शुक्रवार, 24 अगस्त 2012

क्यूँ बने सती-सावित्री जब सत्यवान कहीं नहीं...






पूरी ज़िंदगी हम लड़कियों को ये कह कर पाला जाता है कि दूसरे के घर जाना है ये करो...ये मत करो...कभी कुछ गलती हो जाए तो भी यही सुनने मिलता है...कल को दूसरे घर जाएगी तो वहाँ सब कहेंगे माँ-बाप ने नहीं सिखाया...खाना बनाना आना चाहिए,घर के काम आने चाहिए,पढ़ाई-लिखाई तो ठीक है लेकिन सिलाई-कढ़ाई मे भी निपुण रहो...कोई कुछ भी कह दे कभी पलट कर जवाब मत दो...हर बड़े का आदर करो चाहे वो कैसा भी हो...पूजा-पाठ मे लगे रहो..मेहमान चाहे कितना भी बेशर्म हो उसके साथ अच्छी तरह पेश आओ...एक तरह से दुनिया भर की सारे गुण तुम्हारे अंदर होने चाहिए और इसी तरह हमारे सीरियल्स की हीरोइनों को भी दिखाया जाता है क्यूंकी हमारी नज़र मे शायद एक अच्छी बेटी और बहू का पैमाना ही ये है...

और हम बस इस पैमाने पर खरे उतरने के लिए सारी ज़िंदगी कोशिश मे लगी रहती हैं...इस उधेड्बुन मे कि क्या सही है क्या गलत...हम कभी ज़िंदगी जी ही नहीं पाते...और कई बार अपनी कोशिशों मे गलत साबित होते हैं...गलतियाँ करते हैं...दुखी होते हैं पश्चाताप होता है कि अब तक जो अच्छी लड़की का रूप सबके सामने आया था...वो कहीं मिट तो नहीं गया...और फिर उसे वापस पाने की जद्दोजहद शुरू हो जाती है...इस तरह जब ज़िंदगी के वो सारे पल निकल जाते हैं जिन्हे हमें जीना था...अपने परिवार के साथ...और जब दूसरे घर जाने का असली वक़्त आता है ऐसे समय मे हम क्या चाहते हैं...?सालों परिवार के साथ रहकर जिस ट्रेनिंग से गुजरते हुये अपनी ज़िंदगी काटी...उसे भूलकर कुछ दिन तो खुलकर जीने मिले न जाने आने वाला समय कैसा हो...न जाने वो लोग कैसे होंगे...कम से कम इन कुछ दिनों को तो अपने परिवार के साथ खुलकर जी लें...जहां न तो पहले वाली बन्दिशें हों न आने वाले दिनों का डर...पर शायद कुछ ही लोग होते हैं जो इन पलों को भी इस तरह जी पाते हैं क्यूंकी इन दिनों मे जब हम अपनों का साथ और उनका स्नेह चाहते हैं हमें मिलती है हर पल सलाह...जाने वाले घर मे कैसे व्यवहार करना है...कैसे रहना है...तो क्या हमारे अपने परिवार को सिर्फ उस दूसरे घर की फिक्र होती है जहां हम जाने वाले है...उन्हे क्यूँ लगता है कि उनकी बेटी किसी दूसरे घर मे सिर्फ तभी खुश रह सकती है जब वो उनके लिए हर पल काम करे या अच्छा खाना बनाकर खिलाये...

क्यूँ नहीं वो ये सोचते कि जब वो दूसरे घर के लड़के को अपने घर के हिसाब से नहीं बदलना चाहते,वैसे ही वो भी इनकी बेटी को जैसी वो है वैसे ही अपनाए...क्यूँ हम लड़की के लिए ज्यादा से ज्यादा गुण बताना चाहते हैं...हर एक का अपना गुण होता है और मैंने आजतक किसी ऐसे को नहीं देखा जिसमे सिर्फ गुण हों...उन्होने तो अपने लड़के को कभी नहीं टोका...पर आपने तो अपनी लड़की को कभी अपने मन से एक कदम भी नहीं उठाने दिया...जबकि आपको तो अपनी लड़की के पैदा होते साथ ही ये पता था कि वो हर वक़्त आपके साथ नहीं रहेगी..फिर तो उसे और भी खुलकर जीने देना चाहिए...मैं ये नहीं कहती कि उसका मार्गदर्शन नहीं करना चाहिए...लेकिन सिर्फ एक लड़की होने के कारण उसके लिए एक अलग नज़रिया अपनाना सरासर गलत है...

आज आपके कहे अनुसार चलती है...कल दूसरे घर जाकर उनके हिसाब से चलेगी....तो वो वक़्त कब आएगा जब वो अपने मन की करेगी,जब वो बिना किसी रोकटोक की फिक्र किए खुलकर जिएगी...क्या कभी ऐसा कोई पल उसकी ज़िंदगी मे आएगा...?

अपनी ज़िंदगी से खुद के लिए दो पल निकालना कइयों के लिए इतना मुश्किल होगा...सोचा ना था....

नेहा
मैं ख़ुद को पानी की तरह मानती हूँ....सबके साथ मिल जाना मेरी प्रकृति है...बावजूद इसके मेरा अपना एक वजूद है...जो निरंतर प्रगतिशील है.....

