गुरुवार, 3 मई 2012

दर्द का रिश्ता...



दर्द का रिश्ता...

(संपादक "श्री अम्बुज शर्मा" के अनुरोध पर -
उन्होंने इस कविता को माँगा था, अपनी पत्रिका "नैन्सी " के लिए (हिन्दी दिवस विशेषांक) )



राष्ट्र कवि दिनकर ने लिखा हैं-
"प्रभु की जिसपर कृपा होती हैं
दर्द उसके दरवाज़े
दस्तक देता हैं....."

पंक्तियों के मर्म की जब परतें खुली,
अंतस के निविड़ अन्धकार मे,
किरणें कौंधी!
मैं अवाक्! निश्चेष्ट !
अप्रतिम छवि को
पलकों मे भरती रही....
भीतर से विगलीत आवाज़ आई -
"दाता तेरी करुणा का जवाब नही"
सहसा महसूस हुआ ,
दर्द का रिश्ता
हमारे अन्दर जीता हैं
दर्द की मार्मिक लय
आस-पास गूंजती हैं
दर्द का कड़वा धुआं ,
साँसों मे घुटन भरता हैं
ओह!
अनदेखा, गुमनाम होकर भी
अन्तर की गहराइयों मे बेबस बैठा
कोई फूट-फूट कर रोता हैं!
रिश्तों की डोर
मेरी आत्मा से बंधी हैं ,
अपना हो या और किसी का -
चाहे - अनचाहे मैं भंवर मे फँस जाती हूँ !
छाती की धुकधुकी बढ़ जाती हैं,
घबरा कर ,
अनदेखे , अनजाने को
बाँहों मे भर कर ,
सिसकियों मे डूब जाती हूँ !
लोग कहते हैं-
मुझे सोचने की बीमारी हैं,
मैं लोगों की बातों का उत्तर
नहीं दे पाती!
अचानक, ये मुझे क्या हो गया हैं,
शायद....
दर्द के इसी रिश्ते को लोग
"विश्व-बंधुत्व " की भावना कहते हैं,
तो देर किस बात की बंधु ?
दो कदम तुम चलो ,
दो कदम हम....
और इसी रिश्ते के नाम पर
पथ बंधु बन जाएँ !
जीवन की डगर को
सहयात्री बन काट लेंगे...
दर्द को हम बाँट लेंगे.....!


सरस्वती प्रसाद
मैं वट-वृक्ष हूँ..तुम नव अंकुर..यही मान जीती हूँ..तेरे हित मैं स्वर्ण पात्र का हलाहल पीती हूँ... कुछ सपने बाकी हैं अपने..जिन्हें हैं पूरा होना..इसके बाद ही इस पंथी को गहरी नींद हैं सोना.. बचपन से मैं अपनी सोच को शब्दों का रूप देती आई... कवि पन्त ने मुझे अपनी बेटी माना...और तभी संकलन निकालने का सुझाव दिया, इस आश्वासन के साथ की भूमिका वे लिखेंगे.. मेरा काव्य -संग्रह "नदी पुकारे सागर" प्रकाशित तो हुआ ... पर मेरे मान्य पिता कवि पन्त इसकी भूमिका नहीं लिख सके पर उनकी अप्रकाशित कविता जो उन्होंने मेरे प्रयाग आगमन पर लिखी थी..इस संकलन में हैं जो भूमिका की भूमिका से बढ़कर हैं...

14 टिप्‍पणियां:

  1. अनदेखे , अनजाने को
    बाँहों मे भर कर ,
    सिसकियों मे डूब जाती हूँ !
    लोग कहते हैं-
    मुझे सोचने की बीमारी हैं,
    मैं लोगों की बातों का उत्तर
    नहीं दे पाती!
    अचानक, ये मुझे क्या हो गया हैं,
    शायद....
    दर्द के इसी रिश्ते को लोग
    "विश्व-बंधुत्व " की भावना कहते हैं,
    मन को छूते हुए इन पंक्तियों के भाव ... कितनी गहनता है हर शब्‍द में ... आपका बहुत-बहुत आभार जो इस रचना को पढ़ने का अवसर दिया ...

