गुरुवार, 24 जनवरी 2013

कितना चलूँ ...




अपनी प्रतिभा,
अपनी योग्यता सिद्ध
करने के लिए
और कितने इम्तहान
देने होंगे मुझे !............. यही सोचते हुए सोती हूँ ! पर जब नींद नहीं आती तो अलादीन का चिराग जल लेती हम ख़्वाबों के अँधेरे में,सिन्ड्रेला बनकर लाल परी से मिलती हूँ, कर्ण बनकर सो जाती हूँ .... 

                              रश्मि प्रभा 



अब तो राह की धूल भी
पैरों के लगातार चलने से
पुँछ सी गयी है ,
और कच्ची पगडंडी पर
ज़मीन में सख्ती से
दबे नुकीले पत्थर
तलवों को घायल कर
लहू से लाल हो चले हैं !
एक निष्प्राण होती जा रही
प्राणवान देह का
इस तरह बिना रुके
चलते ही जाने का मंज़र
हवायें भी दम साधे
देख रही हैं !
मैं चल रही हूँ
चलती ही जा रही हूँ
क्योंकि संसार की झंझा में
रुकने के लिए कहीं कोई
ठौर नहीं है !
अपनी प्रतिभा,
अपनी योग्यता सिद्ध
करने के लिए
और कितने इम्तहान
देने होंगे मुझे !
छोटी सी ज़िंदगी के
थोड़े से दिन
सुख से जी लेने की
चाहना के लिए 
और कितनी बार
इस तरह मरना होगा मुझे !
हाँ ! लेकिन मुझे तो
तिल-तिल कर
हर रोज़ इसी तरह  
मरना ही होगा   
मुझे मिसाल जो बनना है
आने वाली पीढ़ियों के लिए !
इसलिये खुद के जीवन में
चाहे अमावस का अँधियारा
चहुँ ओर पसरा हो 
दीपक की तरह
स्वयं को जला कर मुझे
तुम्हारे लिए तो
राह रौशन करनी ही होगी !
ताकि तुम्हारे लिए
यह सफ़र आसान हो जाये !
और जब तुम
पीछे मुड़ कर देखो
तुम्हें अपने सिर पर
मेरे हाथों का मृदुल
स्पर्श मिल सके
और तुम्हारे
आशंकाओं से व्यग्र
भयभीत ह्रदय को
अपना भार हल्का
करने के लिये
मेरी ममता भरी
बाहों का संबल
मिल सके !
तुम निश्चिन्त हो
अपनी राह चलती जाना
मैं हूँ तुम्हारे पीछे
तुम्हें सम्हालने के लिए,
तुम्हारे साथ
तुम्हारा हाथ थामे
हर कदम पर
तुम्हें आश्वस्त करने के लिए,
तुम्हारे आगे
तुम्हें रास्ता दिखाने के लिए
ये जो राह पर
रक्त रंजित
पैरों के निशान  
तुम देख रही हो  
वो मेरे ही पैरों के तो हैं
मुझे मिली हो या न मिली हो
तुम्हें अपनी मंजिल
ज़रूर मिलेगी !
क्योंकि मैं आदि काल से
ऐसे ही चलती जा रही हूँ और
अनंत काल तक यूँ ही
चलती रहूँगी !
जब तक तुम न रुकोगी
मेरे पैर चाहे कितने भी
लहूलुहान हो जायें
वे भी ऐसे ही चलते रहेंगे
आखिर मुझे तुम्हारी
हिफाज़त जो करनी है !

साधना वैद  
http://sudhinama.blogspot.in/
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7 टिप्‍पणियां:

  1. achchhi rachna ..satat sanghrsh karte rahne ki shikh dene vaali .. क्योंकि मैं आदि काल से
    ऐसे ही चलती जा रही हूँ और
    अनंत काल तक यूँ ही
    चलती रहूँगी !
    जब तक तुम न रुकोगी
    मेरे पैर चाहे कितने भी
    लहूलुहान हो जायें
    वे भी ऐसे ही चलते रहेंगे
    आखिर मुझे तुम्हारी
    हिफाज़त जो करनी है !

    साधना वैद

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  2. तुम निश्चिन्त हो
    अपनी राह चलती जाना
    मैं हूँ तुम्हारे पीछे
    तुम्हें सम्हालने के लिए,
    तुम्हारे साथ
    तुम्हारा हाथ थामे
    हर कदम पर
    तुम्हें आश्वस्त करने के लिए,
    तुम्हारे आगे
    तुम्हें रास्ता दिखाने के लिए
    ये जो राह पर
    रक्त रंजित
    पैरों के निशान
    तुम देख रही हो
    वो मेरे ही पैरों के तो हैं
    मुझे मिली हो या न मिली हो
    तुम्हें अपनी मंजिल
    ज़रूर मिलेगी !
    माँ के मन की पीड़ा तथा उत्कट इच्छा को व्यक्त करती हुई कविता -अति सुन्दर
    New post कृष्ण तुम मोडर्न बन जाओ !

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  3. bahut bahut acchi rachna.....aisa bandha hai laga ki are khatam bhi ho gaya....aisi hi hoti hai stri...

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  4. बहुत बढ़िया..सुन्दर रचना

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  5. बहुत-बहुत धन्यवाद रश्मिप्रभा जी मेरी रचना को इस ब्लॉग का हिस्सा बनाने के लिए ! बहुत अच्छा लगता है जब मेरी कोई रचना आपको छू लेती है ! आभारी हूँ आपकी !

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