सोमवार, 5 मई 2014

अपने देश के नौजवान क्रुद्ध हैं



सच है, यौवन चलता सदा गर्व से 
सिर ताने , शर खींचे  … 
और सच ये भी है कि 
यौवन के उच्छल प्रवाह को
देख मौन , मन मारे
सहमी हुई बुद्धि रहती है
निश्छल खड़ी  किनारे | (रामधारी सिंह दिनकर)   


पर, वर्षों से अपने देश के नौजवान क्रुद्ध हैं 
अपने देश की जो है परम्परा - उससे वे रुष्ट और क्षुब्ध हैं  …… एक गहरी दृष्टि ज्योति खरे जी  की मेरी नज़र से 


सृजनात्मकता के अभाव में 
मौत के पहले मर जाएगा युवा----jyoti-khare.blogspot.in

युवा वर्ग आज के संदर्भ में सबसे ज्यादा चर्चित वर्ग है. यह वर्ग बुजुर्ग और किशोरों के 
बीच का वर्ग है. अगर पढ़ रहा है तो कालेज का छात्र, अगर नहीं पढ़ रहा है तो बेरोजगार
युवा वर्ग की आयु का भी आंकलन लगाना मुश्किल है.युवा वर्ग की परिभाषा बताना भी
मुश्किल है,युवा वर्ग वही है जो सम्पूर्ण आदमी नहीं है.आज का युवा वर्ग अपने आप में
प्रश्न है,इस प्रश्न को सुलझाने का प्रयास करना भी असंभव है.