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  2. भूमिका तो मानस-पटल पर लिख ही दिया है कवि पन्त ने..हार्दिक शुभकामनाएं...

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  3. अम्माँ का चरण-स्पर्श .... !
    अहो भाग्य मेरा कि मैं इन्हें जानती हूँ .... !
    मेरी क्या औकात कि कोई कमेन्ट दे सकूँ .... !!
    आपका बहुत-बहुत आभार ,जो आपने मुझे इस लेख्य को पढ़ने का मौका दिया .... !!

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  4. जीवन की डगर को
    सहयात्री बन काट लेंगे...
    दर्द को हम बाँट लेंगे.....
    केवल सहयात्री बनाने की ख्वाहिश ही कर सकते हैं

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  5. bahut bahut aabhaar is rachna ko parhwane ke liye...
    Maa ko saadar naman!!!

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  6. दर्द के इसी रिश्ते को लोग
    "विश्व-बंधुत्व " की भावना कहते हैं,

    बहुत ही सार्थक अभिव्यक्ति

    कितना ख़ूबसूरत लिखा है...माँ को नमन

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  7. अम्मा प्रणाम
    अमृत झर रहा है इस रचना से ....
    कई बार पढ़ डाली पर मन तृप्त नहीं हुआ पढ़कर ....!!

    रश्मी दी आपको नए ब्लॉग कि बधाई .....!!हर पल कुछ नया और सार्थक करने कि आपकी सार्थक सोच सृजनात्मकता को नया रूप देती रहती है .....!!
    बहुत बहुत शुभकामनायें आपको .....!!

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  8. बेहतरीन रचना का चयन और यहाँ उपलब्ध हुवी... आपका आभार

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  9. प्रेम के रिश्ते में फिर भी एकाकीपन है मगर बहुत अलग है यह दर्द का रिश्ता , शब्दों का रिश्ता!
    नमन !

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  10. माँ जी की इतनी अनुपम रचना को हम सबके लिये उपलब्ध करा कर आपने बहुत उपकार किया है रश्मिप्रभा जी ! हर शब्द मन को बींधता है और दर्द का एक नया रिश्ता आकार लेता है इसे पढ़ कर ! उन तक मेरा प्रणाम अवश्य प्रषित कीजियेगा ! साभार !

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  11. राष्ट्र कवि दिनकर ने लिखा हैं-
    "प्रभु की जिसपर कृपा होती हैं
    दर्द उसके दरवाज़े
    दस्तक देता हैं....."

    पंक्तियों के मर्म की जब परतें खुली,
    अंतस के निविड़ अन्धकार मे,
    किरणें कौंधी!
    मैं अवाक्! निश्चेष्ट !
    अप्रतिम छवि को
    पलकों मे भरती रही....
    भीतर से विगलीत आवाज़ आई -
    "दाता तेरी करुणा का जवाब नही"

    कितने गहन और सार्थक भावों को संजोया है…………माँ को प्रणाम्………इतनी उत्तम रचना पढवाने के लिये आभार

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  12. bahut sundar dee...........
    bahut pyaari rachna

    anant shubhkaamnaayen.

    anu
    -aaj hum devnaagri mei type nahin kar paa rahe...some technical problem i suppose.
    :-(

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  13. दो कदम तुम चलो ,
    दो कदम हम....
    और इसी रिश्ते के नाम पर
    पथ बंधु बन जाएँ !

    ....कितनी गहन अभिव्यक्ति...एक उत्कृष्ट रचना पढवाने के लिये आभार...

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  14. "दाता तेरी करुणा का जवाब नही"
    सहसा महसूस हुआ ,
    दर्द का रिश्ता
    हमारे अन्दर जीता हैं
    दर्द की मार्मिक लय
    आस-पास गूंजती हैं
    दर्द का कड़वा धुआं ,
    साँसों मे घुटन भरता हैं

    यह दर्द का रिश्ता, शब्दों का रिश्ता!
    गहन अभिव्यक्ति...एक उत्कृष्ट रचना

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