सोमवार, 10 सितंबर 2012

' अर्धनारीश्वर '

अर्धनारीश्वर आधे पुरुष ,आधी स्त्री का ही द्योतक नहीं . विवाह यज्ञ के बाद यदि यही मान्य होता हो तो सती को शक्ति रूप लेने में कई जन्म नहीं लेने पड़ते .
सती का भस्म होना , पार्वती से पार्वती का मत्स्य कन्या होना ......... इसका उदाहरण है . पुरुष कठोरता का प्रतीक है, स्त्री कोमलता का - पुरुष अपनी कर्मठता से
अन्न धन लाता है, स्त्री अन्नपूर्णा होती है यानि अन्न को खाने योग्य बनाकर एक पूर्णता का संचार करती है , धन के सही इस्तेमाल से घर की रूपरेखा बनाती है
और बचत करती है . समय की माँग हो तो स्त्री को पुरुष सी कठोरता अपनानी होती है , पुरुष को कोमलता - अर्धनारीश्वर सही अर्थ तभी पाता है . शिव ने तंत्र
शिक्षा से पार्वती को शक्ति का स्रोत दिया , जिसे पाने के लिए आम लिप्साओं को मुक्त करना था .
यह अर्थ यदि पूर्ण न हो तो अर्धनारीश्वर की भूमिका नहीं होती , न उस विवाह का कोई अर्थ होता है . मनुष्य को संबंध विच्छेद की स्थिति से गुजरना होता है , ईश्वर
ने कई जन्म लिए . यदि ईश्वर ने जन्मों का सहारा न लिया होता तो आदिशक्ति का जन्म नहीं होता , न अर्धनारीश्वर का तेज विनाश से बचाने में सहायक होता . मनुष्य
जब जबरन इसे ढोता है तो दोषारोपण , हिंसा के मार्ग बनते हैं . एक समाज को कारण बना कई जीवन बर्बाद हो जाते हैं और सारे व्रत त्योहारों के बाद भी उस संबंध के
कोई मायने नहीं होते .
विवाहित होते एक पुरुष में पिता एक स्त्री में माँ रूप का प्रस्फुटन होता है , पिता को जगतपिता होना चाहिए सोच से , माँ को जगतमाता - फिर सारे दृष्टिकोण सहज, स्थिर
होते हैं . आसुरी प्रवृति से जूझने के लिए संबंधों की इसी गहराई को समझना होगा कि पुरुष में शिव भाव हो स्त्री में शक्ति का , क्योंकि शिव के बिना शक्ति का अथवा शक्ति
के बिना शिव का कोई अस्तित्व ही नहीं है। शिव अकर्ता हैं। वो संकल्प मात्र करते हैं; शक्ति संकल्प सिद्धी करती हैं।

रश्मि प्रभा

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प्रियंका राठौर



' अर्धनारीश्वर '

आदि अनादि कालों से
पौराणिक अपौराणिक गाथाओं से
'अर्धनारीश्वर ' संज्ञा की होती है पुष्टि
क्या है अर्थ इस शब्द का ?
निर्मित किया ब्रह्म ने
दो चेतन पिण्डों को
दिया एक नाम नारी का
और दूजा पुरुष का !
नारी कोमल सुकोमलांगी
पुरुष बलिष्ठ कठोर !
था पुरुष निर्मम भावशून्य
नष्ट कर देता किसी जड़ या चेतन को
बिना किसी अवसाद के !
तथापि थी नारी
भावप्रधान ममतामयी मूरत
स्रष्टि के कण - कण को
अपने कोमल स्पर्श से
सिक्त करना ही थी उसकी नियति !
देखा ब्रहम ने
दो परस्पर विरोधी स्वरूप
सोचा -
नारी दे रही जीवन
और कर रहा पुरुष नष्ट
उसकी रचित नव निर्मित स्रष्टि को !
संतुलित करने के लिए
करें क्या उपाय -
उसी क्षण अचानक
बोला अचेतन मन ब्रहम का
करो ऐसी रचना
जो सम्मिश्रण हो नारी पुरुष गुण का !
उपाय तो श्रेष्ठ था
पर थी समस्या एक
नारी पुरुष थे अलग - अलग पिण्ड
फिर उनका एक रूपांतरण
हो कैसे संभव
युक्ति सूझी उन्हें एक
बांध दिया उन्हें
एक दाम्पत्य बंधन में !
हल निकल आया
ब्रहम की समस्या का !
नारी के कोमल भाव
व पौरुषत्व पुरुष का
पोषक होंगें स्रष्टि के !
यही संकल्पना थी
' अर्धनारीश्वर ' की !
आधे भाव नारी के
आधी शक्ति पुरुष की
मिलाकर बनी एक
अलौकिक रचना
होकर दोनों में तादात्म्य स्थापित
अर्थ ज्ञात हुआ
सही विवाह बंधन का ,
भिन्न - भिन्न दो रूप
हुए जब एक
मिल गया नव जीवन
स्रष्टि को
एक अटल सत्य के साथ .....!!!

11 टिप्‍पणियां:

  1. अर्धनारीश्वर का बेहद खूबसूरत चित्रण्।

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  2. सशक्‍त लेखन ... बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति .. आभार इसे पढ़वाने के लिए

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति.....
    बधाई प्रियंका जी को..
    आभार रश्मि दी.

    अनु

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  4. सशक्‍त, खूबसूरत अभिव्यक्ति..आभार

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  5. अर्द्धनारीश्वर , गहन चिंतन -सुन्दर अभिव्यक्ति

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  6. नारी के कोमल भाव
    व पौरुषत्व पुरुष का
    पोषक होंगें स्रष्टि के !
    यही संकल्पना थी
    अर्धनारीश्वर की !

    उत्कृष्ट कविता।
    नई भावभूमि पर सुंदर सृजन।

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  7. dhanybaad mausi ji ... meri rachna ko is manch par lane ke liye ....aabhar

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  8. dhanybaad mausi ji ... meri rachna ko is khoobsurat manch par lane ke liye ... aabhar

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