शुक्रवार, 4 मई 2012

हे सखी ...



पुराण-मन्त्र लादे
गाँठ जोड़े
बैठी रहती हो , अलंकृत,
लिए ठोस जड़ कीमियागिरी
पाँव के नाख़ून से
सिर के बाल तक ,
अनुष्ठानकर्ताओं के
निवेश यज्ञों में दुष्चक्रित,
और अनजाने ही लेती रहती हो
अपने ही निजत्व के
विगलन का सेवामूल्य
सेवाधर्मिता और सतीत्व के
रुग्ण खंभ से कसी बंधी
कसमसाती 'सेविका '
तुमको करनी होगी
हाड़ तोड़ मशक्कत
खोलने होंगे स्वयं ही,
अपने कीलित हाथ पाँव
त्यागना होगा
मेनकाओं की
छद्म काया में
जबरन मोहाविष्ट कराया गया
अपना ही प्राण ...
हे सखी -
अपनी अभिमंत्रित आँखे खोलो
और करो -
अपनी ही
काया में प्रवेश ,
पीछे पड़े
फांसी के फंदों पर लटके
सिर कलम हुए
नाख़ून उखड़ी उँगलियों वाले
अँधेरी स्मृतियों में दफ़न
अनाम क्रांतिकारियों की बीजात्मा
बड़ा तड़फड़ाती है
छाती कूटती है
और पुकारती है तुम्हे -
उठाओ अंत्येष्टि घट
काटना ही होगा तुमको
उपनिवेशी चिताओं का फेरा
मुखाग्नि का हक
सिर्फ तुम्हारा है ....



....हेमा

14 टिप्‍पणियां:

  1. प्रभावशाली और भावप्रवण कविता...

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  2. Bahut hi sarthak aur marmik kavita, hema ki is kavita ko pahle bhi padha, har baar prabhav chhodne mein saksham abhivyakti.....badhai hema

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  3. हेमा की इस कविता को मैंने पहले भी पढ़ा है, बहुत ही सार्थक और मामिक कविता, हर बार पढने पर प्रभाव छोड़ने में सक्षम अभिव्यक्ति....बधाई हेना........

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  4. झकझोरती है हेमा जी की यह कविता !

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  5. उठाओ अंत्येष्टि घट
    काटना ही होगा तुमको
    उपनिवेशी चिताओं का फेरा
    मुखाग्नि का हक
    सिर्फ तुम्हारा है ....
    सशक्‍त लेखन हेमा जी का जहां .. वहां आपका चयन कर इसे प्रस्‍तुत करना सराहनीय है ..आभार

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  6. खोलने होंगे स्वयं ही,
    अपने कीलित हाथ पाँव
    मुखाग्नि का हक
    सिर्फ तुम्हारा है ....
    वक्त की पुकार भी यही है.....
    सक्तिकरण का उपाय भी यही है ....

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  7. वाह...बहुत सुंदर..
    दिल को छू लेने वाली अभिव्यक्ति.....

    सादर.
    अनु

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  8. अपनी अभिमंत्रित आँखे खोलो ...
    :)))

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  9. ' अपनी अभिमंत्रित आँखें खोलो ' ....
    प्रभावशाली ..

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  10. काटना ही होगा तुमको
    उपनिवेशी चिताओं का फेरा
    उत्प्रेरक ...

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  11. बहुत सशक्त रचना...भाषा प्रयोग अति सुंदर!

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