बुधवार, 19 जून 2013

मेरी नज़र से कुछ मील के पत्थर - 2 )



शब्दों को ओस में भिगोकर ईश्वर ने सबकी हथेलियों में रखे .... कुछ बर्फ हो गए,कुछ नदी बन जीवन के प्रश्नों की प्यास बुझाने लगे .................. शब्दों की कुछ नदियाँ, कुछ सागर मेरी नज़र से = 


“हे भगवान! इस चप्पल को इसी समय टूटना था! अभी कितने काम पड़े हैं और आस-पास कोई मोची भी नहीं.”
”मैं हूँ ना! बोलो क्या करना है, चप्पल मरम्मत करवा दूँ या नई दिलवा दूँ?”
”तुम तो ऐसे कह रहे हो जैसे अलादीन का जिन्न तुम्हारा हुक्म बजा लाने को तैयार हो!”
”बन्दा किसी जिन्न से कम है क्या! वो देखो सामने चप्पलों की दुकान है. चलकर नयी ले लेते हैं ना!”
”सुनील! प्लीज़ तुम तो रहने ही दो, मैं ले लूंगी.”
कहती हुई अंजना बाटा की दुकान में दाखिल हो गयी और अपने लिये चप्पल पसन्द करने लगी. एक चप्पल उसे पसन्द आई, थोड़ी ऊँची हील की अच्छी चप्पल थी. उसने चप्पल पैरों में डाली और सामने लगे आईने में देखने लगी. पैरों से नज़र हटी भी नहीं थी कि उसने देखा, आईने में सुनील नाक सिकोड़े उसके पीछे ही खड़ा था.
“तुम यहाँ भी चले आए, मेरे पीछे-पीछे. मुझे पता था कि तुम्हें ये हील पसन्द नहीं आयेगी.”
”.....”
”ओफ्फोह बाबा! अब ये अपनी नाक सिकोड़ना बन्द करो. मैं वो वाली ले लेती हूँ... और सुनो, अभी मेरे पास पैसे हैं, इसलिये तुम्हें पेमेण्ट करने की ज़रूरत नहीं.”
अंजना ने टूटी चप्पल डिब्बे में बन्द करवाई और नई चप्पल पहनकर दुकान से बाहर निकल गई.

सुनील के पागलपन की ये इन्तिहाँ थी कि वो साये की तरह अंजना के साथ लगा रहता था. अब चाहे खुशी चाहे ग़म, हमेशा उसके साथ. अंजना भी याद करती थी वे दिन, जब सुनील की पोस्टिंग कोलकाता में थी. उसके बग़ैर लगता था कि वो एक कदम नहीं बढा सकती. ख़ुद को कितना बेसहारा महसूस करती थी. इतनी बड़ी दुनिया में ऐसा लगता था कि जैसे वो खो जायेगी. तब तो कई मौकों पर वो महसूस करती कि काश अभी सुनील यहाँ होता तो मेरा ये काम कितनी आसानी से हो गया होता.

और उसके उलट आज तो ये हाल है कि वो साये की तरह अंजना के पीछे रहता है. न नौकरी है उसके पास, न कोई काम. बस सारे दिन अंजना के साथ लगा रहता है. अभी उसी रोज़ की तो बात है. डॉक्टर ने मना किया था अंजना को ठण्डी चीज़ें खाने से. फिर भी बाज़ार में उसने आइसक्रीम ख़रीदी और बस एक स्कूप मुँह में डाला ही था कि न जाने कहाँ से सुनील उसके सामने आकर खड़ा हो गया और लगभग चीख़ते हुये बोला, “पकड़ लिया! अभी टौंसिल का दर्द गया नहीं और तुमने आइसक्रीम खाना शुरू कर दिया! तुमने क्या सोचा था कि मुझे पता नहीं चलेगा!”

सुनील ने यह बात इतनी ज़ोर से और अचानक कही कि अंजना के हाथ से आइसक्रीम का प्याला गिरते-गिरते बचा. उसने गुस्से और खीझ से भरकर जवाब दिया, “मेरा दर्द ख़तम हो गया है तभी तो खा रही हूँ और डॉक्टर के कहने से क्या होता है. दो चम्मच आइसक्रीम खाने से मैं मर नहीं जाउंगी!”
”ठीक है! मैं बेकार ही तुम्हारे और आइसक्रीम के बीच आया. खा लो. कहो तो एक बड़ा सा बटर-स्कॉच और मंगवा दूँ. तुम्हारा फेवरिट फ्लेवर!!”
”अब ताने मत मारो. लो मैं नहीं खाती.”

