मंगलवार, 22 मई 2012

काम वाली बाई



मेरी काम वाली बाई
सुबह आती है/काम पे
नखरे बहुत बताती है
हफ़्ते दस दिन में
पगार बढाने का
रट्टा लगाती है
साथ में लाती है
4 बच्चे अपने पीछे
जब तक वह बर्तन करती है
तब तक बच्चे हंगामा करते हैं
मजबूरी है हमारी/सहते हैं
दफ़्तर जाने की जल्दी में
हम और मियां रहते हैं
घर का काम अधिक है
इसलिए काम वाली बाई
के नखरे सहते हैं
चाय नास्ता रोटी खाना
खूब मजे उड़ाती है
4 घरों में और जाती है
धड़ल्ले से खूब कमाती है
जिस दिन मेहमान आते हैं
उस दिन छुटटी कर जाती है
तब मेरा पारा चढ जाता है
मन करता है उसे भगा दूँ
मै और मियां मिलके
सारे बर्तन घिसते हैं
काम वाली बाई के कारण
दोनो खटते पिसते हैं।
दो महीने की तनखा
एडवांस में जाती है
काम बताओ तो हमको
आँखे दिखलाती है
यूनियन का रौब जमाती है
इसे भगा दें तो
दूसरी बाई नहीं आती है
ये काम वाली बाई
इठलाती/इतराती है
प्याज के भाव से
अधिक रुलाती है।


सुधा प्रजापति
http://mitteekimahak.blogspot.in/

11 टिप्‍पणियां:

  1. kaam walo ki yuniyan hoti hai kya:)..
    waise hamari kaam wali bhi khub chhutti karti hai,... bahut satati hai:)

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  2. वाह ...बहुत बढि़या प्रस्‍तुति ... आभार आपका

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  3. बहुत खूब...
    चाह कर भी हटाया नहीं जा सकताः)
    आभार!

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  4. बहुत सुन्दर व सटीक मनोभाव

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  5. :-)

    तेरे बिना जिया जाये ना...................बिन तेरे, तेरे बिन...साँसों में सांस आये ना.......

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  6. मन की बातें बोल वाली बात है। कामवाली बाईयों का तो सब जगह एक जैसा ही रवैया है। शहरों में ज्यादा मारा मारी है, पर अब गाँव में भी नहीं मिलती। दो रुपए किलो चावल ने सत्यानाश कर रखा है। बढिया भाव है कविता के। साधुवाद

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  7. ये काम वाली बाई
    इठलाती/इतराती है
    प्याज के भाव से
    अधिक रुलाती है।
    बहुत खूब .... कडवी है ....
    लेकिन सब जगह यही सच है ....

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