शनिवार, 29 मार्च 2014

ज्ञातव्य




वन्दना अवस्थी दुबे, जो कहती हैं अपने बारे में 
कुछ खास नहीं....वक्त के साथ चलने की कोशिश कर रही हूं.........वक़्त के साथ चलने का ही एक अनुभव है कहानी - ज्ञातव्य  .... 

"अरे वाह साहब! ऐसा कैसे हो सकता है भला!! इतनी रात तो आपको यहीं हो गई, और अब आप घर जाके खाना क्यों खायेंगे?"
’देखिये शर्मा जी, खाना तो घर में बना ही होगा। फिर वो बरबाद होगा।’
’लेकिन यहां भी तो खाना तैयार ही है। खाना तो अब आप यहीं खायेंगे।’
पापा पुरोहित जी को आग्रह्पूर्वक रोक रहे थे। हद करते हैं पापा! रात के दस बज रहे हैं, और अब यदि पुरोहित जी खाना खायेंगे तो नये सिरे से तैयारी नहीं करनी होगी? और फिर इतनी ठंड!! पता नहीं पापा क्यों मां से बिना पूछे ही क्यों लोगो को आये दिन खाने पर जबरन रोक लेते हैं! ये पुरोहित जी तो आये दिन! कहा नहीं कि जल्दी से खाने पर बैठ जाते हैं! अगर वे ही सख्ती से मना कर दें तो......
’राजू......ओ राजू........’
’ऐ राजू भैया, सो गये क्या?’
’हां’
’अच्छा!! हां कह रहे हो और सो भी गये हो? पापा बुला रहे हैं, सुनाई नहीं दे रहा?’
’तुम सुन रही हो ना! तो बस तुम्हीं चली जाओ। मैं तो तंग आ गया पापा की इन आदतों से।’
सर्दियों में रज़ाई छोडना बडा कठिन काम होता है, शायद इसीलिये राजू भैया बिस्तर में घुसने के बाद अब उठना नहीं चाह रहे थे।
’ राजू..... अन्नू कोई सुन रहे हो.....?’
’ आई पापा........ ।’ आखिरकार उठना मुझे ही पडा था।
’अन्नू बेटा ज़रा जल्दी से पुरोहित अंकल के लिये खाना तो लगा दो।’
इतना गुस्सा आया था पुरोहित जी पर! मना करने के लिये मुंह में ज़ुबान ही नहीं है जैसे! लेकिन कर क्या सकती थी? बस मन में ही भुनभुनाती अंदर चली आई। मां रसोई में सब समेटने के बाद अब पापा के आदेश पर असमंजस में बैठी थी।इन पुरोहित जी के किस्मत तो देखो... केवल एक कटोरी पालक की सब्जी बची है! और कुछ भी नहीं! घर की बात हो तो अलग, अब किसी गैर को केवल पालक रोटी तो नहीं दी जा सकती न!! दही भी खत्म।
’मम्मा...जो है वही दे दो। कुछ बनाना मत।’
’ नहीं बेटा ऐसा खाना दूंगी तो अपनी ही तो नाक कटेगी। चार जगह कहते फिरेंगे......’
’मतलब बनाओगी?? तुम लोगों की इसी मेहमान नवाज़ी से तो......’
पैर पटकती कमरे में आ गई।
’अन्नू, क्या आदेश हुआ पापा का?’
’होगा क्या? वही खाना खिलाओ।’ हमेशा ही ज्यों-ज्यों रात गहराती जाती है, त्यों-त्यों पापा का खाना खिलाने का विचार भी गहराता जाता है। सोचते नहीं कि बच्चों को दिक्कत होगी। अरे तुम्हें क्या हो गया? आंखे फाड-फाड के क्या देख रहे हो?’
’तुम्हारे वश का तो कुछ है नहीं, सिवाय चिडचिडाने के अच्छा हो कि तुम मम्मी की मदद करो।’
’तुम्हारे पापा भी हद करते हैं....’ मम्मी भी कमरे में आ गईं थीं।
’तो क्या हुआ मम्मा... पापा का होटल तो हमेशा ही खुला रहता है, तुम्हारे जैसा बिना मुंह का कुक जो है उनके पास।’ राजू भैया रज़ाई में घुसे-घुसे भाषण दे रहे थे। उनका क्या! ऐसे रज़ाई में घुस कर तो मैं भी बढिया भाषण दे सकती हूं। मेरी जगह रसोई में मम्मी के साथ काम करवायें तो जानूं! देर होती देख पापा भी अंदर आ गये थे-
