शुक्रवार, 8 जून 2012

आस्था



वह
इतराती, इठलाती, बल खाती
पत्थरों से केलि करती
पहाड़ी नदी थी
ज़ो पावस में और भी शरारती हो उठती थी
और बदल देती थी अपना मार्ग.
बहती थी ...नये-नये रास्तों से
करती थी चुहुल...मौन खड़े वृक्षों से.
चलती थी .......निर्भीक यौवना सी.
लुटाती थी सदर्प -
पूंजी अपने सौन्दर्य की ......और बिखेरती थी हास
अपने आसपास.

पहाड़ी नदी नें
इस बार भी बदल दिया अपना मार्ग .....और ......
छूकर खिलखिला पड़ी ......अपने रास्ते में खड़े गौरवशाली बरगद को.
अपनी आस्थाओं में रचा-बसा वर्षों पुराना बरगद ...
देखता रहा चुपचाप.
नदी
बहती रही ....पूरी बरसात भर
....बरगद की जड़ों से मिट्टी बहाती हुई,
.....गहरी और पुष्ट जड़ों से परिहास करती हुई,
........बरगद को अपने साथ बहा ले जाने की जिद करती हुई
नदी बहती रही .......पूरी बरसात भर.
बूढा बरगद
खड़ा रहा चुपचाप .....
उसकी जड़ें गहराई तक धसी हुईं थीं ........आस्था की धरती में.
वह केवल उन्हीं को सहलाता रहा ...बड़े प्यार से
आसमान में सिर उठाये
और सहता रहा ......अपने चिकने-चमकीले पत्तों पर
प्रवासियों की बीट.
सहता रहा.....झुकी हुई शाखाओं के टूटने की पीड़ा....
बिना किसी परिवाद के.
किसी नें साथ नहीं दिया उसका .
किन्तु नदी
न तो ले जा सकी बरगद को अपने साथ
न ठहर सकी उसके पास
बल्कि छोड़ गयी .....
सूखी और आँखों में चुभने वाली ...तपती रेत
अपने आसपास.
अंततः ........संस्कृति जीत गयी
और हार गईं मेरे शहर की
सारी विज्ञापन बालाएं.
बेचारी .........
पहाड़ी नदी !


कौशलेन्द्र

3 टिप्‍पणियां:

  1. अंततः ........संस्कृति जीत गयी
    और हार गईं मेरे शहर की
    सारी विज्ञापन बालाएं.

    .....बहुत गहन और सार्थक अभिव्यक्ति...आभार

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  2. न तो ले जा सकी बरगद को अपने साथ
    न ठहर सकी उसके पास
    बल्कि छोड़ गयी .....
    सूखी और आँखों में चुभने वाली ...तपती रेत
    अपने आसपास.
    गहन भाव लिये उत्‍कृष्‍ट लेखन ...

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  3. बरगद को अपने साथ बहा ले जाने की(बेबुनियाद)जिद करती हुई
    अंततः ........संस्कृति जीत गयी....जो होनी निश्चित थी
    सार्थक अभिव्यक्ति.... !! उत्‍कृष्‍ट रचना .... !!

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