और जब तक सुनील कुछ जवाब देता, उसने पूरा कप गार्बेज-बिन में डाल दिया. आस-पास खड़े लोग अजीब सी नज़रों से उसे देख रहे थे, मगर तब तक वो दुकान से निकल गयी.
घर लौटते समय, उसने बिजली की दुकान से बल्ब खरीदा.
“ये बल्ब क्यों ख़रीद रही हो तुम?”
”आज रात आलू-बल्ब की सब्जी बनाऊँगी.... बालकनी का बल्ब फ्यूज़ हो रखा है चार दिन से. स्ट्रीट लाइट की रोशनी से कब तक काम चलाऊँ. वहाँ बैठकर पढाई भी नहीं कर पाती.”
“अरे हाँ! मैं भी जब तुम्हें दूर से देखने की कोशिश करता हूँ तो तुम्हारा चेहरा साफ़ नज़र नहीं आता. सी.एफ.एल. ले लो ना, बिजली भी बचाए और चेहरा साफ़ नज़र आये!”
“अगली बार!”

अंजना घर के दरवाज़े तक पहुँच गयी. उसने कंधे की ओट से सुनील को देखा और ‘बाय’ कहकर अंदर चली गयी. उसे लगा सुनील उसे देख रहा होगा छिपकर, इसलिए सबसे पहले वह बालकनी में बल्ब लगाने लगी. ऊंचे वाले स्टूल को उसने होल्डर के नीचे फर्श पर रखा और संभलकर स्टूल पर चढ़ गयी. पंजे उचकाकर जैसे ही वो बल्ब होल्डर में लगाने लगी कि उसका बैलेंस बिगड गया, उसकी साँस रुक गयी और धडाम से ज़मीन पर गिरने ही वाली थी कि सुनील की बाहों ने उसे थाम लिया.

“तुम्हें क्या लगा था कि मैं दरवाज़े से लौट गया. मैं तुम्हारे पीछे-पीछे दबे पाँव अंदर आ गया था, मुझे पता था कि तुम फिसलने वाली हो. और मैं तुम्हें कैसे गिरने देता!”
“ओह सुनील! तुम्हें गुज़रे, कितने साल हो गए. अब तो मैंने हिसाब रखना भी बंद कर दिया. तुम्हारे दोनों बच्चों को बड़ा करना, उन्हें पढ़ा लिखाकर उनके पैरों पर खडा होने के काबिल बनाना, उनकी शादी, उनका घर बसाना... और अब अकेले कितने काम करने पड़ते हैं मुझे.”
“मैं जानता हूँ, देखता जो रहता हूँ तुम्हें. तुम्हारे साथ-साथ, तुम्हारे पीछे-पीछे!”
“लोग कहते हैं कि अंजना इतनी हिम्मत कैसे जुटा लेती है तू. अकेली औरत और इतनी बड़ी दुनिया... तुम्हें पता है, कहाँ से जुटाती हूँ मैं ये हौसला और हिम्मत?”
“कहाँ से!”
“तुमसे... जब तुम कोलकाता में थे, तब मुझे लगता था कि मैं अकेली हूँ, तुम नहीं मेरे साथ. लेकिन अब तो लगता है कि मैं एक मिनट को भी अकेली नहीं.”
“कभी डर नहीं लगता तुम्हें!”
नहीं. डर लगते ही कानों में तुम्हारी आवाज़ गूंजने लगती है. मैं हूँ ना!”

सलिल वर्मा 

चला बिहारी ब्लॉगर बनने





बनूं तो क्या बनूं और आखिर क्यों बनूं?
बना इंसान तो नाहक मैं मारा जाऊंगा।

बना राम तो बनवास चला जाऊंगा
लक्ष्मण बन गया तो शक्ति सह पाऊंगा?
सीता बनी तो अग्नि परीक्षा होगी।
कैकेयी बनी तो भरत विमुख हो जायेगा
बना दशरथ तो पुत्र शोक सहना होगा।
उर्मिला बनी तो राह ताकनी होगी
रावण बना तो दसशीश बन पाऊंगा?

बनूं तो क्या बनूं और आखिर क्यों बनूं?
बना इंसान तो नाहक मैं मारा जाऊंगा।

कृष्‍ण बना तो महाभारत रचना होगा।
धृतराष्‍ट्र बना तो अंधा हो जाऊंगा।
गांधारी बनी तो पट्टियां बांधनी होंगी
कुन्ती बनी तो करन पाना होगा।
करण बना तो सारथी सूत कहलाऊंगा
भीष्‍म बना तो शर सेज ही पाऊंगा
बना अर्जुन तो स्वजन हत पाऊंगा?

