शनिवार, 23 जून 2012

अजनबी / दीप्ति नवल




अजनबी रास्तों पर
पैदल चलें
कुछ न कहें

अपनी-अपनी तन्हाइयाँ लिए
सवालों के दायरों से निकलकर
रिवाज़ों की सरहदों के परे
हम यूँ ही साथ चलते रहें
कुछ न कहें
चलो दूर तक

तुम अपने माजी का
कोई ज़िक्र न छेड़ो
मैं भूली हुई
कोई नज़्म न दोहराऊँ
तुम कौन हो
मैं क्या हूँ
इन सब बातों को
बस, रहने दें

चलो दूर तक
अजनबी रास्तों पर पैदल चलें।


दीप्ति नवल

12 टिप्‍पणियां:

  1. चलो दूर तक
    अजनबी रास्तों पर पैदल चलें।
    ... bahut khub...
    pahlee baar Dipti naval jee ko aapke karan padh pa raha hoon ... dhanyawad:)

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  2. जो हुआ था कल
    उसे भूल जाओ
    थोड़ा मैं आगे चलूँ
    थोडा तुम आगे चलो

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  3. इन सब बातों को
    बस, रहने दें
    चलो दूर तक
    अजनबी रास्तों पर पैदल चलें।
    चयन और अभिव्‍यक्ति दोनो ही उत्‍कृष्‍ट ... आभार आपका

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  4. चलो दूर तक
    अजनबी रास्तों पर पैदल चलें।

    दीप्ति जी को पढ़ना सुखद लगा...आभार !!

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  5. बहुत सुन्दर और भाव प्रवण्।

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  6. mujhe kavutaaon ka shauk deepti naval jee se hi laga......unhe padh kar hee kavitaaon kee or rujhaan hua...

    bahut sundar

    anu

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  7. जो हुआ था कल
    उसे भूल जाओ
    थोड़ा मैं आगे चलूँ
    थोडा तुम आगे चलो


    बहुत सुन्दर भाव

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  8. तुम अपने माजी का
    कोई ज़िक्र न छेड़ो
    मैं भूली हुई
    कोई नज़्म न दोहराऊँ
    यहाँ तक पहुँचाने के लिए ,
    आभार आपका रश्मि जी .... !!

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