देश की गिरती शाख,राजनीति की निम्नतम स्थिति,सेल्यूलाईड का क्रेज,फैशन का बढ़ता
चलन,युवा वर्ग को सृजनशील बनाने की अपेक्षा उसकी मनःस्थिति को अधकचरा संस्कृति 
और आधुनिकवाद की तरफ ले जाने में सक्रिय है.युवा वर्ग पिस्टल,चाकू,तलवार,तेज़ाब 
से डरता नहीं है बल्कि चौबीसों पहर इनसे खेलता रहता है.यह फिल्मों से निकली संस्कृति 
को "फालो" करता है,फैशन के रंग में रंगना चाहता है और "बाईक" में बैठकर अपनी छोटी 
सी जिंदगी नापना चाहता है.
आज का युवा विश्वविद्यालय कैम्पस में नारे लगता है,हड़तालें करता है,युवा नेता बनना 
चाहता है,संजय दत्त स्टाईल बाल रखता है,फ़िल्मी कलाकार इसके आदर्श हैं,लड़कियों 
को छेड़ना शौक में शुमार है,बलात्कार करना "पैशन" है इसका,यह समाज के लिए समस्या 
बन गया है,अपने नैतिक स्तर से गिर ही नहीं रहा,सामाजिक स्तर से भी गिर गया है.
यह शिक्षा पद्धति के दोषपूर्ण होने का परिणाम है.यह शिक्षा पद्धति ना तो पूरी तरह भारतीय 
और ना पूरी तरह पाश्चात्य. 
ठीक इसके विपरीत भारतीय सभ्यता और संस्कृति अपना बुनियादी मापदंड खोती जा रही 
है. समाज एकलवादी परंपरा में विश्वाश रखने लगा है,लोग अपनों को ही खुशबूदार "स्प्रे"
छिड़कते हैं.संस्कृति पलायनवादी पगडंडी पर चल पड़ी है.विश्वविद्यालय उच्चादर्शों और 
अत्याधुनिक प्रयोगात्मक विधियों से समाहित शिक्षा का प्रसार चला रहा है.फिर भी तीस 
प्रतिशत ही विद्यार्थी सही मायने में शिक्षा ग्रहण कर पाता है.बचे हुए सत्तर प्रतिशत का 
युवाओं का क्या होता है "यही वह बात है जहां आकर पूरी सामाजिक राजनैतिक और 
नैतिक अव्यवस्था मौन हो जाती है" यह अव्यवस्था ही वह मीठा जहर है जो युवाओं को
मार रही है.
प्रकृति प्रतिकूलता,जमाने का दोष,कलयुग का दौर,भाग्य का चक्र आदि कारण बता कर   
को समझाया ही जा सकता है. पर यह समाधान नहीं है युवा समस्या का, राजनीति,धनशक्ति युवाओं के मानस पटल पर भीतर तक घर कर गयी है जो भटकाव का कारण है.राजनीती के ग्लेमर में रह के युवा अपने आप को "कलफ"किए हुए कुर्ते के समान दिखना पसंद करता है,पूंजीवादी मानसिकता को ओढ़ना चाहता है,पर जब "रहीस' और "नेता" बनने कि कोशिश चरमरा जाती है,तो वह अपराधिक प्रव्रत्ति का होने लगता है.अपने मानसिक विकास को सृजनात्मक द्रष्टिकोण से नहीं देखता बल्कि वह अपने स्तर से गिरा पाता है,जनमानस
भी इससे अछूता नहीं है,जनमानस भी इसका दोषी है.
जिस स्थिति के लिए समाज युवा वर्ग को दोषी ठहरता है, वही समाज अच्छी से अच्छी
प्रतिभायें भी उत्पन्न करता है.आज का समाज आधुनिकवाद का शिकार हो गया है.
ऐसे में वह एक साफसुथरी विचारधारा को क्या जन्म देगा,जिस समाज ने या इससे जुड़े 
थोड़े से ही लोगों ने किसी वैचारिक विचारधारा का अध्ययन,मनन किया है तो निःसंदेह 
ऐसे समाज से प्रतिभा संपन्न युवा सामने आऐ हैं,जिंन्होंने समाज,देश और शहर का 
नाम रौशन किया है.साफ सुथरे व्यक्तित्व का जन्म पैदाइशी नहीं होता,इसे बनाया 
जाता है,इसके बनने,संवरने की प्रक्रिया बड़ी जटिल है और जटिल है हमारा सृजनात्मक 
सोच से जुड़ना.
युवा अपने आप में पूर्ण समर्थ है.इनमे अनंत सम्भवनायें हैं,इनका प्रतिभा संपन्न होना 
स्वयं और समाज पर निर्भर है.परिस्थितियों को दोषी ठहराना तर्कसंगत नहीं है,वास्तविक 
कारण ढूढ़ना तथ्य कि जड़ तक पहुंचना ही निष्कर्ष है.समकालीन दौर कि सबसे चर्चित 
समस्या है युवाओं कि कि स्थितियों को बदलना,इसकी आवश्यकता अब ज्यादा महसूस
होने लगी है.अब युवाओं के भटकाव के मूल कारणों की तह तक पहुंचना पड़ेगा,अन्यथा 
सूखते मुरझाये पेड़ को हार बनाने के लिए पत्ते सींचने और जड़ की उपेक्षा करने जैसी 
गलती होती रहेगी.
साहित्य एक ऐसी परंपरा है जो अपने आप में एक विशेष स्थान रखती है,युवाओं का
साहित्य से जुड़ना नितांत आवश्यक है.इससे स्वस्थ मानसिकता का जन्म होता है.
नये नये पहलुओं का अध्ययन होता है,बेवाक अपनी बात उजागर करने की क्षमता पैदा 
होती है. युवाओं को इस पारदर्शी विचारधारा से जोड़ने का काम  पुरानी पीढ़ी ही कर सकती
है. सामाजिक संस्थायें,संगीत विद्यालय, नाट्यसंघ,लेखक संघ इस दिशा में भी 
बहुत अच्छे प्रयास कर सकते हैं.
नयी पीढ़ी को अब नये सिरे से,नये सृजनशील वातावरण में लाना ही पुराणी पीढ़ी का 
दायित्व होना चाहिए, नहीं तो युवा वर्ग अपनी मौत से पेहलेय मर जायेगा. 

