शुक्रवार, 7 सितंबर 2012

वापसी





सुशील कुमार


योग-मुद्रा
जी उठा हूँ फिर से उर्जस्वित होकर
साँस की प्राण-वायु अपनी रग-रग में भरकर
स्वयं का संधान कर स्वयं में अंतर्लीन होकर

यह प्रयाण जरूरी था मेरे लिये –
न कोई रंग न कोई हब-गब
जीवन सादा पर सक्रिय है यहाँ
दैनिक क्रियाएँ सरल हैं
स्वर जैसे थम गया हो
हृदय-वीणा के तार जैसे यकायक
तनावमुक्त हो झनझनाकर स्थिर हुए हों

पर सकल आलाप अब शांत है
नीरवता में इस दिनांत की साँझ-वेला में
कोई थिर स्वर उतर रहा है काया के नि:शब्द प्रेम-कुटीर में
अंतर्तम विकसित हो रहा है चित्त स्पंदित हो रहा है
धवल उज्ज्वल आलोक-सा छा रहा है घट के अंदर
कोई सिरज रहा है मुझे फिर से
सचमुच मैं जाग रहा हूँ धीरे-धीरे नवजीवन के विहान में

वहाँ जिनसे मुझे प्रेम मिला था
वह मुझे अपने पास बाँधकर रखना चाहते थे
पर अब अनुभव हो रहा है मुझे -
जड़ता से बचने के लिए, निजता को बचाने के लिये
उनकी दुनिया से अपनी दुनिया मेँ वापस लौटने का मेरा निर्णय सही था |

9 टिप्‍पणियां:

  1. वहाँ जिनसे मुझे प्रेम मिला था
    वह मुझे अपने पास बाँधकर रखना चाहते थे
    पर अब अनुभव हो रहा है मुझे -
    जड़ता से बचने के लिए, निजता को बचाने के लिये
    उनकी दुनिया से अपनी दुनिया मेँ वापस लौटने का मेरा निर्णय सही था |

    बहुत ही गहन और सटीक है ये बात ......अति सुन्दर ।

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  2. वहाँ जिनसे मुझे प्रेम मिला था
    वह मुझे अपने पास बाँधकर रखना चाहते थे
    पर अब अनुभव हो रहा है मुझे -
    जड़ता से बचने के लिए, निजता को बचाने के लिये
    उनकी दुनिया से अपनी दुनिया मेँ वापस लौटने का मेरा निर्णय सही था |
    बहुत खूब .... !!

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  3. गहन भाव लिए सशक्‍त लेखन ... आभार इस प्रस्‍तुति के लिए

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  4. बहुत ही गहन,सुन्दर और सटीक....

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  5. वहाँ जिनसे मुझे प्रेम मिला था
    वह मुझे अपने पास बाँधकर रखना चाहते थे
    पर अब अनुभव हो रहा है मुझे -
    जड़ता से बचने के लिए, निजता को बचाने के लिये
    उनकी दुनिया से अपनी दुनिया मेँ वापस लौटने का मेरा निर्णय सही था.
    ati sundar

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  6. उनकी दुनिया और अपनी दुनिया में जब तक भेद रहेगा तब तक वह खींचती ही रहेगी...

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