बनूं तो क्या बनूं और आखिर क्यों बनूं?
बना इंसान तो नाहक मैं मारा जाऊंगा।


बना बुद्ध तो यातना सह पाऊंगा?
यशोधरा बनी तो राहुल पालना होगा।
लक्ष्मी बनी तो तलवार उठानी होगी।
आजाद बना तो खुद को मारना होगा।
बना भगत जो फांसी चढ़ पाऊंगा?
और जो बना गांधी गोली झेल पाऊंगा?

बनूं तो क्या बनूं और आखिर क्यों बनूं?
बना इंसान तो नाहक मैं मारा जाऊंगा।

रमाकांत सिंह 

ज़रूरत





मै क्या हू .....?
मै क्या सोचती हू ?
मै क्या चाहती हू ?
खुद नहीं जानती ........
क्या पाना ,क्या खोना
मेरे लिए सब एक सा है ..
क्यूकि इस दिल से उम्मीद ....
शब्द ही मिट चुका है|
कभी सोचू.........ऐसा करू ,
कभी सोचू ...मै वैसा करू
ऐसे और वैसे के चक्रव्हिहू में ,
कभी कुछ नहीं किया |
कभी सोचू अपने लिए
थोडा सा तो जी लू
फिर सोचा .....वो क्या कहेगा
ये क्या कहेगा . ..सब क्या कहेगे
इसी सोच में , अपने लिए जीना ही छोड़ दिया |
कभी देश की हालत पे गंभीर हो लेती हू ,
पर दूसरे ही पल ...सब लोगो संग हस देती हू
ये सोच की ...सिर्फ मेरे सोचने भर से क्या होगा ,
मै क्या बोलू और क्या ना बोलू ..
कभी सोचा ही नहीं .....
मै क्या हू .....?

अंजू चौधरी 

अपनों का साथ



मेरी यात्रा जारी है .... अगले मोड़ पर और हैं नायाब पत्थर तराशे हुए = इंतज़ार कीजिये 

14 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस निरंतर यात्रा की हम भी है ...आभार आप का रश्मि दी

    उत्तर देंहटाएं
  2. मेरी इतनी पुरानी कविता को भी आपने स्थान दिया,उस समय जब मुझे हिंदी में टाइप करना भी नहीं आता था .......आभार दी

    उत्तर देंहटाएं
  3. रश्मि प्रभा जी सादर प्रणाम आपने **बनूँ तो क्या बनूँ ** को आपने सम्मान दिया मैं आजीवन आपका आभारी रचनाएँ मेरे जीवन की अभिव्यक्ति हैं आपका ऋणी रमाकांत सिंह १९ जून २०१३

    उत्तर देंहटाएं
  4. सलिल दा,अंजू,और रमाकांत जी तीनों को नियमित रूप से पढ़ती हूँ....

    बहुत अच्छा लगा उनकी रचनाओं को पढ़ कर.

    आभार रश्मि दी.

    सादर
    अनु

    उत्तर देंहटाएं
  5. वाकई मील का पत्थर ....सभी रचनाएं ....सलिल जी ,रमाकांत जी और अंजू जी ...बधाई ....
    आभार रश्मि दी ...

    उत्तर देंहटाएं
  6. दी जिस तरह से आप एक एक रचनाकार को संजो रही हैं और पढवा रही हैं किन लफ़्ज़ों में शुक्रिया अदा करूँ …………मेरे लिये तो आप ही सबसे बडी मील का पत्थर हैं जो छुपे हीरों को तराश कर उनसे पहचान करा रही हैं………आभार

    उत्तर देंहटाएं
  7. तीनों ही रचनाएं काफी सुन्दर
    सादर!

    उत्तर देंहटाएं
  8. बिहारी सलिल उन प्यारे लोगों में से एक हैं जिनकी कलम को पढ़कर सुकून महसूस होता है कि हिंदी ब्लोगिंग टाइम पास करने के लिए नहीं बल्कि साहित्य सत्संग के लिए भी मनोहर स्थान है !

    उत्तर देंहटाएं
  9. गुरु रमाकांत सिंह को पढना हमेशा सुखदायी और तृप्तिकारक रहा है ..

    स्नेही और मधुर अनु की रचनाओं में ईमानदारी , दिल को छूने में समर्थ है !

    उत्तर देंहटाएं
  10. एक के बाद एक परेशानियों ने ऐसा घेर रखा है कि दीं दुनिया से बेखबर हो गया हूँ दीदी!! इस पोस्ट की सूचना मुझे आज एक महीने बाद मिली.. रमाकांत जी और अनु जी के साथ मुझे स्थान देकर आपने मुझे सम्मानित किया है.. धन्यवाद भी नहीं कह सकता.. छोटा जो हूँ!!

    उत्तर देंहटाएं