17 टिप्‍पणियां:

  1. वो वक़्त कब आएगा जब वो अपने मन की करेगी,जब वो बिना किसी रोकटोक की फिक्र किए खुलकर जिएगी...
    बिल्‍कुल सही कहा है ... सार्थकता लिए सटीक प्रस्‍तुति ... आभार आपका

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  2. "अपनी ज़िंदगी से खुद के लिए दो पल निकालना कइयों के लिए इतना मुश्किल होगा...सोचा ना था...."

    ये कडवी सच्चाई है! बहुत ही सुन्दर और सार्थक प्रस्तुति!

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  3. Ek ek shabd zindgi ki sachhai btata hua... Aj v bahut aisi ladkiya h jo ghar me ye tamam baaten jhelti h aur bahar me khud ko free kahti h.. Shayad ye dar ki koi unhe pichhri mansikta ka na samajh le...

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  4. सुन्दर आलेख है........पर तस्वीर का दूसरा रुख भी है की हर परिवार भी अपनी बेटी का भला चाहता है तभी हिदायत करता है इसकी एक वजह समाज में घटित होता हुआ सत्य भी है लड़कियों को अधिक छूट देने के दुष्परिणाम भी बहुत सामने आते ही रहते हैं अक्सर ।

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    1. इमरान जी...आपकी बात बिलकुल सही है...लेकिन हर सिक्के के दो पहलू होते हैं...जजरूरी नहीं है कि छुट देने पर ही दुष्परिणाम देखने मिलते हैं...बहुत सी ऐसी घटनाएँ भी हमारे सामने हैं जहां छूट न मिलने वाली लड़कियों ने ही मनमानी के चक्कर मे अपना भविष्य बिगाड़ा और छूट मिलने वाली लड़कियां समाज मे प्रतिष्ठा पाकर अपने परिवार का नाम ऊंचा करती हैं...तो ये कहना कहीं भी सही नहीं है कि कोई लड़की छूट मिलने पर गलत फाइदा उठाएगी और बंधन मे नहीं...ये सिर्फ संस्कार और सोच पर ही निर्भर करता है कि कोई अपना जीवन कैसे जीता है...

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    2. इमरान जी...ये कहना सरासर गलत होगा कि लड़कियों को अधिक छूट देने के दुष्परिणाम भी बहुत सामने आते ही रहते हैं अक्सर...यहाँ सिर्फ लड़कियां ही नहीं लड़कों के बिगड़ने का भी मामला हो सकता है...बिगड़ कोई भी सकता है लड़की हो या लड़का...कई ऐसे भी मामले देखे गए हैं जहां घर पर बंधन मे रहने वाली लड़की ने गलत कदम उठाए हैं...जिनसे बचाने के लिए उसे घर मे रखा गया था जबकि परिवार का सहयोग मिलने के कारण एक लड़की समाज मे प्रतिष्ठित पद को प्रपट करती है और अपने परिवार का नाम रोशन करती है...बिगड़ने के लिए छूट या बंधन मैने नहीं रखते....संस्कार और सोच मैने रखती है...

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  5. Ek ek shabd zindgi ki sachhai btata hua... Aj v bahut aisi ladkiya h jo ghar me ye tamam baaten jhelti h aur bahar me khud ko free kahti h.. Shayad ye dar ki koi unhe pichhri mansikta ka na samajh le...

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  6. मेरे ख़याल से बहुत सी लडकियां आज स्वावलंबी हैं और अपने मन का करती हैं ..
    पर आपका कथन भी सही है ..कई घरों में आज भी वही पुराने ज़माने की रीत हैं
    ज़माना बदल रहा है ,जल्द ही समय आएगा ..जब सभी लडकियां अपने मन का कर पाएंगी
    जब माताएं खुद ये जानेंगी की लड़कियों को भी उड़ना है और पंख फ़ैलाने के लिए जगह चाहिए ..

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  7. क्यूँ बने सती-सावित्री जब सत्यवान कहीं नहीं.... ?
    आज आपके कहे अनुसार चलती है...कल दूसरे घर जाकर उनके हिसाब से चलेगी....तो वो वक़्त कब आएगा जब वो अपने मन की करेगी,जब वो बिना किसी रोकटोक की फिक्र किए खुलकर जिएगी...क्या कभी ऐसा कोई पल उसकी ज़िंदगी मे आएगा...?


    अपनी ज़िंदगी से खुद के लिए दो पल निकालना कइयों के लिए इतना मुश्किल होगा...सोचा ना था....

    बिलकुल सच ! बहुत अच्छा लगा !

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  8. स्त्रियों को हर कार्य की वजह देनी पड़ती है , इसके मूल में उनकी सुरक्षा की ही चिंता रही होगी , रूढी के रूप में तो हो तो अवश्य इसका परित्याग करना चाहिए !
    अच्छी रचना !

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  9. अच्छे संस्कार लड़कों में भी डाले जाते हैं...लड़कियों को दूसरे घर जाना होता है इसलिए ज्यादा सिखाया जाता है|

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  10. अपने मन की करना .....कुछ हद तक बदला है .....फिर भी दूसरे घर और तानों का डर हमेशा बना रहता है ....या कहें दिनचर्या में शामिल हो गया वाक्य .....

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  11. धन्यवाद रश्मि जी...अपनी पोस्ट ब्लॉग मे लगाना तो सभी जानते हैं और चाहते हैं लेकिन अपने ब्लॉग मे दूसरों की पोस्ट लाना ये दिलेरी का काम है...जो शायद आप जैसे कुछ लोग ही कर सकते हैं...धन्यवाद

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  12. सार्थक प्रस्‍तुति .....बहुत सुन्दर..

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