रविवार, 27 मई 2012

गौरी ग्रसन



क्या शक्ति क्या नारी-मन,
कर में पहन कंचन-कंगन,
है साध रही हर संचित स्वप्न
हर दमन से उत्पन्न उप-रत्न
क्या नहीं सजा नारी कंठमाल?
मणि बना शॊषण का काल ?
क्या नहीं हुई नियति से हार ?
प्रारब्ध बना मुखौटा हर बार
हर मनीषी का मृदु मधुदान,
बिका हाट ,प्रमदा का मान
पाथर हुआ हर पॊर हर पाथ
शुष्क हुआ हर आद्रित साथ
हर संघर्ष सिर्फ नारी की पारी
हर बार बनी श्रृंगारिक सहचारी
न हुआ अंत ,हाला का हाय!
प्रारबध बना कटु पर्याय

स्वाति

5 टिप्‍पणियां:

  1. कहीं पढ़ीं ,नारी = न+अरि = जिसका कोई दुश्मन न हो .... सही....
    फिर ऐसा क्यों .....
    न हुआ अंत ,हाला का हाय!
    प्रारबध बना कटु पर्याय .....

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  2. भाव अभिव्यंजना को पंख लग गए हैं .. बढ़िया प्रस्तुति है .... .कृपया यहाँ भी पधारें -
    रविवार, 27 मई 2012
    ईस्वी सन ३३ ,३ अप्रेल को लटकाया गया था ईसा मसीह
    .
    ram ram bhai
    को सूली पर
    http://veerubhai1947.blogspot.in/
    तथा यहाँ भी -
    चालीस साल बाद उसे इल्म हुआ वह औरत है

    http://kabirakhadabazarmein.blogspot.in/

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  3. बहुत सुंदर कविता । मेरे नए पोस्ट "कबीर" पर आपका स्वागत है । धन्यवाद।

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  4. बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति।

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