14 टिप्‍पणियां:

  1. कुशिक्षा और अपनी संस्कृति से दूरी ने युवा को दिग्भ्रमित कर दिया है। इस गिरावट को रोकने की पहल तो परिवार से ही हो सकती है। शिक्षा-संस्थानों और समाज को भी इसमें योगदान देना जरूरी है। मेरे ख्याल में राजनैतिक परिवेश को भी सुधारना जरूरी है क्यूंकि समाज इससे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता।
    बहुत सुंदर गहन और विचारोत्तेजक आलेख

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  2. साहित्य एक ऐसी परंपरा है जो अपने आप में एक विशेष स्थान रखती है,युवाओं का
    साहित्य से जुड़ना नितांत आवश्यक है.इससे स्वस्थ मानसिकता का जन्म होता है.
    नये नये पहलुओं का अध्ययन होता है,बेवाक अपनी बात उजागर करने की क्षमता पैदा
    होती है. युवाओं को इस पारदर्शी विचारधारा से जोड़ने का काम पुरानी पीढ़ी ही कर सकती
    है............... बिल्‍कुल सच, सार्थकता लिये सशक्‍त प्रस्‍तुति

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  3. बिल्‍कुल सच कहा..सार्थक प्रस्तुति

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  4. आदरणीया दीदी सादर प्रणाम,आपने मेरे आलेख को एक नयी दिशा दे दी है---
    बहुत बहुत आभार आपका

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  5. नयी पीढ़ी को अब नये सिरे से,नये सृजनशील वातावरण में लाना ही पुराणी पीढ़ी का
    दायित्व होना चाहिए.....
    ............................सार्थकता लिये सशक्‍त प्रस्‍तुति........

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  6. सामाजिक पूर्वाग्रह, शारीरिक, श्रम को निकृष्ट समझना और साहित्य की अवहेलना मेरी दृष्टि इस पतन के में मुख्य कारण हैंl सार्थक प्रस्तुति के लिये आपका आभार l

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  7. खूबसूरत सन्देश देती हुई सार्थक पोस्ट ..... साधुवाद आपको .... सचमुच युवाओं की ऊर्जा का दोहन सकारात्मक दिशा में कर लिया जाये ... उसके भीतर रचनात्मक और सांस्कृतिक अलख जगाई जाये ... तो पूरे समाज को एक नई दिशा मिलेगी ....

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  8. आज सारा समाज, माता -पिता अपने बच्चों को पैसे कमाने की मशीन बनाने को आमादा हैं। साहित्य -संगीत , नाटक से लगाव-जुड़ाव को पहले भी बच्चों के बिगड़ने का लक्षण माना जाता रहा है, जबकि याही वे माध्यम हैँ जींस समाज एक सार्थक दिशा पाता रहा है,किन्तु फिर भी लोगों की सोच कभी सकारात्मक नहीँ हुई। यही वे माध्यम हैं जो मनुष्य को सही मायने मेन मनुष्य बनाते हैं। आज तो स्थितियां और भी भयावह होती जा रहीं हैं। आज पड़ोस क्या, देश क्या परिवार मेँ हीं भावनात्मक लगाव का स्थान अर्थ लेता जा रहा है। साहित्य ही वह एक मात्र चीज़ है जो हमें सबसे जोड़ने का काम कर सकता है। लेकिन आज रास्ता दिनों दिन ओझल हीं होता जा रहा है। यह तब तक संभव नहीं जब तक माता-पिता बच्चों को मनुष्य बनाने की न सोंचें। आपकी चिंता बहुत महत्वपूर्ण है।

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  9. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन सीट ब्लेट पहनो और दुआ ले लो - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  10. सादुवाद ... सार्थक प्रस्तुति ... साहित्य और समाज कभी एक दुसरे से विलुप्त/अनजान नहीं रहे ...

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  11. सुन्दर और समसामयिक लेख....प्रस्तुत लेख ने दिनकर जी की कविता आग की भीख की याद दिला दी....धुंधली हुई दिशाएँ छाने लगा कुहासा...कुचली हुई शिखा से आने लगा धुंआ सा...कोई मुझे बता डे क्या आज हो रहा है..मुंह को छिपा तिमिर में क्यों तेज रो रहा है....पठान पाठन हमें सदैव सन्मार्ग दिखाता है और प्रेरित करता है सही दिशा के चुनाव की और...आपका अच्छे साहित्य के अध्ययन का सुझाव सराहनीय है...

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