’क्यों खाना नहीं है क्या?’
’ये अब पूछ रहे हैं आप? मान लीजिये खाना नहीं है, तब? किसी को ज़बर्दस्ती रोकने की क्या ज़रूरत है?’
’तुम लोग तो बस बहस करने लगते हो। मैं उन्हें ज़बर्दस्ती क्यों रोकूंगा भला? मैंने तो बस एक बार कहा था( वाह पापा!! क्या झूठ बोला है!)।
’चलो... अब मैं कुछ बनाती हूं।’ ’अरे तुम कुछ बनाओ मत, जो है सो दे दो’ कह कर पापा फिर चले गये। मम्मी आटा गूंध रहीं थीं, मालूम है, पूडियां बनेंगीं इतनी रात को गरमागरम पूडियां खाने के बाद कोई क्यों ना रुके? ज़रूरत है तो बस रोकने की। एक बार ठंडा खाना परोस तो दें....लेकिन नहीं अपनी नाक बचाये रखने के लिये सब करना होगा। अभी सब्जी भी बनेगी....ये मम्मी-पापा भी ना! दिल खोल कर खर्च करेंगे, और फिर घर के बेहिसाब खर्चों के लिये रोयेंगे भी। जब देखो तब मेहमान-नवाज़ी.... आज वैसे भी महीने की पच्चीस तारीख है। महीने का अंत तो वैसे भी बहुत तंग होता है किसी भी ऐसे व्यक्ति के लिये, जो शुद्ध वेतन में शाही तरीके से रहना चाहता हो। हमारा घर भी उन्हीं में शुमार है।
ठंडे पानी से हाथ धोते ही सारा शरीर कांपने लगा था, मेरे हर एक कंपन में से पुरोहित जी के लिये चुनिंदा गालियां निकल रहीं थीं। आनन-फानन मम्मी ने शानदार डिनर तैयार कर दिया था। खाना खिलाते-खिलाते साढे ग्यारह हो गये थे।
अपनी पोजीशन बनाये रखने के लिये इस तरह खर्चक रना मुझे और राजू भैया दोनों को ही सख्त नापसंद था। खर्च करते समय तो ये दोनों ही बिना सोचे-समझे खर्च करते हैं फिर बजट गडबडा जाने पर एक दूसरे को दोष देते हैं। खैर...... फिर भी घर की गाडी चलती रहती है। लेकिन इधर मैं और भैया दोनों ही पापा के खर्च करने के तरीके से नाखुश थे, लिहाजा पापा ने भैया को घर चलाने की ज़िम्मेदारी सौंप दी है। राजू भैया ने भी चैलेंज किया है कि वे इतने ही पैसों में बेहतर व्यवस्था करेंगे।
बडी ज़िम्मेदारी थी....अब दिन के खाली समय में हम दोनों महीने के हिसाब का ही जोड बिठाते रहते।
’देख अन्नू, ये पापा की तनख्वाह के अट्ठारह हज़ार रुपये हैं.... और ये हैं दूध, बिजली, राशन सब्जी, फल, धोबी, पेपर, बाई, टेलीफोन के बिल.......’
’हूं.....’ मैं पत्रिका से सिर नहीं हटना चाह रही थी....
’ अब हिसाब की शुरुआत कैसे करें?’
’हूं......’
’क्या हूं-हूं लगा रखी है। मैं यहां सिर खपा रहा हूं और तुम..... चलो इधर।’
किसी प्रकार बजट बना। सारे खर्चे निकालने के बाद केवल दो हज़ार रुपये हमारी बचत में थे, जिनसे कोई भी फुटकर खर्च होना था।यानि हम लोगों का जेबखर्च नदारद!! दूसरे खर्चे ज़्यादा ज़रूरी हैं!!
राजू भैया इस लम्बे-चौडे खर्चे को देख कर बडे दुखी थे।
’यार अन्नू ,मुझे तो कुछ रुपये चाहिये ही। एकदम खाली जेब कैसे रह सकता हूं?’
’तो तुम सौ रुपये ले लो। लेकिन तब सौ ही मैं भी लूंगी। मेरे खर्चे नहीं हैं क्या?’
उसी शाम भैया ने अपना फरमान ज़ारी किया था,खर्चों में कटौती बावत। नया बजट!एसा बजट तो वित्त-मंत्रालय भी पेश नहीं करता होगा! कोई उधारी नहीं...सब कैश पर। हर आदेश पर मम्मी-पापा ने सिर हिला के सहमति जताई। सारी कटौतियां शिरोधार्य कीं।
