शुक्रवार, 10 जनवरी 2014

कवि सुमित्रानन्दन पंत के साथ कुछ दूर






















कवि कहूँ तुम्हें या प्रकृति  
जिसने मुझे एक नाम दिया 
और मैं प्रकृति में व्याप्त हुई 
चिड़ियों के कलरव में 
तपस्वियों के अर्घ्य में 
ब्रह्ममुहूर्त की वेदी पर 
मैं प्रातः संगीत की तरह 
तुम्हारे लिए एकलव्य बन गई 
मेरे शब्द शब्द दक्षिणा हैं 
स्वीकार करो और कुछ दूर मुझे साथ चलने की गरिमा दो  … 


प्रकृति के सुकुमार कवि पन्त ने किरणों से बात करना सिखाया , पक्षियों की चहचहाहट में भोर का सन्देश दिया . कक्षा में उनकी रचना ने प्रकृति के मध्य हमें लाकर खड़ा किया और प्रकृति के कण कण में व्याप्त सौन्दर्य की मुखरता से हमें रूबरू किया -

'प्रथम रश्मि का आना रंगिणि!
तूने कैसे पहचाना?
कहां, कहां हे बाल-विहंगिनि!
पाया तूने यह गाना?
...

शशि-किरणों से उतर-उतरकर,
भू पर कामरूप नभ-चर,
चूम नवल कलियों का मृदु-मुख,
सिखा रहे थे मुसकाना।
....
कूक उठी सहसा तरु-वासिनि!
गा तू स्वागत का गाना,
किसने तुझको अंतर्यामिनी
बतलाया उसका आना! '

स्वतः मेरी कलम प्राकृतिक हो उठी और कोयल की कुहू कुहू को भर लिया अपनी कलम में 


सुबह आँख खुलते
सुनती हूँ कोयल की कूक
मुझे कोई अपना याद नहीं आता
मैं तो बस कोयल की मिठास
और उसके बदलते अंदाज में खो जाती हूँ

कोयल गाती है
फिर जोर से बोलती है
मैं उसकी हर अभिव्यक्ति को सुनती हूँ
एक गीत, एक पुकार, एक झल्लाहट ..
क्या नहीं होता उसके तेवर में !

कहती है कोयल-
'मेरी मोहक तान
और याद - कोई और !'

मैं हर दिन कहती हूँ-
'कोयल
मैं बस तुम्हें सुन रही हूँ
जब तक तुम गाओगी
मैं सुनती रहूंगी ..'

मेरे दिए इस विश्वास के संग 
कोयल की कुहू कुहू
सुकून में बदल जाती है
और वह एक डाली से दूसरी डाली का सफ़र
आह्लादित स्वर में करती है
और मेरा पूरा दिन मीठा हो जाता है !

सुकुमार कवि - तुम्हारे पूरे व्यक्तित्व में प्राकृतिक संवेदना की कोमलता मिली , जब 1964 में मैं तुमसे  मिली . रेशम की तरह बाल, एक बार छू लेने का बाल सुलभ ख्याल निःसंदेह सौन्दर्य का आकर्षण था .  उठने बैठने मुस्कुराने गुनगुनाने में हवा की मंद चाल सी थी . हाँ तब उस उम्र में ये व्याख्या मेरे पास नहीं थी, ना ही उस व्यक्तित्व की गरिमा के लिए शब्द थे ... पर जो दृश्य आँखों ने कैद किया , उनके छायाचित्र संभाल के रखे ... उम्र के हर पायदान पर तस्वीरें मुखर से मुखरतम होती गईं .

'रश्मि प्रभा' - इस नाम ने मुझे वह गौरव दिया , वह पहचान दी - जिसका लेशमात्र भी ख्याल उस उम्र में नहीं आया .उम्र समय की घुमावदार घाटियों से गुजरता गया और मेरे जेहन में इन पंक्तियों का असर हुआ


वियोगी होगा पहला कवि,आह से उपजा होगा गान, उमड़कर आखों से चुपचाप,बही होगी कविता अनजान...


