बुधवार, 23 जनवरी 2013

वस्त्र???? जब युग के हिसाब से पुरूष के बदल गये तो स्त्री पर क्यो वही पाँच हजार साल पुरानी वेशवूषा का दबाब???



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एक बयान आया है
""""स्वछन्दचारि­ णी बनोगी?? बनो"""""
मुझे आपकी मानसिकता से
कुछ भी नहीं लेना देना
ये मेरा अपना सवाल नहीं
एक ज्वलंत प्रश्न है
WHO IS THE REAL WOMEN OF
MEN????
भय?????
रेप का भय???
गंदी निगाहों का भय???
घरेलू हिंसा का भय???
दहेज हत्या का भय???
प्रेमी या पति द्वारा नापसंद
कर दिये जाने का भय
कन्या होकर अपमानित
रहने
या गर्भ में मार दिये जाने
का भय?????
What do mean by
स्वछन्दचारिणी
????????????????????
एक युग था वैदिक युग
विश्व
वारी घोषा लोपामुद्रा गार्गी सिकता
पुरुष सभा में जातीं और
शास्त्रार्थ करतीं थी
फिर
आक्रमणकारी आये
और भारत
जौहर की आग में जल उठा
लेकिन
स्वतंत्र भारत
में फिर
नारी की आजादी वापस
नही आयी
नारी पुरूष तब एक जैसे वस्त्र
पहनते थे
एक जैसे जेवर
एक समान सांपत्तिक हक थे
फिर पुरुष के वेश भूषा में
बदलाव आया
और
कामकाज में सुविधा के
लिये
सिलाई
कीउपलब्धि आसान होने
ये
पुरूष के वस्त्र सरल और केश
छोटे हो गये
वैसे ही जैसे
दूसरे धर्म में सलवार
कुर्ता जनानी मरदानी दोनो की पोशाक
थी
युग
और कार्य तो स्त्री के
भी बदले ????
वेश
क्यों नहीं बदलना चाहिये
अगर
जूड़ा चोटी कड़ा छड़ा कुंडल
धोती अंगोछा
आज भी """भारतीय
नर""""'"पहने तो कहे
"भारतीय नारी पहन
साड़ी बढा चोटी
मैं करूँगा तेरी रक्षा
तेरे नाज नखरे मैं उठाउँगा
तू चैन से सज धज मेले मैं झूल
बच्चे जन
मैं करूगाँ तेरे लिये हवामहल
तैयार
????
चरिर्त् वान् रहूँगा
कभी परायी नार
परायी दौलत पर नजरर
नहीं डालूँगा
तुम बस सज धज के बैठो
मैं हूँ ना
लेकिन ऐसा नहींहै
As hightcourt criminal lawyer
मुझे उन कहानियों के सच
मालूम हैं
जब औरत घर चलाती मार
खाती
और
दीन धरम के नाम पर
अन्याय सहती
आज किरण बेदी के वस्त्र
ही भारतीय नारी के
रोल मॉडल हहै
पसंद औऱ जरूरत दो अलग
शब्दहैं
खेत में धान रोपती औऱत
साड़ी का कछोटा बना लेती है
जो मिनी स्कर्ट से
ज्यादा  नही होता ....

सुधा राजे 

7 टिप्‍पणियां:

  1. bilkul sahi sawal uthaya gaya hai...............aakhir kyon mahilao ko hi nischit dayre me rahna pade

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  2. पसंद औऱ जरूरत दो अलग
    शब्दहैं
    खेत में धान रोपती औऱत
    साड़ी का कछोटा बना लेती है
    जो मिनी स्कर्ट से
    ज्यादा नही होता ....sahi kahaa aapne

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  3. सार्थक और विचारणीय पोस्ट....

    आभार
    अनु

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  4. इस रचना के तो बड़े-बड़े बैनर बनाने चाहिए और पुरे देश के ,
    हर गली-चौराहे पर लगनी चाहिए !!

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  5. बहुत सही !! सोचने की ज़रुरत है ज़माने को।।!

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  6. bilkul sahi prashn hai....par samjhta kaun hai in baton ko

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