का अर्थ यह बिल्कुल नही कि हम अपने बड़ों कि इज्जत करना भूल जायें, या बड़ों कि निंदा करने और सुनाने में गर्व महसूस करें, अपनी सास का सम्मान अपनी मां की तरह करके बच्चों में संस्कार की नींव डालने का कार्य शुरू करें ! सास और ससुर के निर्देश, अपने माता पिता के आदेश की तरह स्वीकार करें तो हर घर एक चहकता, महकता स्वर्ग बन सकता है ! 

मगर मैं, एक कविह्रदय, यह नहीं चाहता कि मेरी पुत्री यह दर्द सहे व महसूस करे ! और यही वेदना यह ख़त लिखने के लिए प्रेरणा बनी !

मूल मंत्र सिखलाता हूँ मैं
याद लाडली रखना इसको 
यदि तुमको कुछ पाना हो 
देना पहले सीखो पुत्री 
कर आदर सम्मान बड़ों का गरिमामयी तुम्ही होओगी,
पहल करोगी अगर नंदिनी, घर की रानी तुम्ही रहोगी ! 

उतना ही कोमल मन सब का 
जितना पुत्री तेरा मन है ! 
उतनी ही आशाएं तुमसे ,
जितनी तुमने लगा राखी हैं
परहितकारक बनो सुपुत्री , भागीरथी तुम्ही होओगी,
पहल करोगी अगर नंदिनी घर की रानी तुम्ही रहोगी !

उनकी आशाओं को पूरा,
करने का है धर्म तुम्हारा
जितनी आशाओं को पूरा
करवाने का स्वप्न तुम्हारा
मंगलदायिन बनो लाडली स्वप्नपरी सी तुम्ही लगोगी
पहल करोगी अगर नंदिनी घर की रानी तुम्ही रहोगी !

पत्निमिलन की आशा लेकर
उतना ही उत्साह सँजोकर,
जितना तुमको पिया मिलन
की अभिलाषा है गहरे मन से
प्यार किसी का कम न मानो साध तुम्हारी पूरी होगी
पहल करोगी अगर नंदिनी घर की रानी तुम्ही रहोगी !

पति है जीवन भर का साथी
दुःख के साथ खुशी का साथी
तेरे होते, कभी अकेलापन,
महसूस न करने पाए,
सदा सहायक रहो पति की हर अभिलाषा पूरी होगी
पहल करोगी अगर नंदिनी घर की रानी तुम्ही रहोगी !
......क्रमश

11 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर...
    हृदयस्पर्शी.....

    सतीश जी को शुभकामनाएं...
    आपका आभार दी.

    अनु

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  2. सिर्फ भावनाओं में बह कर नहीं लिखी गयी ये कविता जैसा की अक्सर पिता-पुत्री सम्बन्ध वाली कविताओं में होता है. बहुत ही तार्किक भी है और समसामयिक भी. बहुत अच्छी लगी.

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  3. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  4. हृदयस्पर्शी.....सतीश जी को बहुत बहुत शुभकामनाएं...

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  5. बहुत सुन्दर सीख देती भावनाओं से ओत प्रोत रचना

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  6. बहुत सुन्दर एवं सामयिक शिक्षा ,हर बेटी के लिए अनुकरणीय

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  7. यह रचना आज से लगभग २३ वर्ष पहले लिखी गयी थी, उस समय मेरी पुत्री ४ वर्ष की थी..
    आज आपके द्वारा इसे प्रकाशित देखकर वाकई अच्छा लगा !
    आभारी हूँ आपका...

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  8. मूल मंत्र सिखलाता हूँ मैं
    याद लाडली रखना इसको
    यदि तुमको कुछ पाना हो
    देना पहले सीखो पुत्री
    बेहद प्रेरक ....
    आभार इस प्रस्‍तुति के लिए

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