मंगलवार, 8 मई 2012

बेवक्त बरसती हैं बारिशें उसकी



खुश्क मिट्टी है
दरारें पड़ चली हैं
आडी टेढ़ी...चौरस लकीरें
यूँ छप गयी हैं
जैसे पहली जमात की
गणित की कॉपी
कदम दर कदम
नंगे पांव
अपने बच्चों की भूख प्यास का
हिसाब करता हूँ
जेठ की दोपहरी सी
तपती है भादों की सांझ
अबके भी नहीं बरसा

नहीं, ऐसा तो नहीं है
के बरसता ही नहीं
पिछले बरस तो खूब बरसा था
फागुन में
जब सरसों पकी खड़ी थी
मेरे खेतों में
और मिट्टी में मिल गया था
एक एक दाना

यूँही बेवक्त बरसती हैं
बारिशें उसकी
और बेवक्त इन खेतों में
सूखा पड़ता है

कोई खुदा से ज़रा कहना
घड़ी अपनी कभी मिलाले
हम किसानों से...!!

11 टिप्‍पणियां:

  1. काश.................
    कि ऐसा हो पाता...............

    सुंदर.

    अनु

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  2. बेवक्त की बरसात से बहुत नुकसान होता है...भगवान की घड़ी भी कभी स्लो कभी फास्ट हो जाती है...अच्छी रचना.

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  3. बहुत सुन्दर ...ब्लॉग पे जाके अन्य गज़ल वगैरह भी पढीं....अच्छी लगीं

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  4. aap ke dwara diye shabdo se har har pankti ko arth mil jata hai.....

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  5. खुदा की रहमतें दीवाने बादल सी हो जाती है कभी जो नहीं जानता किस छत को भिगोये , किस राह से बचे!

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  6. यूँही बेवक्त बरसती हैं
    बारिशें उसकी .... क्यों की वो *ख़ुदा है
    *और
    कोई खुदा से ज़रा कहना
    घड़ी अपनी कभी मिलाले ....
    फिर इन्सान उसे ख़ुदा क्यों माने .... ?

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  7. खुश्क मिट्टी है
    दरारें पड़ चली हैं
    आडी टेढ़ी...चौरस लकीरें
    यूँ छप गयी हैं
    जैसे पहली जमात की
    गणित की कॉपी
    बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति .. आपका बहुत - बहुत आभार इसे पढ़वाने के लिए ।
    कदम दर कदम
    नंगे पांव

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  8. bohot bohot shukriya aapka rashmi ji is kavita ko yahan shumaar karne ke liye....means a lot to me. main nahin aa pati par aap sab ne mujhe yaad rakha....im so lucky :)

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