तुम्हारी इस रचना ने मेरी हर ख़ामोशी को शब्द दिए , बहते आंसुओं से सरगम की धुन आने लगी - तभी तो प्रातः की कूक में मैंने सोचा 

रात रोज आती है,
हर रात नए सपनों की होती है,
या - किसी सपने की अगली कड़ी.....
मैं तो सपने बनाती हूँ
लेती हूँ एक नदी,एक नाव, और एक चांदनी........
...नाव चलाती हूँ गीतों की लय पर,
गीत की धुन पर सितारे चमकते हैं,
परियां मेरी नाव में रात गुजारती हैं...
पेडों की शाखों पर बने घोंसलों से
नन्ही चिडिया देखती है,
कोई व्यवधान नहीं होता,
जब रात का जादू चलता है.....
ब्रह्म-मुहूर्त में जब सूरज
रश्मि रथ पर आता है-
मैं ये सारे सपने अपने
जादुई पोटली में रखती हूँ...
परियां आकर मेरे अन्दरछुपके बैठ जाती हैं कहीं
उनके पंखों की उर्जा लेकर
मैं सारे दिन उड़ती हूँ,
जब भी कोई ठिठकता है,
मैं मासूम बन जाती हूँ.......
अपनी इस सपनों की दुनिया में मैं अक्सर
नन्हे बच्चों को बुलाती हूँ,
उनकी चमकती आंखों में
जीवन के मतलब पाती हूँ!
गर है आंखों में वो बचपन
तो आओ तुम्हे चाँद पे ले जायें
एक नदी,एक नाव,एक चाँदनी -
तुम्हारे नाम कर जायें......................


और पन्त की रश्मि के नाम स्वप्न नीड़ से

कूक उठी सहसा तरुवासिनी
गाया स्वागत का गाना

सच में , वसीयत इसे कहते हैं .... इस नाम के साथ कवि पन्त ने अपनी अभिप्सित कामना भी मेरे नाम की ----

'अपने उर की सौरभ से
जग का आँगन भर देना ...'


आह्लादित मन सुकुमार कवि से आज भी पूछता है उनके ही शब्दों में---

'बाँध दिए क्यूँ प्राण प्राणों से
तुमने चिर अनजान प्राणों से ..

गोपन रह न सकेगी
अब यह मर्म कथा
प्राणों की न रुकेगी
बढ़ती विरह व्यथा
विवश फूटते गान प्राणों से

बाँध दिए क्यूँ प्राण प्राणों से
तुमने चिर अनजान प्राणों से ..

यह विदेह प्राणों का बंधन
अंतर्ज्वाला में तपता तन
मुग्ध हृदय सौन्दर्य ज्योति को
दग्ध कामना करता अर्पण
नहीं चाहता जो कुछ भी आदान प्राणों से

बाँध दिए क्यूँ प्राण प्राणों से
तुमने चिर अनजान प्राणों से ..'

और प्रकृति का एक नन्हा कोमल अंश बन मैं ही जवाब देती हूँ - 


बाँधा न होता प्राणों से प्राण 
तो रिश्ते रह जाते अनजान 
खून के रिश्ते गोपन रह भी जाएँ - सम्भव है 
आत्मा से बने रिश्ते गीत बन प्रकृत हो उठते हैं 
 विनाश के बाद भी प्रकृति में सुवासित होते हैं 

सूर्य रथ पर तुमने मुझे बिठाया है - पंछियों को जगाने का सिलसिला खत्म नहीं होगा 
पंत की बेटी सरस्वती की गोद में उतरी पंत की रश्मि प्रकृति का मान रखेगी - युगों तक !!!


8 टिप्‍पणियां:

  1. मधुर स्मृति ,मधुर अभिव्यक्क्ति !
    नई पोस्ट आम आदमी !
    नई पोस्ट लघु कथा

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  2. वाह दी.....
    आप निश्चित रूप से बडभागी हैं |
    और आपकी ये सुन्दर दक्षिणा पाकर कवि ह्रदय भी झूम उठा होगा .

    सादर
    अनु

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  3. तपस्वियों के अर्घ्य में
    ब्रह्ममुहूर्त की वेदी पर
    मैं प्रातः संगीत की तरह
    तुम्हारे लिए एकलव्य बन गई ---शानदार अभिव्यक्ति गहन अर्थ लिए .बधाई आपको

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  4. यादों के झरोखे से निशब्द करती बहुत उत्कृष्ट अभिव्यक्ति....

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  5. यादों के झरोखे से निशब्द करती बहुत उत्कृष्ट अभिव्यक्ति....

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  6. अत्यंत सुन्दर अभिव्यक्ति सचमुच शब्ददान दे बढ़कर कौन दक्षिणा हो सकती है भला एक शब्दशिल्पी के लिए . .. अनुकरणीय भाव . नमस्कार स्वीकार करें

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