महीना थोडी सी तंगी के साथ गुज़रा था। अब हमारे यहां आये दिन मिठाई-पार्टियां नहीं होती थीं। आने-जाने वालों को चाय-चिप्स में ही प्रसन्न होना पडता था। इससे हमें एक बडा फायदा ये हुआ कि केवल प्लेट से प्रेम रखने वालों का आना-जाना एकदम कम हो गया। पापा भी अब ज़रूरी होने पर ही लोगों को खाने पर रोकते थे, वो भी हमलोगों को बताकर। लेकिन खर्च हमारे पास आ जाने के कारण हम लोगों की हालत खस्ता हो गई थी। कारण? अब हम किसी भी चीज़ की ज़िद कर ही नहीं सकते थे!! पूरा खर्च हमारे पास था। यदि कहते भी तो पापा बडे आराम से कह देते पैसे तो तुम्हारे पास ही हैं, जो चाहो ले लो। लेकिन बजट था कि कुछ अतिरिक्त खर्च की अनुमति ही नहीं देता था। इसी बीच राजू भैया का एम।ई। के लिये सेलेक्शन हो गया। बहुत खुश थे भैया। दो साल बाद शानदार नौकरी..... पापा-मम्मी ने उनसे नये कपडे बनवा लेने को कहा था। चलो इसी बहाने मेरा भी एक सूट तो बन ही जायेगा...
राजू भैया अपना सामान लगा रहे थे, और मैं सोच रही थी कि कल उन्हें जाना है और अभी तक वे नये कपडे तो लाये ही नहीं। तभी उन्होंने मदद के लिये मुझे बुलाया- दौड के पहुंची, देख कर दंग रह गई कि कहीं भी जाने से पहले हमेशा नये कपडे खरीदने वाले राजू भैया, आज सारे पुराने कपडे खुद से प्रेस करके लगा रहे हैं।
’भैया नये कपडे क्यों नहीं लाये?’
नहीं यार! अभी ज़रूरत ही नहीं थी। ’
क्या कह रहे हो भैया? तुम और ये पुराने कपडे???
’ अन्नू, हम लोग कर्ज़ से लदे रहने के लिये हमेशा मम्मी-पापा को दोष देते थे, अपने आपको, अपनी आदतों को देखते तक नहीं थे। अपनी इस तनख्वाह में पापा घर चलाते या हमारी बडी-बडी फ़रमाइशे पूरी करते! उधार कपडे और अन्य सामान शायद वे इसीलिये लेते थे ताकि हमारी ज़रूरतें पूरी होती रहें। हमलोगों को अपनी चादर की लम्बाई तो अब मालूम हुई है,जब्कि खुद ओढ कर देखी। और पहली बार मैने जाना कि राजू भैया इतने गंभीर भी हो सकते हैं। शायद बडे हो गये हैं।

वंदना अवस्थी दुबे 
http://wwwvandanaadubey.blogspot.in/

8 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत शुक्रिया रश्मि दी...यहां स्थान देने के लिये.

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  2. बहुत ही सच ......बहुत सुंदर कहानी ..या सत्य के बहुत करीब ...

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  3. जब कन्धों पर बोझ आता है तब उसके भार का अहसास होता है....बहुत सुन्दर कहानी..

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  4. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन मैं भी नेता बन जाऊं - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  5. कहानी कहाँ ये एक बहुत बड़ी सच्चाई भी है ।

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  6. वाह ,
    जवाब नहीं वंदना जी का ! मंगलकामनाएं उन्हें, आभार आपका !

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