मंगलवार, 4 सितंबर 2012

तुम्हारे बिन


सुमति


ये दिन
दरख्तों की तरह ,
हिलते नहीं मुझ से
ये घड़ियाँ भी
तुम्हारे बिन
ठहर जाने की जिद मे हैं

फलक पर रात भर तारे
तुम्हारी बात करते हैं

उनकी फुसफुसाहट ही
मुझे सोने नहीं देते

मैं हर पल में परेशां हूँ
परेशां है हर एक लम्हां

वहीँ पर है जहाँ पर थी
तुम्हारे बिन कज़ा मेरी

बुलालूं पास उसको या कि
उस तक दौड़ कर पहुंचूं

मगर बेहिस दरख्तों कि तरह
ये जिंदगी मेरी ...

कि मुझ से तू नहीं मिलता
....कि मुझ से दिन नहीं हिलता

7 टिप्‍पणियां:

  1. ये दिन
    दरख्तों की तरह ,
    हिलते नहीं मुझ से
    ये घड़ियाँ भी
    तुम्हारे बिन
    ठहर जाने की जिद मे हैं
    वाह ... बेहतरीन अभिव्‍यक्ति
    आभार

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  2. बहुत सुंदर ...की मुझसे तू नही मिलता ...की मुझ से दिन नही मिलता

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  3. बहुत सुंदर ...की मुझसे तू नही मिलता ...की मुझ से दिन नही मिलता

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  4. वाह...!

    कि मुझ से तू नहीं मिलता
    ....कि मुझ से दिन नहीं हिलता............बहुत सुंदर

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  5. मैं हर पल में परेशां हूँ
    परेशां है हर एक लम्हां :(

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  6. वाह वाह.....
    बेहतरीन कविता.......दिल ने चाहा कि काश खत्म ही न होती...

    अनु

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